बेअदबी और मानवाधिकार मुद्दे पर विधानसभा में सियासी संग्राम, हरपाल चीमा ने अकाली दल को भी कटघरे में खड़ा किया

बेअदबी और मानवाधिकार मुद्दे पर विधानसभा में सियासी संग्राम, हरपाल चीमा ने अकाली दल को भी कटघरे में खड़ा किया

चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सोमवार को बेअदबी की घटनाओं और राज्य में पूर्व समय में हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। शिरोमणि अकाली दल के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली की ओर से उठाए गए मुद्दे पर वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने सरकार की ओर से जवाब देते हुए कांग्रेस के साथ-साथ अकाली दल और भाजपा को भी निशाने पर लिया। चीमा ने कहा कि पंजाब में जिन गंभीर घटनाओं के पीड़ित आज तक न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनके मामले में केवल कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराकर अकाली दल अपनी भूमिका से बच नहीं सकता।

वित्त मंत्री ने कहा कि पंजाब के इतिहास से जुड़े संवेदनशील मामलों पर राजनीति करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि अलग-अलग सरकारों ने सत्ता में रहते हुए पीड़ितों के लिए क्या कदम उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासन के दौरान कई गंभीर घटनाएं हुईं, लेकिन बाद में सत्ता में आई अकाली दल-भाजपा सरकार भी उन मामलों में अपेक्षित न्याय सुनिश्चित नहीं कर सकी।

सदन में चर्चा के दौरान अकाली विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़े मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि आज विपक्ष इन मामलों को लेकर सवाल उठा रहा है, लेकिन जब अकाली दल और भाजपा सत्ता में थे, तब इन मुद्दों को उसी मजबूती से क्यों नहीं उठाया गया।

चीमा ने आरोप लगाया कि सत्ता में रहने के दौरान कई नेताओं ने इन मामलों पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई, लेकिन विपक्ष में आने के बाद वही मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गए हैं। उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवारों को वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ा और अलग-अलग सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन मामलों के समाधान की दिशा में ठोस परिणाम सामने नहीं आए।

वित्त मंत्री ने अपने जवाब में विशेष रूप से जसवंत सिंह खालड़ा के मामले का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज इस मुद्दे को सदन में जोर-शोर से उठाया जा रहा है, लेकिन जब अकाली दल-भाजपा सरकार सत्ता में थी, तब इस मामले को लेकर सरकार की ओर से कितनी गंभीरता दिखाई गई, यह भी सार्वजनिक चर्चा का विषय होना चाहिए।

चीमा ने अयाली पर राजनीतिक तंज कसते हुए कहा कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और राजनीतिक भूमिका भी बदल गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता से बाहर होने के बाद कुछ नेता उन्हीं मामलों को अधिक मुखरता से उठा रहे हैं, जिन पर सत्ता में रहते हुए उनका रुख उतना आक्रामक नहीं था। वित्त मंत्री ने इसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार मुद्दों के इस्तेमाल से जोड़ते हुए विपक्ष पर निशाना साधा।

उन्होंने कहा कि पंजाब में बेअदबी और मानवाधिकार उल्लंघन जैसे विषय केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। इनसे लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं और कई परिवारों ने लंबे समय तक पीड़ा झेली है। ऐसे मामलों में किसी भी सरकार की प्राथमिकता पीड़ितों को न्याय दिलाना होना चाहिए।

वित्त मंत्री ने कांग्रेस शासनकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय पंजाब में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे लोगों के बीच तनाव और असुरक्षा की भावना पैदा हुई। उन्होंने कहा कि उन घटनाओं के पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए था, लेकिन बाद में सत्ता परिवर्तन के बावजूद सभी मामलों का समाधान नहीं हो सका।

चीमा के अनुसार, अकाली दल-भाजपा गठबंधन जब सत्ता में आया था, तब उसने लोगों से कई वादे किए थे। इनमें संवेदनशील मामलों में न्याय दिलाने और पीड़ित परिवारों की समस्याओं को दूर करने का भरोसा भी शामिल था। लेकिन उनके मुताबिक सरकार बनने के बाद उन वादों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया।

वित्त मंत्री ने कहा कि यदि कोई राजनीतिक दल यह दावा करता है कि पिछली सरकारों के दौरान लोगों के साथ अन्याय हुआ, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि जब उसके पास सत्ता की जिम्मेदारी थी, तब उसने उन मामलों को सुलझाने के लिए क्या किया। उन्होंने कहा कि केवल विपक्ष में बैठकर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सत्ता में रहते हुए फैसले लेना और उन्हें लागू करना वास्तविक राजनीतिक जिम्मेदारी है।

चीमा ने कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी की सरकार किसी भी संवेदनशील मामले में तथ्यों को सामने लाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पिछली सरकारों की गलतियों को दोहराना नहीं चाहती और जिन मामलों में लोगों को लंबे समय से न्याय नहीं मिला है, उन्हें गंभीरता से लिया जा रहा है।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि बेअदबी से जुड़े मामलों ने पंजाब की राजनीति और सामाजिक माहौल पर गहरा प्रभाव डाला है। इन घटनाओं को लेकर लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में सरकार का दायित्व है कि वह राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर मामलों की जांच और न्याय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।

उन्होंने कहा कि संवेदनशील मामलों को केवल चुनावी मुद्दा बनाना पीड़ित परिवारों के साथ अन्याय होगा। यदि किसी परिवार ने वर्षों तक अपने किसी सदस्य के लिए न्याय की प्रतीक्षा की है तो उसकी पीड़ा को राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

विधानसभा में इस मुद्दे पर बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच कई बार तीखी नोकझोंक हुई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर राजनीतिक लाभ के लिए संवेदनशील मामलों का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए। इससे सदन का माहौल कुछ समय के लिए काफी गर्म रहा।

चीमा ने कहा कि शून्यकाल में सामान्य तौर पर सरकार की ओर से विस्तृत जवाब देने की परंपरा नहीं होती, लेकिन इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार के लिए अपना पक्ष स्पष्ट करना जरूरी था। उन्होंने कहा कि विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों का जवाब देना इसलिए आवश्यक था, ताकि सदन के रिकॉर्ड पर यह बात स्पष्ट रहे कि सरकार इस मुद्दे को किस दृष्टिकोण से देखती है।

वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य किसी समुदाय या राजनीतिक दल को निशाना बनाना नहीं है। सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि जिन मामलों में लोगों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, उनमें तथ्यों को सामने लाया जाए और पीड़ितों को न्याय मिले।

उन्होंने कहा कि पंजाब का इतिहास कई संवेदनशील घटनाओं से जुड़ा रहा है। ऐसे मामलों को लेकर समाज में आज भी भावनाएं मौजूद हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को बयान देते समय जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए।

चीमा ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल सत्ता में रहते हुए एक रुख अपनाते हैं और विपक्ष में आने के बाद उसी मुद्दे पर बिल्कुल अलग भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि जनता अब राजनीतिक दलों के इस रवैये को समझती है और यह देखती है कि नेताओं ने अपने कार्यकाल के दौरान वास्तव में क्या कदम उठाए।

अकाली विधायक अयाली की ओर से उठाए गए मुद्दे को लेकर चीमा ने कहा कि यदि अकाली दल वास्तव में इन मामलों में न्याय को लेकर गंभीर है तो उसे अपने शासनकाल का भी हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल की घटनाओं को गिनाने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।

उन्होंने कहा कि पंजाब में अलग-अलग समय पर सत्ता में रही सरकारों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां रही हैं। किसी एक राजनीतिक दल पर पूरा दोष डालने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनके मुताबिक, जिन मामलों में पीड़ितों को अभी तक न्याय नहीं मिला है, वहां वर्तमान सरकार को आगे बढ़कर कार्रवाई करनी चाहिए।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार पिछली सरकारों के कार्यकाल में लंबित रहे मामलों को लेकर आवश्यक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी मामले में राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और कानून के आधार पर आगे बढ़ेगी।

विधानसभा में हुई इस बहस ने एक बार फिर पंजाब की राजनीति में बेअदबी और मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दों की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। इन विषयों पर राज्य में पहले भी कई बार राजनीतिक टकराव हो चुका है। अलग-अलग दल एक-दूसरे पर कार्रवाई में देरी और राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाते रहे हैं।

सत्ता पक्ष का कहना है कि पिछली सरकारों के दौरान लंबित रहे मामलों का राजनीतिक इस्तेमाल करने के बजाय उनके समाधान की दिशा में काम किया जाना चाहिए। वहीं विपक्ष का तर्क है कि मौजूदा सरकार को भी अपने वादों और कार्रवाई का जवाब देना चाहिए।

अकाली दल की ओर से विधानसभा में इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद अब यह बहस आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है। खासकर बेअदबी और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों को लेकर पंजाब में राजनीतिक दल पहले से ही एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं।

चीमा ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि सरकार इन मामलों को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं मानती। उन्होंने कहा कि जिन परिवारों ने अन्याय का सामना किया है, उन्हें न्याय मिलना चाहिए और इसके लिए सरकार कानूनी प्रक्रिया के तहत हर संभव कदम उठाएगी।

वित्त मंत्री ने विपक्ष से भी अपील की कि ऐसे संवेदनशील मामलों को लेकर सदन में गंभीर और तथ्य आधारित चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन धार्मिक भावनाओं और मानवाधिकारों से जुड़े विषयों पर सभी दलों को जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए।

कुल मिलाकर मानसून सत्र के दौरान बेअदबी और मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा एक बार फिर पंजाब विधानसभा में राजनीतिक टकराव का कारण बन गया। अकाली दल ने पिछली घटनाओं को लेकर सरकार से जवाब मांगा तो हरपाल चीमा ने कांग्रेस के साथ अकाली-भाजपा गठबंधन के शासनकाल को भी बहस के केंद्र में ला दिया। सरकार और विपक्ष के बीच हुई तीखी बहस ने यह साफ कर दिया कि पंजाब की राजनीति में ये मुद्दे अभी भी बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली हैं। आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।