चंडीगढ़ नगर निगम में करीब 250 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रस्तावों को लेकर उठे विवाद और बाद में सदन द्वारा इन एजेंडों को निरस्त किए जाने के बाद निगम की वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। अब नगर निगम के कामकाज में स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठने लगी है। एडवोकेट और चंडीगढ़ प्रशासन की एडमिनिस्ट्रेटर एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य अजय जग्गा ने प्रशासक गुलाब चंद कटारिया को पत्र भेजकर नगर निगम के लिए स्वतंत्र लोकल बॉडीज ओम्बड्समैन यानी लोकायुक्त नियुक्त करने का आग्रह किया है।
अजय जग्गा ने अपने पत्र में कहा है कि करीब 250 करोड़ रुपये के वित्तीय एजेंडों का पर्याप्त विचार-विमर्श और जांच के बिना आगे बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इन प्रस्तावों को बाद में नगर निगम सदन द्वारा निरस्त कर दिया गया। उनके अनुसार, इस घटनाक्रम ने नगर निगम की वित्तीय निर्णय प्रक्रिया और मौजूदा जवाबदेही व्यवस्था की कमियों को उजागर किया है।
उन्होंने कहा कि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए निगम की वित्तीय निर्णय प्रक्रिया में स्वतंत्र निगरानी का प्रावधान होना चाहिए। बड़े वित्तीय प्रस्तावों को मंजूरी देने से पहले उनकी वित्तीय, प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर पर्याप्त जांच जरूरी है। उनका कहना है कि केवल विवाद सामने आने के बाद किसी प्रस्ताव को रद्द करना समाधान नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए जो शुरुआत में ही संभावित खामियों और अनियमितताओं की पहचान कर सके।
जग्गा ने नगर निगम की वित्तीय स्थिति पर भी चिंता जताई है। उनके मुताबिक, पिछले कुछ समय में निगम के सामने वित्तीय दबाव बढ़ा है और राजस्व से जुड़ी चुनौतियां भी बनी हुई हैं। ऐसे में उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल, खर्चों पर नियंत्रण और राजस्व व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि संभावित वित्तीय अनियमितताओं और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से जुड़े मामलों की स्वतंत्र निगरानी के लिए संस्थागत तंत्र की आवश्यकता है।
अपने पत्र में अजय जग्गा ने 13वें वित्त आयोग की सिफारिश का भी उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि स्थानीय निकायों में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर वित्तीय प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र ओम्बड्समैन की व्यवस्था की सिफारिश की गई थी। उनके अनुसार, चंडीगढ़ में स्थानीय निकाय के लिए ऐसा स्वतंत्र तंत्र अभी प्रभावी रूप से स्थापित नहीं हो पाया है। इसलिए मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इस दिशा में कदम उठाना जरूरी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि लोकल बॉडीज ओम्बड्समैन को नगर निगम से जुड़े कथित कुप्रशासन, वित्तीय अनियमितताओं, अधिकारों के दुरुपयोग और सार्वजनिक धन को संभावित नुकसान पहुंचाने वाले मामलों की स्वतंत्र जांच करने का अधिकार दिया जाए। ऐसी व्यवस्था से निगम के अधिकारियों और संबंधित संस्थाओं की जवाबदेही तय करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, आम नागरिकों को भी शिकायतों के निपटारे के लिए एक स्वतंत्र मंच उपलब्ध होगा।
अजय जग्गा ने नगर निगम की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए एक अलग विशेषज्ञ सलाहकार परिषद गठित करने का प्रस्ताव भी दिया है। उन्होंने एडवाइजरी काउंसिल ऑन रेवेन्यू एंड फाइनेंशियल रिफॉर्म्स बनाने का सुझाव देते हुए कहा कि इसमें वित्त, टैक्सेशन, नगर प्रशासन और पब्लिक पॉलिसी के अधिकतम छह विशेषज्ञ शामिल किए जा सकते हैं।
उनके अनुसार, यह परिषद नगर निगम को राजस्व बढ़ाने और वित्तीय प्रबंधन को बेहतर बनाने के संबंध में विशेषज्ञ सलाह दे सकती है। परिषद के जरिए निगम के मौजूदा राजस्व स्रोतों की समीक्षा की जा सकती है और उन क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है, जहां से अतिरिक्त आय जुटाई जा सकती है। इसके अलावा राजस्व लीकेज रोकने, टैक्स अनुपालन बढ़ाने और बकाया राशि की वसूली को प्रभावी बनाने के उपाय भी सुझाए जा सकते हैं।
उन्होंने निगम के खर्चों को तर्कसंगत बनाने और दीर्घकालिक वित्तीय योजना तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि नगर निगम को केवल तत्काल वित्तीय जरूरतों के आधार पर फैसले लेने के बजाय भविष्य की आय और खर्च का आकलन करते हुए एक दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी चाहिए। इससे वित्तीय दबाव को नियंत्रित करने और विकास कार्यों के लिए संसाधन सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।
जग्गा का मानना है कि प्रस्तावित विशेषज्ञ परिषद के गठन पर सीमित खर्च आएगा, जबकि इसके जरिए बेहतर वित्तीय प्रबंधन से निगम को दीर्घकालिक रूप से बड़ा आर्थिक लाभ हो सकता है। विशेषज्ञों की सलाह से राजस्व बढ़ाने और गैर-जरूरी खर्चों को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
उन्होंने प्रशासन से यह भी मांग की है कि सार्वजनिक धन से जुड़े बड़े वित्तीय प्रस्तावों की जांच के लिए एक मजबूत संस्थागत प्रक्रिया तैयार की जाए। किसी भी बड़े वित्तीय एजेंडे को नगर निगम सदन में रखने से पहले उसके वित्तीय प्रभाव, कानूनी स्थिति, प्रशासनिक आवश्यकता और आर्थिक व्यवहार्यता का परीक्षण किया जाना चाहिए। पर्याप्त दस्तावेजी जांच और संबंधित अधिकारियों की राय के बाद ही ऐसे प्रस्तावों को निर्णय के लिए सदन के सामने रखा जाना चाहिए।
अजय जग्गा ने कहा कि करोड़ों रुपये के वित्तीय प्रस्तावों से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण है। नगर निगम द्वारा खर्च किया जाने वाला धन सार्वजनिक संसाधनों से आता है और इसका सीधा संबंध शहरवासियों की सुविधाओं तथा विकास कार्यों से है। इसलिए इस धन के इस्तेमाल से जुड़े प्रत्येक बड़े निर्णय में स्पष्ट प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है।
उनके मुताबिक, हालिया 250 करोड़ रुपये के एजेंडा विवाद को केवल एक प्रशासनिक या राजनीतिक विवाद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह मामला नगर निगम की वित्तीय व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही मजबूत करने का अवसर भी हो सकता है। यदि स्वतंत्र लोकल बॉडीज ओम्बड्समैन और विशेषज्ञ वित्तीय सलाहकार परिषद जैसी व्यवस्थाएं लागू की जाती हैं तो निगम के कामकाज में निगरानी का दायरा बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि चंडीगढ़ प्रशासन इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करेगा और नगर निगम की वित्तीय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। साथ ही, बड़े वित्तीय प्रस्तावों के लिए स्पष्ट जांच और अनुमोदन प्रक्रिया लागू होने से भविष्य में विवादित एजेंडों को बिना पर्याप्त परीक्षण के आगे बढ़ने से रोका जा सकेगा।




