क्या आप जानते हैं? भारत आखिर क्यों देना चाहता है इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल, चीन क्यों है परेशान

क्या आप जानते हैं? भारत आखिर क्यों देना चाहता है इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल, चीन क्यों है परेशान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जुलाई से तीन देशों—इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया—की महत्वपूर्ण विदेश यात्रा पर रवाना हो रहे हैं। इस दौरे में सबसे अधिक नजरें इंडोनेशिया पर टिकी हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) से जुड़े कई अहम मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है। माना जा रहा है कि यह साझेदारी सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक तस्वीर को भी प्रभावित कर सकती है।

भारत और इंडोनेशिया पिछले कुछ वर्षों से अपने संबंधों को नई दिशा देने में जुटे हैं। व्यापार, रक्षा, समुद्री सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच लगातार संवाद बढ़ा है। अब चर्चा इस बात की है कि इंडोनेशिया भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली की अतिरिक्त खरीद करना चाहता है। इससे पहले दोनों देशों के बीच एक ब्रह्मोस बैटरी को लेकर शुरुआती समझौता हो चुका है।

सूत्रों के अनुसार, इंडोनेशिया ने भविष्य में और ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम लेने में भी रुचि दिखाई है। हालांकि, इसके लिए उसने भारत से आसान शर्तों पर वित्तीय सहायता या क्रेडिट लाइन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। यदि दोनों देशों के बीच इस दिशा में सहमति बनती है, तो यह भारत के रक्षा निर्यात के लिए एक बड़ा कदम माना जाएगा।

इंडोनेशिया की यह जरूरत उसकी समुद्री सुरक्षा से जुड़ी है। दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री इलाकों में बढ़ती गतिविधियों के बीच जकार्ता अपनी तटीय सुरक्षा को मजबूत करना चाहता है। आधुनिक मिसाइल प्रणाली उसके रक्षा ढांचे को नई मजबूती दे सकती है। ब्रह्मोस अपनी तेज गति, सटीक निशाने और समुद्री लक्ष्यों को भेदने की क्षमता के कारण दुनिया की सबसे प्रभावी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है।

दूसरी ओर, भारत की दिलचस्पी इंडोनेशिया के विशाल खनिज संसाधनों में है। खासकर निकल (Nickel) और रेयर अर्थ मिनरल्स ऐसे संसाधन हैं जिनकी मांग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियां, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए इन खनिजों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। भारत भी भविष्य की औद्योगिक जरूरतों को देखते हुए इन संसाधनों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है।

इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े निकल उत्पादक देशों में शामिल है। भारत पहले से ही अपने स्टील उद्योग के लिए बड़ी मात्रा में फेरोनिकल इंडोनेशिया से आयात करता है। आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर के विस्तार के साथ निकल की जरूरत और बढ़ने वाली है। ऐसे में नई दिल्ली चाहती है कि इंडोनेशिया के साथ दीर्घकालिक साझेदारी स्थापित कर सप्लाई चेन को अधिक मजबूत बनाया जाए।

माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों की कंपनियों के बीच खनिज प्रसंस्करण (Mineral Processing), रिफाइनिंग और संयुक्त निवेश को लेकर भी कई समझौतों पर चर्चा हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो भारत को सिर्फ कच्चा माल ही नहीं बल्कि वैल्यू एडिशन वाले उद्योगों में भी फायदा मिल सकता है।

इस पूरी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन भी है। इंडोनेशिया के निकल उद्योग में चीनी कंपनियों का बड़ा निवेश है और वहां की प्रसंस्करण क्षमता का बड़ा हिस्सा चीन से जुड़ी कंपनियों के प्रभाव में माना जाता है। हालांकि, इंडोनेशिया अब अपने आर्थिक साझेदारों का दायरा बढ़ाना चाहता है ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके। भारत भी लंबे समय से महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में चीन पर निर्भरता घटाने की दिशा में काम कर रहा है।

यही कारण है कि रक्षा और खनिज क्षेत्र में भारत-इंडोनेशिया सहयोग को रणनीतिक नजरिए से काफी अहम माना जा रहा है। यदि यह साझेदारी मजबूत होती है, तो दोनों देशों को आर्थिक और सामरिक दोनों स्तरों पर लाभ मिल सकता है।

इस पूरे समीकरण में ग्रेट निकोबार द्वीप की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत का यह द्वीप इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के काफी करीब स्थित है। यही भौगोलिक निकटता दोनों देशों को हिंद महासागर क्षेत्र में स्वाभाविक साझेदार बनाती है।

भारत फिलहाल ग्रेट निकोबार में बड़े स्तर पर आधारभूत ढांचे का विकास कर रहा है। यहां अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, आधुनिक एयरपोर्ट और सैन्य सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह क्षेत्र हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक ताकत को काफी बढ़ा सकता है।

ग्रेट निकोबार के पास स्थित मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच होने वाला बड़ा समुद्री व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। चीन के लिए भी ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है।

भारत और इंडोनेशिया यदि समुद्री सुरक्षा में सहयोग बढ़ाते हैं तो मलक्का क्षेत्र में निगरानी और समन्वय बेहतर हो सकता है। इससे दोनों देशों की समुद्री सुरक्षा क्षमता मजबूत होगी। हालांकि, यह कहना उचित नहीं होगा कि इसका उद्देश्य किसी एक देश को रोकना है, लेकिन इतना जरूर है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने में इस तरह की साझेदारियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इंडोनेशिया के लिए भारत के साथ रक्षा सहयोग कई मायनों में लाभदायक हो सकता है। उसे आधुनिक मिसाइल प्रणाली, नौसैनिक सहयोग और सैन्य तकनीक का लाभ मिलेगा। वहीं भारत को विश्वसनीय रक्षा साझेदार के रूप में नई पहचान मिलने के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने का अवसर मिलेगा।

भारत पहले ही फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति कर चुका है। वियतनाम के साथ भी रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। यदि इंडोनेशिया के साथ भी बड़ा समझौता अंतिम रूप लेता है, तो दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की रक्षा कूटनीति को नई मजबूती मिलेगी।

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि कई मुद्दों पर बातचीत अभी शुरुआती चरण में है और अंतिम निर्णय दोनों देशों के बीच औपचारिक चर्चा के बाद ही होंगे। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत और इंडोनेशिया अपने संबंधों को पारंपरिक व्यापार से आगे ले जाकर रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में विस्तार देना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स, रक्षा उत्पादन और समुद्री सुरक्षा वैश्विक राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण विषय बनेंगे। ऐसे में भारत का इंडोनेशिया के साथ बढ़ता सहयोग केवल एक द्विपक्षीय समझौता नहीं बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरणों का हिस्सा माना जा रहा है।

यदि प्रस्तावित योजनाएं तय दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो भारत को रक्षा निर्यात, ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास में लाभ मिल सकता है। वहीं इंडोनेशिया को अपनी सैन्य क्षमता मजबूत करने, निवेश बढ़ाने और वैश्विक सप्लाई चेन में अधिक संतुलित भागीदारी का अवसर मिलेगा। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के भविष्य के संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।