हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में खनन गतिविधियों को लेकर अपनी नीति को और अधिक सख्त करने का संकेत दिया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार का उद्देश्य केवल खनिजों से राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से खनन को बढ़ावा देना है। उन्होंने अधिकारियों को दो टूक शब्दों में कहा कि अवैध खनन के मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
बुधवार को राज्य सचिवालय में उद्योग विभाग के अंतर्गत खनन विंग की विस्तृत समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री ने पिछले तीन वर्षों के दौरान खनन क्षेत्र की प्रगति, राजस्व संग्रह, पर्यावरण संरक्षण, खनिज नीति और भविष्य की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। बैठक में उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान, प्रधान सचिव एम. सुधा देवी, पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव डॉ. सुशील कुमार सिंगला, उद्योग निदेशक विवेक भाटिया, हिमकोस्ट के संयुक्त सदस्य सचिव डॉ. सुरेश चंद अत्री सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है और यहां उपलब्ध खनिज राज्य की आर्थिक मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सरकार की प्राथमिकता यह है कि इन संसाधनों का उपयोग पूरी पारदर्शिता, वैज्ञानिक योजना और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप किया जाए, ताकि वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के हित भी सुरक्षित रह सकें।
समीक्षा बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार राज्य में पिछले तीन वर्षों के दौरान खनिजों से प्राप्त राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। मुख्यमंत्री ने बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 में मुख्य और लघु खनिजों से प्रदेश को लगभग 200 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था, जबकि वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर करीब 340 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यानी तीन वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
सरकार का मानना है कि यह वृद्धि खनन व्यवस्था में पारदर्शिता, निगरानी तंत्र को मजबूत करने और राजस्व संग्रह प्रणाली में सुधार का परिणाम है। मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि भविष्य में भी इसी तरह जवाबदेही और ईमानदारी के साथ काम जारी रखा जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि खनन से प्राप्त होने वाला राजस्व राज्य के विकास कार्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस राशि का उपयोग सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सिंचाई और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास में किया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि राजस्व संग्रह की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बनाई जाए तथा किसी भी प्रकार की अनियमितता को समाप्त किया जाए।
हालांकि राजस्व में वृद्धि के बावजूद मुख्यमंत्री ने सीमावर्ती राज्यों की कुछ नीतियों पर चिंता भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे पड़ोसी राज्यों द्वारा हिमाचल प्रदेश से भेजे जाने वाले लघु खनिजों पर अतिरिक्त कर और शुल्क लगाए जाने से प्रदेश के खनिज कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों से खनिजों की आपूर्ति प्रभावित हुई है और राज्य के राजस्व पर भी असर देखने को मिला है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि इस विषय का विस्तृत अध्ययन किया जाए और संबंधित राज्यों के साथ सभी वैधानिक एवं प्रशासनिक माध्यमों से बातचीत की जाए। यदि आवश्यकता पड़े तो इस मुद्दे को उचित कानूनी मंचों पर भी उठाया जाए, ताकि हिमाचल प्रदेश के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 के बाद से चूना पत्थर की रॉयल्टी दरों में कोई संशोधन नहीं किया गया है। समय के साथ खनन लागत, परिवहन व्यय और अन्य खर्चों में लगातार वृद्धि हुई है, लेकिन रॉयल्टी दरें पुराने स्तर पर बनी हुई हैं। इससे राज्य को मिलने वाले राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश इस विषय को केंद्र सरकार के समक्ष मजबूती से उठाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि इस संबंध में विस्तृत तथ्य और वित्तीय आंकड़े तैयार किए जाएं ताकि राज्य का पक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके। उनका कहना था कि प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का वैधानिक अधिकार है और राज्य को उसका उचित आर्थिक लाभ भी मिलना चाहिए।
समीक्षा बैठक में पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता, घने वन, पर्वतीय पारिस्थितिकी और स्वच्छ नदियों से है। इसलिए विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि खनन गतिविधियां केवल उन्हीं क्षेत्रों में संचालित की जाएं जहां वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद अनुमति प्रदान की गई हो। खनिजों के दोहन के दौरान पर्यावरणीय मानकों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाए और किसी भी प्रकार की लापरवाही सामने आने पर संबंधित एजेंसियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि खनन परियोजनाओं की नियमित निगरानी की जाए। आधुनिक तकनीक, ड्रोन सर्विलांस, जीआईएस मैपिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसे उपायों का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए, ताकि अवैध गतिविधियों पर समय रहते रोक लगाई जा सके। उन्होंने कहा कि तकनीक का बेहतर इस्तेमाल पारदर्शिता बढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता भी बढ़ाएगा।
बैठक में यह भी कहा गया कि प्रदेश के नदी-नालों, वन क्षेत्रों और संवेदनशील पर्वतीय इलाकों में किसी भी प्रकार की अवैध खुदाई या अंधाधुंध खनन गतिविधि को बिल्कुल भी अनुमति नहीं दी जाएगी। प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिन क्षेत्रों में खनन की अनुमति दी गई है वहां भी निर्धारित सीमा से अधिक खनन न होने पाए। प्रत्येक परियोजना की समय-समय पर समीक्षा की जाए और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित लाइसेंसधारकों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए।
अवैध खनन को लेकर मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सरकार की नीति इस मामले में “जीरो टॉलरेंस” की है। किसी भी व्यक्ति या संस्था को नियमों की अनदेखी कर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अवैध खनन न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाता है बल्कि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर भी गंभीर प्रभाव डालता है।
उन्होंने संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि पुलिस, राजस्व विभाग, उद्योग विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए, ताकि अवैध खनन की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो सके। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण अभियान चलाए जाएं और दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्य सरकार खनन क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए डिजिटल व्यवस्था को और मजबूत करेगी। खनिजों के परिवहन, परमिट जारी करने और रॉयल्टी संग्रह की प्रक्रिया को अधिक आधुनिक और ऑनलाइन बनाया जाएगा, जिससे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की संभावनाओं को कम किया जा सके।
उन्होंने अधिकारियों से कहा कि खनन गतिविधियों से जुड़े सभी रिकॉर्ड समय-समय पर अपडेट किए जाएं और विभागीय कार्यप्रणाली को अधिक जवाबदेह बनाया जाए। यदि कहीं प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की नीति पर काम कर रही है। प्रदेश में आधारभूत ढांचे के निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों के लिए खनिजों की आवश्यकता बनी रहेगी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जाए। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खनन, पर्यावरणीय स्वीकृतियों का पालन और स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा—इन तीनों को साथ लेकर ही आगे बढ़ना होगा।
बैठक के दौरान अधिकारियों ने खनन क्षेत्र में लागू विभिन्न योजनाओं, निरीक्षण अभियानों, राजस्व संग्रह व्यवस्था और भविष्य की कार्ययोजना की भी जानकारी दी। मुख्यमंत्री ने सभी विभागों को आपसी समन्वय के साथ काम करने के निर्देश देते हुए कहा कि राज्य की आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से यह समीक्षा बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हिमाचल प्रदेश में अवैध खनन का मुद्दा समय-समय पर चर्चा का विषय रहा है। सरकार अब इस क्षेत्र में सख्ती, पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी बढ़ाकर एक ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहती है, जिससे राजस्व में वृद्धि के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सके।
राज्य सरकार का मानना है कि यदि खनन क्षेत्र में पारदर्शी नीतियां, सख्त निगरानी और पर्यावरणीय मानकों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया गया तो आने वाले वर्षों में हिमाचल प्रदेश न केवल अपने राजस्व में और वृद्धि कर सकेगा, बल्कि सतत विकास और प्राकृतिक संरक्षण का संतुलित मॉडल भी प्रस्तुत करेगा। इसी उद्देश्य के साथ मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि आर्थिक लाभ और पर्यावरण सुरक्षा दोनों सरकार की प्राथमिकता हैं तथा अवैध खनन के खिलाफ अभियान भविष्य में और अधिक सख्ती के साथ जारी रहेगा।




