शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार की जल संसाधनों से अतिरिक्त राजस्व जुटाने की महत्वाकांक्षी योजना फिलहाल कानूनी उलझनों में फंसी हुई है। इसी के साथ राज्य जल आयोग (स्टेट वाटर कमीशन) के भविष्य को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। आयोग के अध्यक्ष और दोनों सदस्यों का कार्यकाल आगामी 11 अगस्त को समाप्त होने जा रहा है, ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आयोग का पुनर्गठन किया जाए या फिर न्यायालय में लंबित मामले के निपटारे तक नई नियुक्तियों को टाल दिया जाए। इस संबंध में जलशक्ति विभाग ने पूरी फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दी है, जहां अंतिम निर्णय लिया जाना है।
राज्य सरकार ने जल संसाधनों के उपयोग को व्यवस्थित करने और जलविद्युत परियोजनाओं से होने वाली आय में बढ़ोतरी के उद्देश्य से इस आयोग का गठन किया था। उस समय दावा किया गया था कि जल उपकर (वाटर सेस) व्यवस्था लागू होने के बाद प्रदेश को हर वर्ष लगभग 1,800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है। हालांकि, योजना की शुरुआत के कुछ समय बाद ही मामला न्यायालय पहुंच गया और तब से आयोग की गतिविधियां लगभग ठप पड़ी हैं।
पिछले करीब तीन वर्षों से आयोग अपनी मूल भूमिका निभाने में सक्षम नहीं हो पाया है। जल उपकर से जुड़े विवाद पर न्यायिक प्रक्रिया जारी रहने के कारण आयोग के अधिकांश अधिकार और गतिविधियां प्रभावी रूप से निष्क्रिय हो गई हैं। यही वजह है कि अब सरकार के सामने आयोग के पुनर्गठन को लेकर दुविधा बनी हुई है।
जब आयोग का गठन किया गया था, तब इसे प्रदेश के जल संसाधनों के वैज्ञानिक, पारदर्शी और दीर्घकालिक प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम माना गया था। सरकार का मानना था कि हिमाचल प्रदेश की नदियों और जल संसाधनों का उपयोग कर बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों से जल उपकर लेकर राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सकता है। इसी सोच के तहत आयोग को जल उपकर से संबंधित प्रक्रियाओं की निगरानी और राजस्व संग्रहण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
आयोग ने अपने गठन के बाद प्रदेश में संचालित 173 जलविद्युत परियोजनाओं और बिजली कंपनियों को करीब 871 करोड़ रुपये के जल उपकर के नोटिस जारी किए थे। इनमें निजी क्षेत्र के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियां भी शामिल थीं। शुरुआती दौर में कुछ निजी कंपनियों ने सरकार के दावे को स्वीकार करते हुए लगभग 180 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया। इससे सरकार को उम्मीद जगी कि आने वाले वर्षों में जल उपकर से बड़ा राजस्व प्राप्त होगा।
लेकिन यह उम्मीद अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। कई सार्वजनिक उपक्रमों और बड़ी जलविद्युत कंपनियों ने जल उपकर को चुनौती देते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया। अदालत में मामला लंबित होने के बाद आगे की वसूली लगभग पूरी तरह रुक गई। परिणामस्वरूप सरकार जिस वार्षिक 1,800 करोड़ रुपये के राजस्व की उम्मीद कर रही थी, वह लक्ष्य अधूरा रह गया।
कानूनी विवाद के कारण आयोग की भूमिका भी सीमित होकर रह गई। जल उपकर की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाने से आयोग के पास सक्रिय कार्य लगभग नहीं बचे। ऐसे में तीन सदस्यीय आयोग पिछले कई वर्षों से प्रभावी रूप से निष्क्रिय बना हुआ है। अब अध्यक्ष और दोनों सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या सरकार नए सिरे से आयोग का गठन करेगी या फिर अदालत के अंतिम निर्णय का इंतजार करेगी।
सरकार के सामने यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यदि भविष्य में न्यायालय से जल उपकर व्यवस्था के पक्ष में निर्णय आता है तो आयोग की भूमिका एक बार फिर अहम हो सकती है। वहीं यदि नियुक्तियों में देरी होती है तो बाद में व्यवस्था को दोबारा सक्रिय करने में अतिरिक्त समय लग सकता है।
इस बीच हिमाचल प्रदेश की एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था राज्य सूचना आयोग भी लंबे समय से निष्क्रिय स्थिति में है। सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गठित राज्य सूचना आयोग में पिछले लगभग एक वर्ष से शीर्ष पद खाली पड़े हैं। राज्य मुख्य सूचना आयुक्त आर.डी. धीमान तथा सूचना आयुक्त अमित कश्यप के रेरा में नियुक्त होने के बाद आयोग में दोनों प्रमुख पद रिक्त हो गए थे।
इन पदों पर नई नियुक्तियां नहीं होने के कारण सूचना आयोग में द्वितीय अपीलों और शिकायतों की सुनवाई पूरी तरह प्रभावित हो गई है। आरटीआई अधिनियम के तहत जिन मामलों का अंतिम निस्तारण राज्य सूचना आयोग में होना होता है, वे लगातार लंबित होते जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार आयोग में 1,500 से अधिक मामले निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिससे सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदन करने वाले नागरिकों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
राज्य सरकार के प्रशासनिक सुधार विभाग ने सूचना आयोग के रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू करते हुए वर्ष 2026 में आवेदन भी आमंत्रित किए थे। फरवरी तक इच्छुक उम्मीदवारों से आवेदन मांगे गए थे, लेकिन चयन प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी। इसके चलते आयोग में नई नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं और संस्था की नियमित कार्यप्रणाली बहाल नहीं हो सकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य जल आयोग और राज्य सूचना आयोग जैसी संस्थाएं प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जहां जल आयोग प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और राज्य के राजस्व से जुड़ी नीतियों को प्रभावी बनाने का माध्यम है, वहीं सूचना आयोग शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अहम माना जाता है। ऐसे में दोनों संस्थाओं का लंबे समय तक निष्क्रिय रहना प्रशासनिक दृष्टि से चिंता का विषय माना जा रहा है।
जल आयोग के मामले में सरकार की निगाहें अब न्यायालय की कार्यवाही और मुख्यमंत्री कार्यालय के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। यदि आयोग का पुनर्गठन किया जाता है तो नई नियुक्तियों के माध्यम से संस्था को दोबारा सक्रिय किया जा सकता है। वहीं यदि सरकार फिलहाल इंतजार की रणनीति अपनाती है तो आयोग का भविष्य अदालत के फैसले से जुड़ जाएगा।
उधर, सूचना आयोग में लंबित नियुक्तियों को लेकर भी जल्द निर्णय की उम्मीद जताई जा रही है। माना जा रहा है कि दोनों संस्थाओं में रिक्त पदों को भरने और उनकी कार्यप्रणाली को फिर से गति देने के लिए सरकार को जल्द ही ठोस कदम उठाने होंगे। क्योंकि एक ओर जल उपकर से जुड़े करोड़ों रुपये के संभावित राजस्व का प्रश्न है, तो दूसरी ओर सूचना के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा भी सरकार के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है।
फिलहाल प्रदेश सरकार के समक्ष सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन दोनों महत्वपूर्ण संस्थाओं को फिर से सक्रिय बनाने की है। जल उपकर विवाद पर न्यायिक प्रक्रिया के आगे बढ़ने और रिक्त पदों पर नियुक्तियों को लेकर होने वाले फैसले आने वाले समय में यह तय करेंगे कि राज्य की इन संस्थाओं की भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है और सरकार अपने घोषित राजस्व तथा प्रशासनिक पारदर्शिता के लक्ष्यों को किस हद तक हासिल कर पाती है।




