हरियाणा सरकार ने वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीतियों के तहत आने वाले कर्मचारियों को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पात्र कर्मचारियों को सेवा से बाहर नहीं किया जाएगा। जिन विभागों में नियमित पद उपलब्ध नहीं हैं, वहां कर्मचारियों को समायोजित करने के लिए अधिसंख्य यानी सुपरन्यूमरेरी पद सृजित किए जाएंगे। पात्र कर्मचारियों को उनके संबंधित पद के सबसे निचले वेतनमान में नियमित किया जाएगा।
सरकार का यह फैसला खास तौर पर उन समूह-बी, सी और डी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो वर्ष 2014 में जारी नियमितीकरण नीतियों के तहत पात्र थे। मानव संसाधन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए सभी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को विस्तृत निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रशासनिक सचिव, विभागाध्यक्ष, मंडलायुक्त, उपायुक्त और विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रार शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मदन सिंह और अन्य बनाम हरियाणा राज्य मामले में 16 अप्रैल को आदेश पारित किया था। इसी आदेश को लागू करने की प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार ने विभागों को पात्र कर्मचारियों की पहचान करने और उनकी सेवा स्थिति का सत्यापन करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि 7 जुलाई 2014 को जारी नियमितीकरण नीति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के बावजूद वर्तमान में सेवा दे रहे कर्मचारियों को नौकरी से हटाया नहीं जाएगा।
सरकार के निर्देश के अनुसार, संविदा आधार पर नियुक्त समूह-बी, सी और डी के वे कर्मचारी जिन्होंने स्वीकृत रिक्त पदों के विरुद्ध काम करते हुए 28 मई 2014 तक न्यूनतम तीन वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी, उन्हें नियमितीकरण के दायरे में लाया जाएगा। इसके लिए यह भी जरूरी होगा कि संबंधित कर्मचारी अभी सेवा में हो और उसके पास पद के लिए निर्धारित आवश्यक शैक्षणिक एवं अन्य योग्यताएं मौजूद हों।
ऐसे कर्मचारियों को उनके संबंधित पद के सबसे निचले वेतनमान में रखने की व्यवस्था की गई है। यानी नियमितीकरण के बाद उनकी सेवा को उस पद के निर्धारित न्यूनतम वेतन स्तर के अनुसार माना जाएगा। हालांकि, नियमितीकरण की प्रक्रिया पात्रता और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही पूरी होगी।
सरकार ने उन कर्मचारियों को भी राहत के दायरे में रखा है जो पहले की नियमितीकरण नीतियों के तहत पात्र होने के बावजूद प्रशासनिक कारणों से नियमित नहीं हो सके थे। इनमें तदर्थ, अनुबंध, दैनिक वेतन और कार्य-प्रभार आधार पर कार्यरत समूह-सी और डी के कर्मचारी शामिल हैं। यदि ऐसे कर्मचारी 17 जून 1997, 5 नवंबर 1999, 1 अक्टूबर 2003 और 10 फरवरी 2004 को जारी नियमितीकरण नीतियों की शर्तें पूरी करते थे, लेकिन प्रशासनिक कारणों से उन्हें नियमित नहीं किया जा सका, तो उन्हें भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत नियमित किया जाएगा।
राज्य सरकार ने सभी विभागों को निर्देश दिया है कि वे ऐसी श्रेणियों में आने वाले पात्र कर्मचारियों की तत्काल पहचान करें। इसके बाद उनकी पात्रता से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जाएगी। सेवा अवधि, नियुक्ति का आधार, पद की स्थिति, आवश्यक योग्यता और अन्य निर्धारित शर्तों का सत्यापन होने के बाद नियमितीकरण के आदेश जारी किए जाएंगे।
सरकार के आदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सेवा लाभ से जुड़ा है। नियमित होने वाले पात्र कर्मचारियों को केवल भविष्य के लिए नियमित कर्मचारी का दर्जा ही नहीं मिलेगा, बल्कि पात्रता की तारीख से पदोन्नति और अन्य सेवा लाभ भी दिए जाएंगे। इसका अर्थ है कि जिन मामलों में कर्मचारी पहले ही पात्रता की तारीख हासिल कर चुका था, वहां निर्धारित नियमों के अनुसार पिछली तारीख से संबंधित सेवा लाभ पर भी विचार किया जाएगा।
वहीं, 7 जुलाई 2014 की अधिसूचना के आधार पर वर्तमान में सेवा में बने हुए समूह-बी, सी और डी के कर्मचारियों को भी राहत दी गई है। भले ही उस नीति को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया हो, लेकिन जो कर्मचारी वर्तमान में सेवा में हैं, वे सक्षम प्राधिकारी द्वारा आवश्यक सत्यापन के बाद उपलब्ध राहत और सेवा लाभ के हकदार होंगे। इससे उन कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है जिनकी नौकरी लंबे समय से नियमितीकरण के विवाद के कारण अनिश्चितता में थी।
इस पूरे मामले की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार ने विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले नियमितीकरण से संबंधित तीन अलग-अलग नीतियां अधिसूचित की थीं। जून 2014 में जारी दो नीतियों के तहत ऐसे कर्मचारियों को नियमित करने का प्रावधान किया गया था, जिन्होंने 30 जून 2014 तक सेवा के तीन वर्ष पूरे कर लिए थे। इन नीतियों के आधार पर करीब पांच हजार कर्मचारियों को नियमित किया गया था।
इसके बाद 7 जुलाई 2014 को एक और नियमितीकरण नीति अधिसूचित की गई। इसमें उन कर्मचारियों को नियमित करने का प्रावधान किया गया था, जो 31 दिसंबर 2018 तक लगातार 10 वर्ष की सेवा पूरी कर लेते। इस नीति के दायरे में बड़ी संख्या में कर्मचारी आए। बाद में राज्य में सरकार बदलने के बाद इस नीति और नियमितीकरण की पूरी प्रक्रिया को कानूनी चुनौती दी गई।
अक्टूबर 2014 में मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा। नियमितीकरण नीतियों की वैधता को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली। जून 2018 में तत्कालीन न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति सुदीप अहलूवालिया की खंडपीठ ने सोनीपत निवासी योगेश त्यागी और अन्य की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए वर्ष 2014 की तीनों नीतियों को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट के फैसले के बाद इन नीतियों के तहत कर्मचारियों के नियमितीकरण पर रोक लग गई थी।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष 16 अप्रैल को हाई कोर्ट के करीब आठ वर्ष पुराने फैसले को पलट दिया। शीर्ष अदालत ने जून 2014 में जारी दोनों नियमितीकरण नीतियों को वैध माना और उनके तहत किए गए नियमितीकरण को कानूनी आधार प्रदान किया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हरियाणा सरकार के सामने इन आदेशों को प्रशासनिक स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी आ गई।
अब मानव संसाधन विभाग की ओर से जारी निर्देश इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। विभागों को कहा गया है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप पात्र कर्मचारियों का रिकॉर्ड तैयार करें और आवश्यक जांच के बाद नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी करें।
नियमित पद उपलब्ध न होने की स्थिति में सरकार ने सुपरन्यूमरेरी पद बनाने का रास्ता भी स्पष्ट कर दिया है। इसका मतलब है कि यदि किसी विभाग में पात्र कर्मचारी को नियमित करने के लिए स्वीकृत नियमित पद खाली नहीं है, तो उसके लिए अतिरिक्त पद बनाया जा सकेगा। इससे पदों की कमी को नियमितीकरण की प्रक्रिया में बाधा बनने से रोका जा सकेगा।
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नियमितीकरण की प्रक्रिया के दौरान कर्मचारियों की वर्तमान सेवा को प्रभावित नहीं किया जाएगा। सरकार ने साफ कर दिया है कि केवल इसलिए किसी कर्मचारी को नौकरी से बाहर नहीं किया जाएगा कि जिस नीति के आधार पर उसे राहत मिली थी, वह बाद में कानूनी रूप से रद्द हो गई। मौजूदा कर्मचारियों को सक्षम प्राधिकारी के सत्यापन के अधीन राहत देने की व्यवस्था की गई है।
जुलाई 2014 की नीति को लेकर भी यही स्थिति सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति को रद्द कर दिया था, लेकिन इसके तहत नियमित किए गए या वर्तमान में सेवा में बने कर्मचारियों को तत्काल नौकरी से हटाने का रास्ता नहीं अपनाया गया है। सरकार ने पहले ही अतिथि अध्यापकों और अन्य श्रेणियों के कर्मचारियों की सेवाओं को सेवानिवृत्ति आयु तक जारी रखने से संबंधित व्यवस्था कर रखी है।
7 जुलाई 2014 की नीति के तहत 31 दिसंबर 2018 तक 10 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले करीब 14 हजार अतिथि अध्यापकों, लगभग तीन हजार बिजली कर्मचारियों और अन्य विभागों के करीब तीन हजार कर्मचारियों को नियमित किया गया था। इन कर्मचारियों की सेवा को लेकर लंबे समय से कानूनी और प्रशासनिक विवाद बना हुआ था।
अब सरकार के ताजा निर्देशों से ऐसे कर्मचारियों को भी बड़ी राहत मिलने की संभावना है जो नियमितीकरण के विवाद के कारण अपने भविष्य को लेकर असमंजस में थे। हालांकि, प्रत्येक मामले में पात्रता की शर्तों और सेवा रिकॉर्ड का सत्यापन सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा।
सरकार ने विभागों को इस प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। अब संबंधित विभागों को अपने स्तर पर पात्र कर्मचारियों की सूची तैयार करनी होगी और रिकॉर्ड की जांच के बाद नियमितीकरण के आदेश जारी करने होंगे। जिन कर्मचारियों के मामलों में दस्तावेज या पात्रता को लेकर कोई कमी होगी, वहां सत्यापन की प्रक्रिया के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार की ओर से जारी यह आदेश हरियाणा के उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी नियमित सेवा का मामला वर्ष 2014 की नीतियों के कारण लंबे समय से कानूनी विवाद में उलझा हुआ था। खासतौर पर समूह-बी, सी और डी के कर्मचारियों को नियमितीकरण, पदोन्नति और अन्य सेवा लाभ का रास्ता साफ होने की उम्मीद है।
अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि विभिन्न विभाग सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मानव संसाधन विभाग के निर्देशों को कितनी तेजी से लागू करते हैं। यदि विभाग समयबद्ध तरीके से पात्र कर्मचारियों की पहचान और सत्यापन पूरा करते हैं तो लंबे समय से लंबित नियमितीकरण के मामलों का निपटारा हो सकेगा। साथ ही, सुपरन्यूमरेरी पद बनाने की व्यवस्था से उन विभागों में भी कर्मचारियों को समायोजित करने का रास्ता खुलेगा, जहां नियमित रिक्तियां उपलब्ध नहीं हैं।
इस तरह वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीतियों को लेकर चले लंबे कानूनी विवाद के बाद हरियाणा सरकार ने अब स्पष्ट प्रशासनिक ढांचा सामने रख दिया है। पात्र कर्मचारियों को उनके पद के न्यूनतम वेतनमान में नियमित करने, जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद सृजित करने और पात्रता तिथि से सेवा लाभ देने की व्यवस्था से हजारों कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि मौजूदा कर्मचारियों को केवल नीति के रद्द होने के आधार पर सेवा से बाहर नहीं किया जाएगा।



