हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। प्रत्येक माह आने वाली पूर्णिमा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्र देव और सत्यनारायण भगवान की आराधना के लिए शुभ मानी जाती है। वहीं जब पूर्णिमा अधिक मास में पड़ती है तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है, इसलिए इस महीने में किए गए जप, तप, दान, व्रत और पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है।
इस वर्ष ज्येष्ठ अधिक मास की पूर्णिमा दो दिनों तक रहने के कारण श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न है कि व्रत किस दिन रखा जाए, स्नान-दान का शुभ समय कब रहेगा और पूजा का सही मुहूर्त कौन-सा है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 30 मई को दोपहर लगभग 12 बजे प्रारंभ होगी और 31 मई को दोपहर करीब 2:15 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर जहां व्रत और भगवान विष्णु की पूजा 30 मई को की जाएगी, वहीं पवित्र स्नान और दान का विशेष महत्व 31 मई की प्रातःकालीन बेला में माना गया है।
धर्माचार्यों का कहना है कि अधिक मास लगभग तीन वर्ष के अंतराल पर आता है। इसलिए इस अवधि में पड़ने वाली पूर्णिमा पर किए गए धार्मिक कार्यों को सामान्य पूर्णिमा की तुलना में अधिक पुण्यदायी माना जाता है। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में पंचांग के अनुसार तिथियों और विधियों में कुछ अंतर हो सकता है। ऐसे में श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य की सलाह भी ले सकते हैं।
दो दिन रहने वाली पूर्णिमा तिथि का महत्व
पंचांग के अनुसार जब कोई तिथि दो दिनों तक रहती है तो अलग-अलग धार्मिक कार्यों के लिए उदया तिथि और तिथि के समय को आधार बनाया जाता है। इसी कारण इस बार पूर्णिमा को लेकर दो अलग-अलग दिन महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत, पूजा और भगवान विष्णु की आराधना के लिए 30 मई का दिन प्रमुख रहेगा, जबकि 31 मई की सुबह स्नान, दान और तीर्थ स्नान के लिए विशेष शुभ मानी गई है।
श्रद्धालु अपनी धार्मिक परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-विधि का पालन कर सकते हैं।
अधिक मास की पूर्णिमा क्यों मानी जाती है विशेष
अधिक मास को हिंदू धर्म में पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में इसका संबंध भगवान विष्णु से बताया गया है। मान्यता है कि इस पूरे महीने में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है।
इस अवधि में भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप, श्रीमद्भागवत या विष्णु पुराण का पाठ, दान-पुण्य और सत्संग का विशेष महत्व बताया गया है। पूर्णिमा तिथि इस आध्यात्मिक साधना को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है।
इसी कारण देशभर के मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा कैसे करें
धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थान की सफाई कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पूजा में रोली, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। घी का दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक भगवान का स्मरण करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
पूजा के अंत में आरती कर परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित किया जाता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा को अधिक महत्व दिया जाता है।
पूर्णिमा पर सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा
कई धार्मिक परंपराओं में पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल सूर्यदेव को अर्घ्य देने का भी विधान बताया गया है। इसके लिए तांबे के पात्र में स्वच्छ जल, चावल, लाल पुष्प और कुमकुम मिलाकर उगते सूर्य को अर्पित किया जाता है।
अर्घ्य देते समय “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जाप करने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल में वृद्धि होती है।
अधिक मास पूर्णिमा पर स्नान, दान, सत्यनारायण कथा और पितृ तर्पण का महत्व, जानें धार्मिक मान्यताएं
पवित्र नदी में स्नान और दान का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा के दिन गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, क्षिप्रा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करना शुभ माना जाता है। यदि किसी कारणवश तीर्थ स्नान संभव न हो तो घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करने की भी परंपरा बताई गई है।
स्नान के बाद दान-पुण्य करने को भी विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद लोगों की सहायता कर सकते हैं।
धार्मिक दृष्टि से दान को सेवा और परोपकार की भावना से जोड़कर देखा जाता है।
सत्यनारायण कथा का भी है विशेष महत्व
पूर्णिमा तिथि पर भगवान सत्यनारायण की कथा सुनने और कराने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। कई परिवार इस दिन सामूहिक रूप से पूजा का आयोजन करते हैं और भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं।
संध्याकाल में चंद्रमा के उदय के बाद चंद्रदेव को दूध मिश्रित जल अर्पित करने की भी परंपरा है। इस दौरान “ॐ सों सोमाय नमः” मंत्र का जाप किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा मन और भावनाओं के कारक माने जाते हैं, इसलिए पूर्णिमा के दिन उनकी आराधना का भी विशेष महत्व बताया गया है।
जरूरतमंदों की सहायता और गौसेवा का महत्व
अधिक मास की पूर्णिमा पर दान-पुण्य को विशेष स्थान दिया गया है। परंपराओं के अनुसार इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अनाज, छाता, जूते-चप्पल या अन्य आवश्यक वस्तुएं दान की जाती हैं।
कई स्थानों पर गौशालाओं में चारा, अनाज या आर्थिक सहयोग देने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में गौसेवा को पुण्यदायी कार्य माना गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दान सदैव अपनी सामर्थ्य के अनुसार और बिना किसी दिखावे के करना चाहिए।
पितृ तर्पण और पूर्वजों के स्मरण की परंपरा
कुछ धार्मिक परंपराओं में अधिक मास पूर्णिमा के अवसर पर पितरों का स्मरण और तर्पण करना भी शुभ माना जाता है। श्रद्धालु दोपहर के समय जल अर्पित कर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं।
कुछ स्थानों पर घी और गुड़ की आहुति देकर “ॐ पितृदेवेभ्यो नमः” मंत्र का जाप करने की परंपरा भी प्रचलित है। माना जाता है कि श्रद्धा के साथ किया गया पितृ स्मरण परिवार के आध्यात्मिक संस्कारों का हिस्सा है।
पूर्णिमा पर किन बातों का रखें ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा के दिन सात्विक भोजन, संयमित व्यवहार, ईश्वर का स्मरण और सकारात्मक विचारों को महत्व दिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर पूजा-पाठ, मंत्र जाप और दान-पुण्य करते हैं।
यदि किसी विशेष पूजा-विधि, व्रत या अनुष्ठान का पालन करना हो तो अपने परिवार की परंपरा, स्थानीय पंचांग या योग्य विद्वान आचार्य के मार्गदर्शन के अनुसार विधि का पालन करना उचित माना जाता है।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं और पंचांग आधारित जानकारी पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों, संप्रदायों और पंचांगों के अनुसार तिथि, पूजा-विधि और मुहूर्त में अंतर संभव है।




