30 की उम्र के बाद बढ़ रहा साइलेंट हार्ट रिस्क, स्टडी में खुलासा

30 की उम्र के बाद बढ़ रहा साइलेंट हार्ट रिस्क, स्टडी में खुलासा

भारत में हृदय रोगों के बढ़ते मामलों के पीछे एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या तेजी से उभर रही है, जिसके बारे में अधिकांश लोगों को तब तक पता ही नहीं चलता, जब तक यह गंभीर रूप नहीं ले लेती। हाल ही में सामने आई एक बड़ी रिसर्च ने संकेत दिया है कि देश के अधिकांश वयस्कों के शरीर में ब्लड फैट यानी लिपिड का स्तर सामान्य नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के बनी रहती है और धीरे-धीरे दिल व रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती रहती है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और INDIAB अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए गए व्यापक विश्लेषण में यह सामने आया कि भारत के लगभग 90 प्रतिशत वयस्कों में कम से कम एक प्रकार का ब्लड लिपिड असामान्य स्तर पर पाया गया। यह स्थिति मेडिकल भाषा में डिस्लिपिडेमिया (Dyslipidemia) कहलाती है। इसमें शरीर में मौजूद कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स जैसे वसा तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डिस्लिपिडेमिया को अक्सर लोग गंभीरता से नहीं लेते क्योंकि इसके शुरुआती चरण में शरीर किसी तरह के स्पष्ट संकेत नहीं देता। व्यक्ति पूरी तरह सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी धमनियों में वसा जमा होने लगती है। यही वजह है कि इसे कई बार साइलेंट रिस्क फैक्टर भी कहा जाता है।

शोध में देशभर के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों से हजारों लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया गया। विश्लेषण में यह पाया गया कि शहरी आबादी में रहने वाले लोगों में यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिली। इसके अलावा महिलाओं में भी डिस्लिपिडेमिया के मामलों की संख्या अधिक दर्ज की गई। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी बड़ी संख्या में इससे प्रभावित हैं।

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो मध्य भारत के राज्यों में इस समस्या का प्रसार सबसे अधिक पाया गया। वहीं पूर्वोत्तर भारत में इसकी दर अपेक्षाकृत कम रही। हालांकि राहत की बात पूरी तरह नहीं कही जा सकती, क्योंकि जिन क्षेत्रों में मामले कम थे, वहां भी लगभग हर 10 में से 8 लोगों में कम से कम एक प्रकार का असामान्य ब्लड लिपिड स्तर पाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि यह समस्या अब पूरे देश में व्यापक रूप से फैल चुकी है।

रिसर्च के दौरान यह भी देखा गया कि कुछ विशेष स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों में डिस्लिपिडेमिया का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। जिन लोगों को पहले से डायबिटीज, प्री-डायबिटीज, मोटापा या हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां हैं, उनमें ब्लड लिपिड असंतुलन की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है। डॉक्टरों का मानना है कि ये सभी बीमारियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो हृदय रोग का जोखिम तेजी से बढ़ सकता है।

इस अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक और मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ. वी. मोहन के अनुसार, हाई कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का सबसे बड़ा खतरा यही है कि व्यक्ति को इनके बारे में लंबे समय तक कोई जानकारी नहीं मिलती। केवल नियमित ब्लड टेस्ट के जरिए ही इनके स्तर का पता लगाया जा सकता है। जब तक जांच नहीं कराई जाती, तब तक धमनियों में वसा की परतें धीरे-धीरे जमा होती रहती हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब धमनियों की अंदरूनी सतह पर कोलेस्ट्रॉल और अन्य वसा तत्व जमा होने लगते हैं, तो धीरे-धीरे रक्त प्रवाह प्रभावित होने लगता है। समय के साथ ये जमाव प्लाक का रूप ले लेते हैं। यदि किसी कारण से यह प्लाक फट जाए, तो खून का थक्का बन सकता है, जो हृदय या मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाने वाली नसों को बंद कर सकता है। ऐसी स्थिति हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी जानलेवा समस्याओं का कारण बन सकती है।

जर्नल ऑफ क्लिनिकल लिपिडोलॉजी में प्रकाशित इस रिसर्च के लिए 23,665 वयस्कों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि लगभग 66.8 प्रतिशत लोगों में एचडीएल (HDL) यानी गुड कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से कम था। गुड कोलेस्ट्रॉल शरीर से अतिरिक्त वसा को हटाने और धमनियों को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी होने पर हृदय रोग का खतरा और बढ़ जाता है।

वहीं करीब 49.4 प्रतिशत प्रतिभागियों में एलडीएल (LDL) यानी बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया। इसके अलावा लगभग 29.5 प्रतिशत लोगों में ट्राइग्लिसराइड्स की मात्रा भी बढ़ी हुई मिली। डॉक्टरों के अनुसार बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स दोनों का बढ़ा हुआ स्तर धमनियों में वसा जमा होने की प्रक्रिया को तेज करता है।

रिसर्च में यह भी पाया गया कि जैसे-जैसे किसी व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) बढ़ता है, वैसे-वैसे डिस्लिपिडेमिया का खतरा भी तेजी से बढ़ने लगता है। यानी अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त लोगों में ब्लड लिपिड असंतुलन की संभावना सामान्य वजन वाले लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है। यही कारण है कि डॉक्टर संतुलित वजन बनाए रखने पर विशेष जोर देते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पहले यह माना जाता था कि हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या मुख्य रूप से बढ़ती उम्र में होती है, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। नई जीवनशैली, फास्ट फूड का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधियों में कमी, तनाव और मोटापे की वजह से यह समस्या अब 30 वर्ष की उम्र के आसपास ही दिखाई देने लगी है। कई युवाओं में भी ब्लड लिपिड का स्तर असामान्य पाया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित आहार, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और वजन नियंत्रित रखने से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जिन लोगों के परिवार में हृदय रोग, डायबिटीज या हाई कोलेस्ट्रॉल का इतिहास रहा है, उन्हें समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल जांच जरूर करानी चाहिए। साथ ही यदि डॉक्टर आवश्यकता समझें तो दवाओं और जीवनशैली में बदलाव के माध्यम से इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत में तेजी से बढ़ रही डायबिटीज, मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के बीच डिस्लिपिडेमिया एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। यदि समय रहते इसकी पहचान और इलाज पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में हृदय रोगों का बोझ और बढ़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ लोगों को सलाह देते हैं कि केवल लक्षणों का इंतजार करने के बजाय नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस साइलेंट खतरे से खुद को सुरक्षित रखें।