दुनिया में बढ़ते तनाव और परमाणु हथियारों को लेकर चल रही बहस के बीच रूस ने एक बड़ा बयान दिया है। रूस का कहना है कि मौजूदा हालात में परमाणु हथियार ही ऐसी ताकत हैं, जो दुनिया को किसी बड़े वैश्विक युद्ध से बचा सकती हैं। क्रेमलिन ने दावा किया है कि न्यूक्लियर डिटेरेंस यानी परमाणु प्रतिरोध ही अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा बचा है।
रूस की राजधानी मॉस्को में आयोजित एक विदेश नीति कार्यक्रम के दौरान क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि आज की दुनिया में सुरक्षा व्यवस्था पहले जैसी मजबूत नहीं रही है। उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक हालात में परमाणु हथियारों के अलावा ऐसा कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आता, जो बड़े युद्ध के खतरे को रोक सके।
पेस्कोव के इस बयान के बाद परमाणु हथियारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है। खासतौर पर अमेरिका और रूस के बीच पहले से चल रहे तनाव के बीच यह बयान काफी अहम माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से परमाणु हथियारों को लेकर नए समझौते की कोशिशों के बीच रूस का यह रुख वॉशिंगटन के लिए चुनौती बन सकता है।
रूस ने बताया परमाणु हथियारों को सुरक्षा कवच
क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि दुनिया में जिस तरह से सैन्य तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, उससे भविष्य में नए और खतरनाक हथियार सामने आ सकते हैं। उन्होंने आशंका जताई कि आने वाले समय में कुछ गैर-परमाणु हथियार भी इतनी विनाशकारी क्षमता हासिल कर सकते हैं कि वे परमाणु हथियारों के बराबर प्रभाव डालने लगें।
रूसी पक्ष का कहना है कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी बड़े देशों को सीधे टकराव से रोकती है। मॉस्को के अनुसार, यही डर कि किसी संघर्ष में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हो सकता है, देशों को संयम बरतने के लिए मजबूर करता है।
हालांकि, कई पश्चिमी देश रूस के इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि परमाणु हथियारों का विस्तार वैश्विक सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय खतरे को और बढ़ा सकता है। पश्चिमी देशों ने कई बार रूस पर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की धमकी देने का आरोप लगाया है।
यूक्रेन युद्ध के बीच पुतिन दे चुके हैं कई संकेत
रूस और यूक्रेन के बीच जारी लंबे संघर्ष के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार परमाणु हथियारों का जिक्र कर चुके हैं। रूस ने कई मौकों पर कहा है कि वह अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी विकल्प खुले रखता है। यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर दबाव बनाया है। वहीं मॉस्को का कहना है कि पश्चिमी देशों की सैन्य गतिविधियां उसकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
रूसी अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए परमाणु क्षमता जरूरी है। इसी वजह से रूस लगातार अपनी परमाणु नीति को लेकर बयान देता रहा है।
अमेरिका की नई परमाणु संधि की कोशिश
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने के लिए एक नए समझौते की बात कर चुके हैं। अमेरिका चाहता है कि भविष्य की किसी भी बड़ी परमाणु संधि में चीन को भी शामिल किया जाए। हालांकि चीन ने इस तरह के प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। बीजिंग का कहना है कि उसकी परमाणु क्षमता अमेरिका और रूस की तुलना में काफी अलग स्तर पर है, इसलिए उस पर उसी तरह की शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं।
वहीं रूस का कहना है कि अगर चीन को किसी नए समझौते का हिस्सा बनाया जाता है तो अमेरिका के सहयोगी देश ब्रिटेन और फ्रांस को भी इसमें शामिल करना होगा। मॉस्को का तर्क है कि यूरोप में मौजूद परमाणु ताकतों को नजरअंदाज करके कोई संतुलित समझौता नहीं हो सकता।
‘न्यू स्टार्ट’ समझौता खत्म होने से बढ़ी चिंता
रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली आखिरी बड़ी संधि ‘न्यू स्टार्ट’ के खत्म होने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है। यह समझौता दोनों देशों के परमाणु हथियारों की संख्या और तैनाती पर नियंत्रण रखता था। 2010 में लागू हुई इस संधि के तहत रूस और अमेरिका अपने तैनात परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित रखने पर सहमत हुए थे। इस समझौते ने दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों के बीच हथियारों की दौड़ को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
लेकिन इसके समाप्त होने के बाद पहली बार ऐसा समय आया है जब रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली कोई बड़ी बाध्यकारी संधि मौजूद नहीं है। इससे विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि आने वाले वर्षों में परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
रूस-अमेरिका संबंधों में बढ़ता तनाव
रूस और अमेरिका लंबे समय से एक-दूसरे पर हथियार नियंत्रण समझौतों का पालन न करने के आरोप लगाते रहे हैं। दोनों देशों के बीच यूक्रेन युद्ध, नाटो विस्तार और वैश्विक प्रभाव को लेकर तनाव लगातार बना हुआ है। हालांकि दोनों पक्षों ने उच्च स्तर की सैन्य बातचीत दोबारा शुरू करने की इच्छा जताई थी, लेकिन परमाणु हथियारों को लेकर कोई ठोस सहमति अभी तक नहीं बन पाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दुनिया की बड़ी परमाणु शक्तियों के बीच संवाद कमजोर होता गया तो इससे हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है।
दुनिया में बढ़ रही परमाणु हथियारों की चिंता
रूस के बयान ऐसे समय में आए हैं जब कई देश अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने में लगे हैं। अमेरिका लगातार चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता पर चिंता जताता रहा है। वहीं कुछ देशों को लेकर यह आशंका भी जताई जाती रही है कि वे भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश कर सकते हैं।
दूसरी तरफ रूस का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु क्षमता बनाए रखना जरूरी समझता है। मॉस्को के अनुसार, परमाणु हथियार युद्ध शुरू करने के लिए नहीं बल्कि बड़े संघर्ष को रोकने के लिए हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इस बात को लेकर मतभेद हैं कि परमाणु हथियार शांति की गारंटी हैं या भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा।
फिलहाल रूस के इस बयान ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान परमाणु हथियारों, वैश्विक सुरक्षा और बड़े देशों के बीच शक्ति संतुलन की ओर खींच दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश हथियार नियंत्रण को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।




