रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को खत्म करने की कोशिशों ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। हाल के दिनों में दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित करने को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां बढ़ी हैं। इसी सिलसिले में अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ने शनिवार को मॉस्को स्थित क्रेमलिन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लंबी बातचीत की। यह बैठक तीन घंटे से अधिक समय तक चली। बातचीत का मकसद कई वर्षों से चल रहे सैन्य संघर्ष को राजनीतिक समाधान की दिशा में ले जाना था।
बैठक के बाद रूस और यूक्रेन के खिलाफ हमलों में अस्थायी विराम की बात सामने आई है। इससे यह उम्मीद जरूर जगी है कि शायद दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता फिर खुल सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि युद्ध अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। जमीनी स्तर पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर अब भी गहरा मतभेद बना हुआ है।
दरअसल, रूस-यूक्रेन संघर्ष सिर्फ दो देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं रहा है। इसने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था, सेना, बुनियादी ढांचे और आम नागरिकों की जिंदगी पर गहरा असर डाला है। यूक्रेन में बड़े पैमाने पर शहरों और महत्वपूर्ण सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है, जबकि रूस को भी सैनिकों और सैन्य उपकरणों के स्तर पर भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
युद्ध में रूस को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी?
रूस के लिए यह संघर्ष सैन्य संसाधनों के लिहाज से बेहद महंगा साबित हुआ है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज यानी CSIS की रिपोर्ट में रूसी सेना के हताहत होने का आंकड़ा करीब 12 लाख बताया गया है। इस आंकड़े में मारे गए, घायल और लापता सैन्यकर्मी शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक लगभग 3.25 लाख रूसी सैनिकों की मौत हुई है। हालांकि युद्ध के दौरान सैन्य नुकसान के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग स्रोतों के अनुमान में अंतर देखने को मिलता है। इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबे समय से चल रहे संघर्ष ने रूस की सैन्य क्षमता पर काफी दबाव डाला है।
सिर्फ सैनिकों की संख्या ही नहीं, बल्कि रूस के हथियारों और सैन्य वाहनों को भी भारी नुकसान हुआ है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार युद्ध के दौरान रूस के 8 हजार से अधिक बख्तरबंद वाहन नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसके अलावा 2700 से ज्यादा टैंकों के नुकसान का भी अनुमान लगाया गया है।
इतने बड़े स्तर पर सैन्य उपकरणों की क्षति का असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है। युद्ध जितना लंबा खिंचता है, उतना ही ज्यादा दबाव नए हथियार, वाहन और दूसरे सैन्य संसाधन उपलब्ध कराने पर पड़ता है। इसका असर सैन्य बजट और उत्पादन क्षमता पर भी पड़ सकता है।
रूस की ऊर्जा व्यवस्था पर भी पड़ा असर
रूस को युद्ध के दौरान सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नुकसान नहीं उठाना पड़ा। उसके ऊर्जा क्षेत्र को भी लगातार निशाना बनाया गया है। यूक्रेन की ओर से किए गए ड्रोन हमलों में रूस की कुछ तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा से जुड़ी दूसरी सुविधाओं को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आती रही हैं।
रूस की अर्थव्यवस्था में तेल और गैस क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ऊर्जा उत्पादों का निर्यात देश के लिए बड़ी मात्रा में विदेशी आय जुटाता है। ऐसे में रिफाइनरियों और ऊर्जा संयंत्रों पर हमले सिर्फ स्थानीय स्तर पर नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि इनके व्यापक आर्थिक प्रभाव भी हो सकते हैं।
आकलनों के मुताबिक ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े प्रत्यक्ष नुकसान के अलावा उत्पादन में रुकावट और निर्यात में कमी जैसी परिस्थितियों को जोड़ने पर नुकसान का आंकड़ा 13 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि युद्ध का आर्थिक असर सैन्य खर्च से कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।
यूक्रेन के लिए तबाही कहीं ज्यादा व्यापक
अगर दोनों देशों के नुकसान की तुलना की जाए तो यूक्रेन को अपने ही क्षेत्र में युद्ध होने के कारण कहीं अधिक व्यापक विनाश झेलना पड़ा है। रूसी सेना अभी भी यूक्रेन के लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण रखती है। युद्ध के दौरान कब्जे वाले क्षेत्रों का मुद्दा दोनों देशों के बीच संभावित शांति वार्ता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
यूक्रेन के कई शहर लंबे समय से मिसाइल और ड्रोन हमलों की चपेट में रहे हैं। रिहायशी इलाकों के अलावा बिजली व्यवस्था, परिवहन नेटवर्क, औद्योगिक इकाइयों और दूसरी जरूरी सुविधाओं को भी नुकसान पहुंचा है।
बिजली के बुनियादी ढांचे पर हमलों का सीधा असर आम लोगों पर पड़ा है। कई इलाकों में बिजली और दूसरी जरूरी सेवाओं की आपूर्ति बाधित हुई। घरों और सार्वजनिक इमारतों को नुकसान होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ा।
युद्ध के कारण यूक्रेन की अर्थव्यवस्था को भी भारी झटका लगा है। उत्पादन, कारोबार और निवेश प्रभावित हुए हैं। देश को अपने बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने के लिए लंबे समय तक बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधनों की जरूरत होगी।
लाखों लोगों की जिंदगी हुई प्रभावित
रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष का सबसे मानवीय पहलू विस्थापन है। लगातार लड़ाई और बमबारी के कारण बड़ी संख्या में यूक्रेनी नागरिकों को अपने घर छोड़ने पड़े। कई लोगों ने देश के दूसरे हिस्सों में शरण ली, जबकि लाखों लोग विदेशों में चले गए।
युद्ध के कारण परिवारों का बिखरना, रोजगार का खत्म होना और सामान्य जीवन का बाधित होना यूक्रेन के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद भी विस्थापित लोगों की वापसी और उनके पुनर्वास में लंबा समय लग सकता है।
इसके अलावा क्षतिग्रस्त सड़कों, बिजली संयंत्रों, पुलों, अस्पतालों और आवासीय इमारतों को दोबारा बनाने के लिए भी बड़े निवेश की जरूरत होगी। इस लिहाज से युद्ध खत्म होने के बाद भी यूक्रेन के सामने पुनर्निर्माण की एक लंबी प्रक्रिया होगी।
सैनिकों की कमी भी यूक्रेन के लिए चुनौती
लंबे समय तक युद्ध लड़ने का असर यूक्रेन की सैन्य क्षमता पर भी पड़ा है। लगातार मोर्चे पर तैनाती और सैनिकों के हताहत होने की वजह से सेना के लिए पर्याप्त संख्या में जवान उपलब्ध कराना चुनौती बनता जा रहा है।
युद्ध के शुरुआती दौर में यूक्रेन को पश्चिमी देशों से बड़ी मात्रा में सैन्य और आर्थिक सहायता मिली। समय के साथ यह सहायता उसकी रक्षा व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गई है। हथियारों, गोला-बारूद और आर्थिक मदद के अलावा देश को अपनी अर्थव्यवस्था और जरूरी सरकारी सेवाओं को चलाने के लिए भी बाहरी समर्थन की आवश्यकता रही है।
यही वजह है कि युद्ध के खत्म होने की दिशा में होने वाली किसी भी बातचीत में सिर्फ सीमा या क्षेत्र का सवाल ही महत्वपूर्ण नहीं होगा। यूक्रेन की सुरक्षा और भविष्य में उसे मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा गारंटी भी अहम मुद्दा रहेगी।
क्या वाकई खत्म होने वाला है युद्ध?
अमेरिकी प्रतिनिधियों और रूसी राष्ट्रपति के बीच हुई लंबी बैठक ने शांति वार्ता की संभावनाओं को जरूर बढ़ाया है। हमलों में अस्थायी रोक की खबर भी बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल बनाने में मदद कर सकती है। लेकिन इसे स्थायी युद्धविराम या शांति समझौते की शुरुआत मानना अभी जल्दबाजी होगी।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि रूस और यूक्रेन के बीच कई मूलभूत मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है। यूक्रेन के कब्जे वाले क्षेत्रों का भविष्य, सुरक्षा की गारंटी, सैन्य व्यवस्था और दोनों देशों के बीच भविष्य के संबंध ऐसे विषय हैं जिन पर बातचीत बेहद कठिन हो सकती है।
रूस और यूक्रेन दोनों के लिए युद्ध की कीमत पहले ही बहुत ज्यादा हो चुकी है। एक तरफ रूस को बड़ी संख्या में सैनिकों और सैन्य उपकरणों का नुकसान झेलना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर यूक्रेन का बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे की तबाही और क्षेत्रीय नुकसान से प्रभावित हुआ है।
इसलिए फिलहाल सबसे सही निष्कर्ष यही है कि शांति की कोशिशें जरूर तेज हुई हैं, लेकिन युद्ध खत्म होने की कोई पक्की समयसीमा अभी सामने नहीं आई है। अगर अस्थायी युद्धविराम के बाद दोनों पक्ष वास्तविक और लगातार बातचीत की मेज पर बने रहते हैं, तभी स्थायी समाधान की उम्मीद मजबूत होगी।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि मॉस्को और कीव इन शुरुआती कूटनीतिक प्रयासों को व्यापक शांति वार्ता में बदल पाते हैं या नहीं। क्योंकि युद्ध रोकना सिर्फ हमलों को बंद करने तक सीमित नहीं होगा। स्थायी शांति के लिए दोनों देशों को क्षेत्र, सुरक्षा और भविष्य के संबंधों जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों पर समझौते तक पहुंचना होगा।




