लिवर से जुड़ी बीमारियों में हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis B) एक गंभीर वायरल संक्रमण माना जाता है। यह बीमारी हेपेटाइटिस-बी वायरस (HBV) के कारण होती है और दुनिया भर में करोड़ों लोग इससे प्रभावित हैं। चिकित्सा विज्ञान में इसके इलाज, रोकथाम और प्रबंधन को लेकर काफी प्रगति हुई है, लेकिन समाज में आज भी इस बीमारी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां मौजूद हैं। यही कारण है कि कई मरीजों को बीमारी से ज्यादा सामाजिक भेदभाव और गलत जानकारी का सामना करना पड़ता है।
विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार लोगों से इस संक्रमण के बारे में सही जानकारी लेने और अफवाहों से बचने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि हेपेटाइटिस-बी को लेकर फैले मिथकों को दूर करना बेहद जरूरी है, क्योंकि सही जानकारी न केवल संक्रमण को रोकने में मदद करती है बल्कि मरीजों के प्रति सकारात्मक व्यवहार भी सुनिश्चित करती है। आइए जानते हैं कि इस बीमारी से जुड़े कौन-कौन से आम भ्रम हैं और उनकी वास्तविकता क्या है।
क्या सामान्य संपर्क से फैलता है हेपेटाइटिस-बी?
सबसे ज्यादा फैलने वाली गलतफहमियों में से एक यह है कि यदि किसी संक्रमित व्यक्ति से हाथ मिला लिया जाए, उसे गले लगा लिया जाए या उसके पास बैठा जाए तो संक्रमण हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञ इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हैं।
हेपेटाइटिस-बी वायरस सामान्य सामाजिक संपर्क से नहीं फैलता। किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ बैठने, बातचीत करने, हाथ मिलाने, गले लगाने, छींकने, खांसने या सामान्य स्पर्श से यह संक्रमण नहीं होता। इसलिए मरीज को समाज से अलग करना या उससे दूरी बनाना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित रक्त, असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुई या चिकित्सा उपकरणों के जरिए फैलता है। इसलिए संक्रमण से बचाव के लिए सही सावधानियाँ अपनाना ज़रूरी है, न कि मरीज से सामाजिक दूरी बनाना।
क्या हेपेटाइटिस-बी का मतलब निश्चित मौत है?
कई लोगों का मानना है कि यदि किसी को हेपेटाइटिस-बी हो गया तो उसकी जान बचाना मुश्किल है। हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञ इस सोच को भी गलत मानते हैं।
आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए और मरीज नियमित रूप से डॉक्टर की सलाह का पालन करे तो हेपेटाइटिस-बी को लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है। कई मरीज सामान्य जीवन जीते हैं और उन्हें गंभीर जटिलताओं का सामना नहीं करना पड़ता।
डॉक्टरों का कहना है कि खतरा तब बढ़ता है जब मरीज इलाज में लापरवाही करता है, नियमित जांच नहीं करवाता या अत्यधिक शराब और तंबाकू का सेवन करता है। ऐसी स्थिति में लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
क्या संक्रमित मां अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करा सकती?
गर्भवती महिलाओं और नई माताओं के बीच यह डर अक्सर देखा जाता है कि यदि उन्हें हेपेटाइटिस-बी है तो वे अपने बच्चे को दूध नहीं पिला सकतीं। लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञ इस धारणा को भी मिथक बताते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में मां के दूध से हेपेटाइटिस-बी वायरस नहीं फैलता। यदि नवजात को जन्म के तुरंत बाद हेपेटाइटिस-बी का टीका और आवश्यक इम्युनोग्लोब्युलिन समय पर दे दिया जाए तो संक्रमण का खतरा काफी कम किया जा सकता है।
हालांकि यदि मां के निप्पल में गहरी दरार हो या रक्तस्राव हो रहा हो तो डॉक्टर से सलाह लेकर कुछ समय के लिए स्तनपान रोकने की सलाह दी जा सकती है। इसके अलावा सामान्य स्थिति में स्तनपान सुरक्षित माना जाता है।
क्या एक साथ खाना खाने से संक्रमण फैल सकता है?
बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि यदि वे किसी हेपेटाइटिस-बी संक्रमित व्यक्ति के साथ खाना खाएंगे या एक ही गिलास अथवा प्लेट का उपयोग करेंगे तो उन्हें भी संक्रमण हो जाएगा।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह धारणा भी पूरी तरह गलत है। भोजन साझा करने, पानी पीने, चम्मच, प्लेट या अन्य सामान्य बर्तनों के इस्तेमाल से हेपेटाइटिस-बी वायरस नहीं फैलता।
इसी तरह कार्यालय, स्कूल, कॉलेज या घर में एक साथ रहने से भी संक्रमण नहीं होता। इसलिए मरीजों के साथ सामान्य व्यवहार करना चाहिए और उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग नहीं करना चाहिए।
क्या वैक्सीन सिर्फ औपचारिकता है?
कुछ लोगों का मानना है कि हेपेटाइटिस-बी का टीका ज्यादा प्रभावी नहीं होता या इससे भविष्य में होने वाले गंभीर लिवर रोगों से बचाव नहीं हो सकता। विशेषज्ञ इस सोच को बेहद खतरनाक बताते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार हेपेटाइटिस-बी की वैक्सीन इस वायरस से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि कोई व्यक्ति पहले से संक्रमित नहीं है और उसे निर्धारित समय के अनुसार टीका लगाया जाता है, तो संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
चूंकि लंबे समय तक रहने वाला हेपेटाइटिस-बी संक्रमण लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है, इसलिए टीकाकरण अप्रत्यक्ष रूप से इन गंभीर जटिलताओं के जोखिम को भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि लिवर कैंसर केवल हेपेटाइटिस-बी की वजह से ही नहीं होता। अत्यधिक शराब का सेवन, फैटी लिवर, हेपेटाइटिस-सी और अन्य कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
संक्रमण से बचने के लिए किन बातों का रखें ध्यान
विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए कुछ आसान लेकिन प्रभावी उपाय अपनाए जा सकते हैं। सबसे पहले समय पर वैक्सीन लगवाना जरूरी है। इसके अलावा हमेशा नई और स्टरलाइज़्ड सुई का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी भी तरह के रक्त संक्रमण से पहले रक्त की उचित जांच होना आवश्यक है। असुरक्षित यौन संबंधों से बचना भी संक्रमण रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि परिवार में किसी सदस्य को हेपेटाइटिस-बी है तो बाकी सदस्यों को भी डॉक्टर की सलाह लेकर अपनी जांच करवानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर टीकाकरण कराना चाहिए।
समय पर जांच क्यों है जरूरी
कई बार हेपेटाइटिस-बी संक्रमण शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाता। ऐसे में व्यक्ति वर्षों तक इस वायरस से संक्रमित रह सकता है और उसे इसकी जानकारी भी नहीं होती। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक लिवर को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति को संक्रमित रक्त के संपर्क का इतिहास रहा हो, परिवार में किसी सदस्य को हेपेटाइटिस-बी हो, या वह जोखिम वाले समूह में आता हो, तो समय-समय पर जांच कराना बेहतर माना जाता है। शुरुआती पहचान होने पर उपचार और निगरानी अधिक प्रभावी साबित होती है।
मरीजों के साथ भेदभाव नहीं, सहयोग करें
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित व्यक्ति को समाज से अलग करने की बजाय उसे मानसिक और सामाजिक सहयोग की जरूरत होती है। गलत धारणाओं के कारण कई मरीज तनाव, अवसाद और सामाजिक उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।
यदि परिवार, कार्यस्थल और समाज में लोग इस बीमारी के बारे में सही जानकारी रखें तो मरीज बिना किसी डर के सामान्य जीवन जी सकते हैं। जागरूकता बढ़ाना ही संक्रमण की रोकथाम और मरीजों के बेहतर जीवन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
सही जानकारी ही सबसे बड़ा बचाव
हेपेटाइटिस-बी को लेकर फैली अफवाहें और मिथक अक्सर लोगों को गलत फैसले लेने के लिए मजबूर कर देते हैं। जबकि वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि यह संक्रमण सामान्य संपर्क, साथ बैठने या भोजन साझा करने से नहीं फैलता। समय पर टीकाकरण, सुरक्षित जीवनशैली, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह का पालन करके इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसे में जरूरी है कि लोग अफवाहों की बजाय प्रमाणित चिकित्सीय जानकारी पर भरोसा करें और हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित लोगों के प्रति संवेदनशील और सहयोगात्मक रवैया अपनाएं।




