हिचकी आने पर किसी के याद करने की बात में कितनी सच्चाई? जानिए शरीर के अंदर कैसे शुरू होती है यह प्रक्रिया

हिचकी आने पर किसी के याद करने की बात में कितनी सच्चाई? जानिए शरीर के अंदर कैसे शुरू होती है यह प्रक्रिया

कई बार ऐसा होता है कि अचानक किसी व्यक्ति को हिचकी आने लगती है। घर के बड़े-बुजुर्गों से लेकर दोस्तों तक, अक्सर इसे लेकर एक मजेदार बात कही जाती है कि जरूर कोई आपको याद कर रहा होगा। कुछ लोग तो हिचकी आने पर अपने परिचितों और करीबियों के नाम तक गिनने लगते हैं। भारतीय समाज में यह मान्यता लंबे समय से प्रचलित है और आज भी बड़ी संख्या में लोग इसे सच मानते हैं। लेकिन क्या वास्तव में किसी के याद करने का असर हमारे शरीर पर इस तरह पड़ सकता है? क्या किसी व्यक्ति के बारे में सोचने या उसके याद करने से अचानक हिचकी शुरू हो सकती है? मेडिकल साइंस इस सवाल का बिल्कुल अलग जवाब देता है।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के अनुसार, हिचकी का किसी दूसरे व्यक्ति की याद, भावना या मानसिक गतिविधि से कोई संबंध साबित नहीं हुआ है। यह शरीर में होने वाली एक अनैच्छिक प्रतिक्रिया है, जिसमें सांस लेने से जुड़ी मांसपेशियां और तंत्रिकाएं अहम भूमिका निभाती हैं। दरअसल, हिचकी आने के पीछे एक खास शारीरिक प्रक्रिया काम करती है। इसमें डायाफ्राम नाम की मांसपेशी अचानक सिकुड़ती है और उसके तुरंत बाद गले में मौजूद वोकल कॉर्ड्स बंद हो जाते हैं। इसी वजह से मुंह से ‘हिक’ जैसी आवाज निकलती है।

इसलिए अगली बार अचानक हिचकी आने पर किसी के आपको याद करने का अनुमान लगाने के बजाय यह समझना ज्यादा जरूरी है कि शरीर के अंदर उस समय क्या हो रहा होता है।

हिचकी शुरू होने के पीछे कौन-सी मांसपेशी होती है जिम्मेदार?

हिचकी की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए सबसे पहले डायाफ्राम की भूमिका जानना जरूरी है। डायाफ्राम छाती और पेट के बीच स्थित गुंबद के आकार की एक महत्वपूर्ण मांसपेशी है। सांस लेने के दौरान इसका लगातार काम करना बेहद जरूरी होता है। जब हम सांस अंदर लेते हैं, तो डायाफ्राम नीचे की ओर सिकुड़ता है और फेफड़ों को फैलने के लिए जगह मिलती है। इससे हवा फेफड़ों के अंदर पहुंचती है। सांस छोड़ते समय यह मांसपेशी सामान्य स्थिति में लौटती है और हवा बाहर निकलती है।

आमतौर पर यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी परेशानी के अपने आप चलती रहती है। हमें इसके लिए अलग से कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। लेकिन कभी-कभी किसी कारण से डायाफ्राम में अचानक अनियंत्रित संकुचन होने लगता है। इस दौरान व्यक्ति सामान्य तरीके से सांस लेने की कोशिश करता है, लेकिन शरीर में एक झटके जैसी प्रतिक्रिया पैदा होती है।

डायाफ्राम के अचानक सिकुड़ने के कुछ ही क्षण बाद गले में मौजूद वोकल कॉर्ड्स यानी स्वर तंत्रियां बंद हो जाती हैं। हवा के प्रवाह में अचानक रुकावट आने से हिचकी की खास आवाज पैदा होती है। यह प्रक्रिया बहुत तेजी से होती है और बार-बार दोहराए जाने पर व्यक्ति को लगातार हिचकी आने लगती है।

शरीर की ये दो नसें भी निभाती हैं अहम भूमिका

हिचकी आने का संबंध केवल डायाफ्राम से नहीं है। इसके पीछे शरीर का नर्वस सिस्टम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मेडिकल जानकारी के मुताबिक, वेगस नर्व और फ्रेनिक नर्व इस प्रक्रिया से जुड़ी दो प्रमुख नसें हैं।

फ्रेनिक नर्व का मुख्य काम डायाफ्राम तक संकेत पहुंचाना है, जिससे यह मांसपेशी सांस लेने और छोड़ने के दौरान अपना काम कर सके। वहीं, वेगस नर्व शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों से जुड़ी होती है और सांस लेने, पाचन तथा अन्य अनैच्छिक गतिविधियों को नियंत्रित करने में योगदान देती है।

जब इन नसों के आसपास किसी तरह की जलन या उत्तेजना पैदा होती है, तो हिचकी आने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। उदाहरण के लिए, पेट में अचानक गैस भरना, भोजन के कारण पेट का ज्यादा फैल जाना या पाचन तंत्र में परेशानी होना इन नसों को प्रभावित कर सकता है। इसके परिणामस्वरूप डायाफ्राम में अनैच्छिक संकुचन शुरू हो जाता है।

यही वजह है कि हिचकी को केवल एक छोटी-सी आवाज समझना सही नहीं है। इसके पीछे मांसपेशियों और तंत्रिकाओं के बीच होने वाली एक पूरी प्रक्रिया काम करती है।

खाना खाने की ये आदतें बढ़ा सकती हैं हिचकी की परेशानी

अक्सर लोगों को खाना खाते समय या भोजन खत्म करने के तुरंत बाद हिचकी आने लगती है। इसकी वजह हमारी कुछ सामान्य आदतें हो सकती हैं। कई बार हम जल्दबाजी में भोजन करते हैं और ठीक से चबाए बिना ही खाना निगल लेते हैं। इस दौरान हवा भी पेट के अंदर चली जाती है, जिससे पेट फूलने या डकार आने जैसी समस्या हो सकती है।

जरूरत से ज्यादा खाना खाना भी हिचकी का एक सामान्य कारण है। जब पेट में अधिक मात्रा में भोजन पहुंचता है, तो वह फैलने लगता है। पेट के इस फैलाव से डायाफ्राम पर दबाव पड़ सकता है और हिचकी शुरू हो सकती है।

इसके अलावा सोडा, कोल्ड ड्रिंक और अन्य कार्बोनेटेड पेय पदार्थों का अधिक सेवन भी इस परेशानी को बढ़ा सकता है। इन पेय पदार्थों में मौजूद गैस पेट में पहुंचकर उसके फैलाव का कारण बन सकती है।

कुछ अन्य परिस्थितियों में भी हिचकी आ सकती है, जैसे:

  • बहुत जल्दी-जल्दी खाना या पानी पीना।
  • एक बार में जरूरत से ज्यादा भोजन करना।
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन का सेवन।
  • कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पीना।
  • अचानक बहुत गर्म या ठंडी चीज खाना-पीना।
  • खाते या पीते समय ज्यादा हवा निगल लेना।
  • अचानक हंसना, उत्साहित होना या भावनात्मक तनाव महसूस करना।

हालांकि, हर व्यक्ति में हिचकी आने का कारण एक जैसा नहीं होता। कई बार बिना किसी स्पष्ट वजह के भी कुछ मिनटों के लिए हिचकी शुरू हो सकती है।

कुछ मिनट की हिचकी और लंबे समय तक चलने वाली हिचकी में अंतर

आमतौर पर हिचकी आना कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं होती। ज्यादातर मामलों में यह कुछ सेकंड या मिनटों तक रहती है और अपने आप बंद हो जाती है। ऐसे में किसी विशेष इलाज की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन परेशानी तब बढ़ जाती है जब हिचकी लंबे समय तक लगातार आती रहे।

मेडिकल साइंस में 48 घंटे से अधिक समय तक जारी रहने वाली हिचकी को परसिस्टेंट हिचकी कहा जाता है। वहीं, अगर हिचकी एक महीने से भी ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो इसे इन्ट्रैक्टेबल हिचकी की श्रेणी में रखा जाता है।

लंबे समय तक हिचकी आने के पीछे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, पेट में एसिड का बढ़ना, गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स यानी GERD, कुछ नसों में जलन या चोट, मेटाबॉलिज्म से जुड़ी गड़बड़ी और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव इसके संभावित कारण हो सकते हैं।

कुछ मामलों में मस्तिष्क, छाती या पेट से जुड़ी गंभीर समस्याएं भी लगातार हिचकी का कारण बन सकती हैं। हालांकि, केवल हिचकी के आधार पर किसी बीमारी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए डॉक्टर की जांच जरूरी होती है।

यदि किसी व्यक्ति को दो दिनों से अधिक समय तक हिचकी आती रहे, तो उसे चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। खासतौर पर तब, जब इसके कारण नींद लेने, खाना खाने या सामान्य रूप से सांस लेने में परेशानी होने लगे। डॉक्टर जरूरत के अनुसार जांच करके इसके पीछे मौजूद वास्तविक कारण का पता लगा सकते हैं।

हिचकी रोकने के लिए पानी पीना कितना कारगर?

हिचकी आते ही ज्यादातर लोग सबसे पहले पानी पीने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग धीरे-धीरे पानी पीते हैं, जबकि कुछ लोग एक बार में कई घूंट पानी पी लेते हैं। इसके अलावा सांस रोकना भी एक आम घरेलू तरीका है। कई बार इन उपायों से हिचकी बंद हो जाती है।

इसके पीछे शरीर की सामान्य शारीरिक प्रतिक्रियाएं जिम्मेदार हो सकती हैं। थोड़ी देर के लिए सांस रोकने से रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ सकता है। इससे सांस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले तंत्र पर असर पड़ता है और हिचकी के चक्र में बदलाव आ सकता है।

इसी तरह धीरे-धीरे पानी पीने या निगलने की क्रिया से गले की मांसपेशियों और वेगस नर्व को उत्तेजना मिल सकती है। इससे हिचकी की अनैच्छिक प्रक्रिया रुकने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इन उपायों के असर को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं और हर व्यक्ति में इनका परिणाम एक जैसा नहीं होता।

हिचकी आने पर कुछ आसान सावधानियां अपनाई जा सकती हैं:

  1. सामान्य तापमान का पानी धीरे-धीरे छोटे घूंट में पिएं।
  2. कुछ सेकंड तक आराम से सांस रोकने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन असहज महसूस होने पर ऐसा न करें।
  3. भोजन करते समय जल्दबाजी से बचें और खाने को अच्छी तरह चबाएं।
  4. एक बार में बहुत अधिक भोजन करने से बचें।
  5. कुछ समय के लिए सोडा और गैस वाले पेय पदार्थों का सेवन कम करें।
  6. भोजन के तुरंत बाद लेटने के बजाय कुछ देर सीधे बैठें।

छोटे बच्चों को हिचकी रोकने के लिए जबरदस्ती पानी पिलाना या सांस रोकने जैसे तरीके अपनाना उचित नहीं है। बच्चों के मामले में उनकी उम्र के अनुसार सुरक्षित उपाय ही अपनाने चाहिए।

क्या हिचकी का कोई मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक कारण भी हो सकता है?

हिचकी को किसी के याद करने से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भावनाओं और मानसिक स्थिति का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कभी-कभी अचानक उत्साहित होने, तनाव महसूस करने, जोर से हंसने या भावनात्मक रूप से उत्तेजित होने पर भी हिचकी आ सकती है।

ऐसी परिस्थितियों में सांस लेने का सामान्य पैटर्न बदल सकता है। व्यक्ति तेजी से सांस लेने लगता है या हंसते समय अधिक हवा निगल सकता है। इससे डायाफ्राम और उससे जुड़ी नसों पर असर पड़ सकता है। परिणामस्वरूप हिचकी शुरू हो सकती है।

हालांकि, यहां भी किसी दूसरे व्यक्ति की याद का सीधा संबंध नहीं है। यह शरीर की अपनी प्रतिक्रिया होती है, जो अलग-अलग परिस्थितियों में पैदा हो सकती है।

पुरानी मान्यता और विज्ञान के बीच का अंतर समझना जरूरी

हिचकी आने पर किसी के याद करने वाली बात सुनने में भले ही दिलचस्प लगती हो, लेकिन इसका कोई प्रमाणित वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह पीढ़ियों से चली आ रही एक सामाजिक मान्यता है, जिसे लोग मनोरंजन और मजाक के तौर पर भी इस्तेमाल करते हैं।

मेडिकल साइंस के अनुसार, हिचकी एक अनैच्छिक रिफ्लेक्स है, जिसमें डायाफ्राम, वेगस नर्व, फ्रेनिक नर्व और वोकल कॉर्ड्स की भूमिका होती है। सामान्य परिस्थितियों में यह परेशानी थोड़े समय में खत्म हो जाती है। इसलिए कभी-कभार हिचकी आने पर घबराने की जरूरत नहीं है।

लेकिन अगर यह लगातार बनी रहे या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर डॉक्टर से सलाह लेकर इसके कारण का पता लगाना बेहतर होता है। इस तरह अगली बार हिचकी आने पर किसी के याद करने की कहानी पर भरोसा करने के बजाय इसके पीछे काम कर रहे शरीर के विज्ञान को समझना ज्यादा सही होगा।