नीति आयोग की बैठक में हिमाचल की आर्थिक चुनौतियों की गूंज, CM सुक्खू ने केंद्र से मांगा विशेष वित्तीय पैकेज

नीति आयोग की बैठक में हिमाचल की आर्थिक चुनौतियों की गूंज, CM सुक्खू ने केंद्र से मांगा विशेष वित्तीय पैकेज

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की बैठक में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने राज्य के सामने खड़ी वित्तीय और विकास संबंधी चुनौतियों को प्रमुखता से उठाया। ‘विकसित भारत के लिए समावेशी मानव विकास’ विषय पर केंद्रित इस महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री ने हिमाचल की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरणीय योगदान और सीमित वित्तीय संसाधनों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक सहयोग की मांग की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश देश के लिए प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राज्य के विशाल वन क्षेत्र, जल स्रोत और पर्वतीय पारिस्थितिकी पूरे देश को लाभ पहुंचा रहे हैं, लेकिन इसके बदले हिमाचल को अपेक्षित आर्थिक सहायता नहीं मिल रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि राज्य की वास्तविक वित्तीय स्थिति का आकलन करने और उसके नुकसान का अध्ययन करने के लिए एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित की जाए।

मानव विकास में हिमाचल की उपलब्धियां रखीं सामने

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सुक्खू ने हिमाचल प्रदेश की शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में हुई उल्लेखनीय प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद राज्य ने मानव विकास सूचकांकों में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है।

मुख्यमंत्री के अनुसार, वर्ष 2025 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण साक्षर राज्य घोषित किया गया, जो प्रदेश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इसके अलावा, स्कूल शिक्षा प्रदर्शन ग्रेडिंग सूचकांक में भी राज्य ने उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। उन्होंने बताया कि जब उनकी सरकार ने वर्ष 2022 में सत्ता संभाली थी, तब हिमाचल इस सूचकांक में 21वें स्थान पर था, लेकिन निरंतर सुधारों और शिक्षा क्षेत्र में निवेश के कारण अब प्रदेश छठे स्थान पर पहुंच चुका है।

उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी राज्य की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश का सकल नामांकन अनुपात 43 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह दर्शाता है कि प्रदेश में युवाओं के लिए शिक्षा के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं और सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी हिमाचल देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। उन्होंने कहा कि पहाड़ी प्रदेश होने के बावजूद राज्य ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में कई मानक स्थापित किए हैं।

राजस्व घाटा अनुदान बंद होने से बढ़ी मुश्किलें

मुख्यमंत्री सुक्खू ने बैठक में राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) की समाप्ति ने हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है। पर्वतीय राज्यों की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए पहले जो सहायता मिलती थी, उसके बंद होने से राज्य की विकास योजनाओं और वित्तीय संतुलन पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा अब तक प्रदान की गई लगभग 25,000 करोड़ रुपये की सहायता राशि राज्य की वास्तविक जरूरतों की तुलना में अपर्याप्त है। हिमाचल को हुए वित्तीय नुकसान और विकास कार्यों की आवश्यकताओं को देखते हुए इस सहायता को बढ़ाकर 50,000 करोड़ रुपये किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार विकास कार्यों की गति बनाए रखने और जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार का अतिरिक्त सहयोग राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

जीएसटी व्यवस्था से राजस्व पर पड़ा असर

मुख्यमंत्री ने बैठक में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली के कारण राज्य को हुए आर्थिक नुकसान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद हिमाचल प्रदेश को पिछले आठ वर्षों के दौरान लगभग 25,000 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ा है।

उन्होंने बताया कि औद्योगिक गतिविधियों और कर संग्रहण के ढांचे में आए बदलावों का असर राज्य की आय पर पड़ा है। पहाड़ी राज्यों के लिए राजस्व जुटाने के अवसर सीमित होते हैं, इसलिए इस तरह के नुकसान का सीधा प्रभाव विकास योजनाओं और सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ता है।

मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि हिमाचल जैसे विशेष श्रेणी के राज्यों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वित्तीय सहायता और मुआवजे की व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाए।

पर्यावरण संरक्षण में हिमाचल की भूमिका पर जोर

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सुक्खू ने हिमाचल प्रदेश के पर्यावरणीय योगदान का भी विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज्य केवल अपने नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक है।

उन्होंने भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि हिमाचल प्रदेश हर वर्ष लगभग 90,000 करोड़ रुपये मूल्य की पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय सेवाएं देश को प्रदान करता है। इनमें स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, जैव विविधता संरक्षण, कार्बन अवशोषण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण शामिल है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के बड़े वन क्षेत्र और प्राकृतिक संपदा का लाभ पूरे देश को मिलता है, लेकिन इसके बदले प्रदेश को कोई पर्याप्त आर्थिक प्रतिपूर्ति नहीं मिलती। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने वाले राज्यों के लिए विशेष आर्थिक मॉडल तैयार किया जाए ताकि उन्हें उनके योगदान के अनुरूप सहायता मिल सके।

ऊर्जा उत्पादन के बावजूद अपेक्षित लाभ नहीं

मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश के जल विद्युत क्षेत्र का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में लगभग 13,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है और देश की ऊर्जा सुरक्षा में हिमाचल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इसके बावजूद राज्य को मुफ्त बिजली और अन्य वित्तीय लाभों में अपेक्षित हिस्सा नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि जल विद्युत परियोजनाओं से होने वाले लाभों का अधिक न्यायसंगत वितरण होना चाहिए ताकि प्रदेश के विकास कार्यों को मजबूती मिल सके।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण और रखरखाव काफी महंगा होता है। ऐसे में ऊर्जा उत्पादन से जुड़े लाभों का उचित हिस्सा राज्य को मिलना आवश्यक है।

बीबीएमबी के बकाये का मुद्दा भी उठाया

बैठक में मुख्यमंत्री ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से जुड़े वित्तीय मामलों को भी प्रमुखता से रखा। उन्होंने बताया कि बीबीएमबी के पास हिमाचल प्रदेश का लगभग 7,000 करोड़ रुपये बकाया है, जिसका भुगतान अभी तक नहीं किया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह राशि राज्य के विकास कार्यों और सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप कर लंबित बकाये के शीघ्र समाधान का अनुरोध किया।

प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान का भी किया जिक्र

मुख्यमंत्री सुक्खू ने हाल के वर्षों में हिमाचल प्रदेश में आई प्राकृतिक आपदाओं का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं ने राज्य को व्यापक नुकसान पहुंचाया है। सड़कें, पुल, जलापूर्ति योजनाएं और अन्य सार्वजनिक ढांचे प्रभावित हुए हैं।

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित 1,500 करोड़ रुपये की विशेष सहायता राशि अभी तक राज्य को प्राप्त नहीं हुई है। मुख्यमंत्री ने आग्रह किया कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और राहत कार्यों को गति देने के लिए इस राशि को जल्द जारी किया जाए।

उन्होंने कहा कि पर्वतीय राज्यों को जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना अधिक करना पड़ता है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता है।

संतुलित विकास के लिए विशेष सहयोग की मांग

अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि हिमाचल प्रदेश देश के विकास में लगातार योगदान दे रहा है, लेकिन वित्तीय और भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए राज्य को विशेष सहायता की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि केंद्र सरकार राज्य की मांगों पर सकारात्मक विचार करेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि हिमाचल प्रदेश को पर्याप्त वित्तीय सहयोग मिलता है, तो राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास के क्षेत्र में और बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। उन्होंने केंद्र से सहयोगात्मक संघवाद की भावना के अनुरूप हिमाचल की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने की अपील की।

नीति आयोग की इस बैठक में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, सदस्य, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और विभिन्न राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे। हिमाचल प्रदेश की ओर से मुख्य सचिव के.के. पंत ने भी बैठक में भाग लिया। मुख्यमंत्री द्वारा उठाए गए मुद्दों को राज्य के आर्थिक भविष्य और विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।