श्रावण मास का इंतजार भगवान शिव के भक्त पूरे वर्ष करते हैं। हिंदू धर्म में इस महीने को शिव आराधना के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। सावन की शुरुआत के साथ ही देशभर में कांवड़ यात्रा का भी शुभारंभ हो जाता है। लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख और अन्य पवित्र गंगा घाटों से गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों तक पैदल यात्रा करते हैं और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए की गई कांवड़ यात्रा भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
साल 2026 में भी सावन के आगमन के साथ कांवड़ यात्रा की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। उत्तर भारत के कई राज्यों से लाखों श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचेंगे और वहां से पवित्र गंगाजल लेकर अपने गांव, कस्बों और शहरों के शिव मंदिरों तक पैदल यात्रा करेंगे। हरिद्वार की सड़कें एक बार फिर “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंजती दिखाई देंगी।
हरिद्वार के ज्योतिषाचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, वर्ष 2026 में श्रावण मास की शुरुआत 29 जुलाई, बुधवार की रात 8 बजकर 6 मिनट से होगी। हालांकि धार्मिक कार्यों में उदया तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इसी कारण श्रावण कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा की उदया तिथि 30 जुलाई, गुरुवार को पड़ रही है। इसी दिन से कांवड़ यात्रा का विधिवत शुभारंभ माना जाएगा और श्रद्धालु जल भरकर अपनी यात्रा आरंभ कर सकेंगे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के दौरान भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसी वजह से हर वर्ष लाखों कांवड़िए गंगा तटों तक पहुंचते हैं, स्नान करते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ अपने कंधों पर कांवड़ रखकर लंबी दूरी तय करते हैं। कई श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने आराध्य भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं। इस दौरान भक्त नियम, संयम और पूजा-पाठ का विशेष ध्यान रखते हैं।
पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि इस वर्ष 30 जुलाई से श्रद्धालु अपनी सुविधा और संकल्प के अनुसार कांवड़ यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं। कोई एक-दो दिन में यात्रा पूरी करता है तो कुछ भक्त कई दिनों तक पैदल चलकर अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। श्रद्धालु यात्रा के दौरान भगवान शिव के भजन गाते हुए और “बम-बम भोले” के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं।
कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं बल्कि अनुशासन, सेवा और समर्पण का भी संदेश देती है। रास्ते में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं की ओर से कांवड़ियों के लिए भोजन, चिकित्सा, विश्राम और पेयजल जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। बड़ी संख्या में स्वयंसेवक भी सेवा कार्यों में जुटे रहते हैं ताकि यात्रियों को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
जलाभिषेक की तिथि को लेकर भी श्रद्धालुओं में काफी उत्सुकता रहती है। पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, 30 जुलाई से यात्रा शुरू करने वाले श्रद्धालु 10 अगस्त की रात 8 बजे के बाद भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने की तैयारी कर सकते हैं। पंचांग की गणना के अनुसार इस बार तिथियों के विशेष संयोग और त्रयोदशी तिथि के क्षय के कारण 11 अगस्त को जलाभिषेक का शुभ समय प्राप्त होगा। इसी दिन बड़ी संख्या में शिवालयों में गंगाजल चढ़ाकर श्रद्धालु अपनी कांवड़ यात्रा का समापन करेंगे।
धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि भगवान शिव को गंगाजल अत्यंत प्रिय है। यही कारण है कि सावन के महीने में गंगा से लाया गया जल विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ यह जल शिवलिंग पर अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, संतान, रोजगार तथा अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
हरिद्वार कांवड़ यात्रा का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां हर की पैड़ी समेत विभिन्न घाटों पर लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान करने के बाद कांवड़ में जल भरते हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और अन्य राज्यों के शिव भक्त अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना होते हैं। यात्रा के दौरान कई स्थानों पर शिविर लगाए जाते हैं, जहां भक्तों को विश्राम और भोजन की व्यवस्था मिलती है।
कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु कुछ धार्मिक नियमों का भी पालन करते हैं। अधिकांश कांवड़िए सात्विक भोजन करते हैं, नशे से दूर रहते हैं और यात्रा के दौरान कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते। कई भक्त नंगे पैर पूरी यात्रा करते हैं, जबकि कुछ लोग डाक कांवड़ के माध्यम से कम समय में जल लेकर अपने मंदिर तक पहुंचते हैं। सभी भक्त अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार यात्रा पूरी करते हैं।
सावन का महीना भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान सोमवार का व्रत, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा एवं भांग अर्पित करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। कांवड़ यात्रा इसी आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें देशभर से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
साल 2026 में कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होकर त्रयोदशी तिथि तक जारी रहेगी। इसके बाद 11 अगस्त को शुभ मुहूर्त में भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक किया जाएगा। श्रद्धालु इसी दिन अपनी यात्रा पूर्ण कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। हरिद्वार समेत पूरे उत्तर भारत में इस दौरान धार्मिक उल्लास का माहौल देखने को मिलेगा और शिवभक्ति की रंगत चारों ओर छाई रहेगी। श्रद्धालुओं को उम्मीद है कि इस वर्ष भी कांवड़ यात्रा पूरी श्रद्धा, उत्साह और भक्ति के साथ संपन्न होगी तथा भगवान भोलेनाथ सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।




