पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच दोबारा गठबंधन की संभावनाएं लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही हैं। पिछले कुछ दिनों से दोनों दलों के नेताओं के बीच बढ़ती मुलाकातों, सार्वजनिक मंचों से सामने आ रहे बदले तेवरों और राजनीतिक मुद्दों पर नरम पड़ते रुख ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। हालांकि दोनों पार्टियों की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से गठबंधन की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन घटनाक्रम जिस दिशा में बढ़ रहा है, उससे साफ है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद का सिलसिला पहले की तुलना में काफी आगे बढ़ चुका है।
संसद के मौजूदा सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात को इस पूरे घटनाक्रम की अहम कड़ी माना जा रहा है। इस मुलाकात के बाद अकाली दल के रुख में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर बदलाव देखने को मिला। खास तौर पर महिला आरक्षण और लोकसभा- विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन से जुड़े विषयों पर पार्टी के तेवर पहले की तुलना में अलग नजर आए।
इसके बाद संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में सांसद हरसिमरत कौर बादल के भाषण ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी। मंच से उन्होंने दिल्ली के साथ रिश्तों में सुधार के संकेत दिए। उनके बयान को भाजपा के साथ संबंधों को दोबारा सामान्य करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा गया।
शुक्रवार को भी अकाली दल और भाजपा के बीच संभावित समझौते को लेकर गतिविधियां सुर्खियों में रहीं। शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और भाजपा के पंजाब चुनाव प्रभारी एवं केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल के बीच हुई बैठक को राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच हुई इस मुलाकात के बाद गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
इसी दिन बटाला में रक्खड़ पुन्निया के अवसर पर दोनों पार्टियों ने अलग-अलग रैलियों का आयोजन कर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। हालांकि दोनों दलों ने अपने-अपने मंचों से कार्यकर्ताओं को संबोधित किया, लेकिन भाषणों के दौरान एक-दूसरे पर सीधा राजनीतिक हमला नहीं किया गया। न ही किसी नेता की ओर से ऐसा बयान सामने आया, जिसे दूसरे दल के खिलाफ आक्रामक टिप्पणी माना जाए।
राजनीतिक जानकार इस बदले माहौल को दोनों पार्टियों के बीच बढ़ती नजदीकी से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ समय पहले तक पंजाब में अकाली दल और भाजपा एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखाई दे रहे थे, लेकिन अब सार्वजनिक मंचों पर हमलों की तीव्रता कम होना और नेताओं के बीच संवाद बढ़ना नए समीकरणों की ओर इशारा कर रहा है।
पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में सुखबीर सिंह बादल और सीआर पाटिल के बीच हुई बैठक महज औपचारिक मुलाकात नहीं थी। बताया जा रहा है कि बैठक में आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संभावित गठबंधन के आधार और साझा एजेंडे पर चर्चा हुई। दोनों पक्ष इस बात पर विचार कर रहे हैं कि किन मुद्दों को साझा न्यूनतम कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है, ताकि यदि दोनों दल दोबारा साथ आते हैं तो चुनावी मैदान में एक संयुक्त राजनीतिक रोडमैप के साथ उतर सकें।
सूत्रों के अनुसार, बैठक में सीटों के बंटवारे से जुड़े मुद्दे पर भी प्रारंभिक स्तर पर चर्चा हुई। हालांकि अभी किसी अंतिम फार्मूले पर सहमति बनने की बात सामने नहीं आई है। सीटों का बंटवारा दोनों दलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों में से एक रहेगा। इस पर अंतिम निर्णय भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और अकाली दल के वरिष्ठ नेताओं के बीच होने वाली आगामी बैठकों के बाद ही संभव माना जा रहा है।
दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की संभावनाओं को लेकर विपक्षी दल भी घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। यदि अकाली दल और भाजपा फिर से एक साथ आते हैं तो इसका सीधा असर पंजाब की चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है। राज्य में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी यह गठजोड़ नई चुनौती पैदा कर सकता है। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच होने वाली हर महत्वपूर्ण बैठक और नेताओं के सार्वजनिक बयानों को राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है।
अकाली दल और भाजपा का पुराना गठबंधन पंजाब की राजनीति में करीब ढाई दशक तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा था। दोनों पार्टियां लंबे समय तक मिलकर चुनाव लड़ती रहीं और राज्य की सत्ता में भी साझेदार रहीं। हालांकि किसान आंदोलन के दौरान राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। कृषि कानूनों को लेकर पंजाब में किसानों के बीच पैदा हुए व्यापक असंतोष के बीच अकाली दल ने भाजपा से अपना पुराना गठबंधन तोड़ लिया था।
उस समय अकाली दल के लिए किसान समुदाय उसका प्रमुख और पारंपरिक राजनीतिक आधार माना जाता था। पार्टी नेतृत्व को आशंका थी कि भाजपा के साथ बने रहने से उसके कोर वोट बैंक पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़े और पंजाब की राजनीति में उनकी राहें पूरी तरह अलग दिखाई देने लगीं।
अब हालात पहले की तुलना में काफी बदल चुके हैं। पंजाब में राजनीतिक समीकरणों में लगातार बदलाव हो रहा है और आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सभी प्रमुख दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं। इसी पृष्ठभूमि में अकाली दल और भाजपा के बीच दोबारा नजदीकी बढ़ने की चर्चा को अहम माना जा रहा है।
भाजपा की ओर से पंजाब के लिए सीआर पाटिल को चुनाव प्रभारी बनाए जाने के बाद राजनीतिक गतिविधियों में और तेजी आई है। गुजरात भाजपा के अध्यक्ष रह चुके पाटिल को संगठन और चुनावी रणनीति में मजबूत पकड़ रखने वाला नेता माना जाता है। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के करीबी नेताओं में गिना जाता है। पंजाब की चुनावी जिम्मेदारी मिलने के बाद राज्य में पार्टी की रणनीति को लेकर उनकी सक्रियता बढ़ी है।
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीआर पाटिल और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के साथ दिल्ली में हुई बैठक ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा पैदा की थी। इसके बाद पंजाब में भाजपा की चुनावी तैयारियों और संभावित राजनीतिक सहयोगियों को लेकर अटकलें तेज हुईं। अब सुखबीर सिंह बादल और सीआर पाटिल की ताजा मुलाकात ने इन चर्चाओं को एक नया आधार दे दिया है।
हालांकि दोनों दलों के नेता अभी भी गठबंधन को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई अंतिम घोषणा करने से बच रहे हैं। राजनीतिक तौर पर यह माना जा रहा है कि दोनों पक्ष पहले साझा मुद्दों, सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश करेंगे। इसके बाद ही गठबंधन को लेकर औपचारिक तस्वीर सामने आएगी।
सबसे बड़ा सवाल सीटों के बंटवारे को लेकर है। पुराने गठबंधन के दौरान दोनों पार्टियों के बीच सीटों का एक स्थापित फार्मूला था, लेकिन बदले राजनीतिक समीकरणों के कारण इस बार परिस्थितियां अलग हैं। अकाली दल और भाजपा दोनों ही पंजाब में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सीटों की संख्या और विधानसभा क्षेत्रों के चयन को लेकर बातचीत आसान नहीं होगी।
इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि दोनों दल संभावित गठबंधन का साझा राजनीतिक एजेंडा क्या तय करते हैं। किसान, कृषि, पंजाब के आर्थिक हित, कानून-व्यवस्था, उद्योग, बेरोजगारी और केंद्र-राज्य संबंध जैसे मुद्दे चुनावी रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं। अकाली दल के लिए पंजाब में अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को फिर से मजबूत करना बड़ी चुनौती है, जबकि भाजपा राज्य में अपने संगठनात्मक विस्तार और स्वतंत्र राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने पर जोर देती रही है।
फिलहाल दोनों दलों के बीच संवाद का माहौल पहले से काफी बेहतर दिखाई दे रहा है। नेताओं की मुलाकातें, सार्वजनिक मंचों पर संयमित बयानबाजी और एक-दूसरे पर सीधे हमलों से परहेज इस बात के संकेत माने जा रहे हैं कि पर्दे के पीछे राजनीतिक बातचीत आगे बढ़ रही है।
अब सबकी नजर आगामी बैठकों पर है। यदि सीटों के बंटवारे और साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमति बनती है तो पंजाब की राजनीति में एक बड़ा चुनावी गठबंधन फिर आकार ले सकता है। हालांकि अंतिम फैसला दोनों दलों के केंद्रीय और शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी के बाद ही होगा। तब तक अकाली दल-भाजपा की बढ़ती नजदीकी पंजाब की सियासत में सबसे चर्चित राजनीतिक घटनाक्रमों में बनी रहने की संभावना है।




