वड़िंग-चन्नी की खींचतान के बीच बाजवा भी सक्रिय, 2027 से पहले कांग्रेस में बढ़ी सियासी बेचैनी

वड़िंग-चन्नी की खींचतान के बीच बाजवा भी सक्रिय, 2027 से पहले कांग्रेस में बढ़ी सियासी बेचैनी

चंडीगढ़। पंजाब कांग्रेस में संगठनात्मक स्तर पर चल रही खींचतान अब धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगी है। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा समेत कई वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता ने पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों को जन्म दिया है। नेतृत्व को लेकर मतभेद, 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री चेहरे की चर्चा और संगठन में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों के बीच कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति लगातार गरमा रही है।

पार्टी में मौजूदा विवाद की एक अहम कड़ी 1 जुलाई को हुए संगठनात्मक फैसले से जुड़ी है। इस फैसले के तहत अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को पंजाब कांग्रेस की कमान पर बरकरार रखा गया, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव प्रचार समिति की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस व्यवस्था के बाद पार्टी के भीतर दोनों नेताओं की भूमिकाओं को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं शुरू हो गईं। चन्नी समर्थक नेताओं की ओर से प्रदेश संगठन में बदलाव और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर गतिविधियां तेज होने लगीं।

चन्नी को प्रचार समिति की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके समर्थकों ने इसे पार्टी की चुनावी रणनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के संकेत के तौर पर देखा। दूसरी ओर, प्रदेश अध्यक्ष के पद पर वड़िंग के बने रहने से संगठन की कमान उन्हीं के पास रही। इसी दोहरी व्यवस्था ने पार्टी के भीतर नेतृत्व और अधिकार क्षेत्र को लेकर चर्चाओं को हवा दी। धीरे-धीरे यह सवाल उठने लगा कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस किस नेतृत्व के चेहरे के साथ मैदान में उतरेगी और चुनाव से पहले प्रदेश संगठन में क्या कोई बड़ा बदलाव होगा।

पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल के राज्य दौरे के दौरान भी पार्टी के भीतर चल रहे मतभेद कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए। लुधियाना, संगरूर और मलेरकोटला में आयोजित बैठकों के दौरान कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच विवाद की स्थिति बनी। कुछ स्थानों पर नारेबाजी और हंगामे की खबरें सामने आईं, जबकि लुधियाना में तो कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने भूपेश बघेल के खिलाफ ही नारे लगाए।

लुधियाना की बैठक के दौरान ‘भूपेश बघेल गो बैक’ जैसे नारे लगाए जाने से पार्टी नेतृत्व को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। बैठक का उद्देश्य संगठनात्मक गतिविधियों और आगामी राजनीतिक रणनीति पर चर्चा करना था, लेकिन आपसी खींचतान के कारण माहौल तनावपूर्ण हो गया। वड़िंग और चन्नी समर्थक माने जाने वाले कार्यकर्ताओं के बीच भी टकराव की स्थिति सामने आई। इससे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर मतभेद केवल वरिष्ठ नेताओं के स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका असर कार्यकर्ताओं के बीच भी दिखाई देने लगा है।

संगठनात्मक बैठकों में पैदा हुई इन परिस्थितियों ने केंद्रीय नेतृत्व की चिंता भी बढ़ाई है। पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल ने प्रदेश में चल रही गतिविधियों और पार्टी के अंदर सामने आ रहे विवादों को लेकर हाईकमान को रिपोर्ट देने की बात सामने आई। इस रिपोर्ट में कथित तौर पर ऐसी गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया, जिनके पीछे पार्टी के कुछ लोगों के विपक्ष के इशारे पर काम करने की आशंका जताई गई थी। इसी संदर्भ में ‘स्लीपर सेल’ जैसी चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में सामने आई।

पार्टी हाईकमान की ओर से नेताओं को अनुशासन बनाए रखने और सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी से बचने का संदेश दिया गया है। साथ ही यह संकेत भी दिया गया कि विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरे की घोषणा करने की कोई जल्दबाजी नहीं होगी। कांग्रेस नेतृत्व की रणनीति सामूहिक नेतृत्व के आधार पर चुनाव मैदान में उतरने की बताई जा रही है। पार्टी के भीतर किसी एक नेता को अभी से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने से बचने का फैसला गुटीय राजनीति को और बढ़ने से रोकने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इसके बावजूद प्रदेश कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर सवाल पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। कई वरिष्ठ नेता यह मांग उठा चुके हैं कि 2027 का चुनाव ऐसे नेतृत्व के तहत लड़ा जाना चाहिए जिसकी संगठन में मजबूत पकड़ हो और जिसकी छवि पर कोई गंभीर सवाल न हो। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत कुछ वरिष्ठ नेताओं ने मजबूत और साफ-सुथरे नेतृत्व की जरूरत पर जोर दिया है। इन नेताओं का तर्क है कि चुनाव में जाने से पहले संगठन के भीतर स्पष्टता और आपसी विश्वास जरूरी है।

पार्टी के कुछ विधायक और पटियाला-संगरूर क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ नेता भी संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर अपनी नाराजगी अलग-अलग स्तर पर जाहिर कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि कुछ नेताओं ने पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखते हुए सीधे दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व तक अपनी बात पहुंचाने का रास्ता अपनाया है। इससे पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में प्रदेश स्तर और केंद्रीय नेतृत्व के बीच सीधे संवाद की भूमिका बढ़ गई है।

पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों का एक पहलू यह भी है कि कई नेता अपनी राजनीतिक पहचान और प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पंजाब की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन सभी प्रमुख दलों ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी को राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्षी विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करना है।

यही कारण है कि मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर पार्टी के भीतर अभी से चर्चा तेज होना स्वाभाविक माना जा रहा है। हालांकि कांग्रेस हाईकमान की ओर से यह स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि चुनाव से पहले किसी एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने से बचा जाएगा। इससे पार्टी सामूहिक नेतृत्व और उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़ के आधार पर चुनाव लड़ने की रणनीति अपना सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी के बावजूद विधानसभा के भीतर पार्टी के विधायक कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ एकजुट नजर आए हैं। मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की कोशिश की। सरकार की ओर से एक ही दिन में नौ विधेयक पारित किए जाने को लेकर कांग्रेस ने सवाल उठाए और विधानसभा में इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाया।

नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, विधायक परगट सिंह और सुखपाल सिंह खैहरा समेत कांग्रेस नेताओं ने विधानसभा में सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने विधायी प्रक्रिया, सरकार की कार्यशैली और महत्वपूर्ण विधेयकों को तेजी से पारित किए जाने को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि संगठन के भीतर भले ही अलग-अलग नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद हों, लेकिन विधानसभा में सरकार को घेरने के मुद्दे पर कांग्रेस एक साझा विपक्षी भूमिका निभाने की कोशिश कर रही है।

प्रताप सिंह बाजवा की सक्रियता को भी पंजाब कांग्रेस की मौजूदा राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बाजवा लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के कारण सरकार के खिलाफ कांग्रेस का प्रमुख चेहरा हैं। उनकी राजनीतिक गतिविधियों और बयानों को पार्टी के भीतर चल रहे नेतृत्व संघर्ष के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाता है।

एक तरफ वड़िंग संगठन की कमान संभाल रहे हैं, दूसरी ओर चन्नी चुनाव प्रचार से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं और विधानसभा में बाजवा विपक्ष के नेता के तौर पर सरकार पर हमला बोल रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि इन तीनों स्तरों पर सक्रिय नेताओं के बीच बेहतर समन्वय कैसे बनाया जाए। पार्टी के भीतर यदि इन नेताओं की राजनीतिक गतिविधियां समान दिशा में चलती हैं तो कांग्रेस के लिए चुनावी तैयारी आसान हो सकती है, लेकिन यदि व्यक्तिगत या गुटीय मतभेद सार्वजनिक होते रहे तो इसका असर संगठन पर पड़ सकता है।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार्यकर्ताओं में स्पष्ट संदेश पहुंचाने की है। प्रदेश स्तर पर यदि नेतृत्व को लेकर असमंजस बना रहता है तो जमीनी कार्यकर्ताओं में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। पार्टी के लिए यह जरूरी होगा कि वरिष्ठ नेताओं को एक साझा राजनीतिक एजेंडे पर साथ लाया जाए और संगठनात्मक कार्यक्रमों में सभी प्रमुख नेताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

भूपेश बघेल के दौरों के दौरान सामने आए विवादों ने इस चुनौती को और स्पष्ट किया है। पार्टी के संगठनात्मक कार्यक्रमों में यदि मंच पर मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच ही मतभेद सामने आते हैं तो इसका सीधा असर कांग्रेस की सार्वजनिक छवि पर पड़ता है। ऐसे में हाईकमान की ओर से अनुशासन को लेकर चेतावनी को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कांग्रेस नेतृत्व के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्षी अभियान चलाना है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के अंदर चल रहे मतभेदों को नियंत्रित करना है। भाजपा भी राज्य में अपना संगठन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे राजनीतिक माहौल में कांग्रेस के लिए एकजुट विपक्षी भूमिका निभाना और कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना जरूरी है।

पार्टी के भीतर कई नेताओं का मानना है कि यदि कांग्रेस 2027 में सत्ता की मजबूत दावेदार बनना चाहती है तो उसे चुनाव से काफी पहले संगठनात्मक स्तर पर अपनी कमियां दूर करनी होंगी। नेताओं के बीच संवाद बढ़ाना, कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनना और टिकट से लेकर नेतृत्व तक सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर समय रहते स्पष्ट रणनीति बनाना आवश्यक होगा।

फिलहाल पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। राजा वड़िंग के पास संगठन की जिम्मेदारी है, चन्नी चुनावी प्रचार की भूमिका में हैं और बाजवा विधानसभा में सरकार के खिलाफ कांग्रेस की आवाज बुलंद कर रहे हैं। वहीं, रंधावा समेत अन्य वरिष्ठ नेता भी समय-समय पर संगठन और नेतृत्व को लेकर अपनी राय सामने रख रहे हैं। इस बीच कुछ विधायक और नेता सीधे दिल्ली में हाईकमान से संपर्क कर अपनी बात रख रहे हैं।

इस पूरी स्थिति के बीच कांग्रेस हाईकमान के लिए सबसे अहम काम प्रदेश के नेताओं के बीच संतुलन बनाना होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन पंजाब की राजनीतिक जमीन पर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में पार्टी यदि अंदरूनी मतभेदों को समय रहते सुलझा लेती है तो यह उसके लिए राजनीतिक मजबूती का आधार बन सकता है। इसके विपरीत यदि गुटबाजी सार्वजनिक मंचों और संगठनात्मक बैठकों में लगातार दिखाई देती रही तो इसका नुकसान जमीनी संगठन को उठाना पड़ सकता है।

फिलहाल पंजाब कांग्रेस में एक ओर अंदरूनी खींचतान जारी है, तो दूसरी ओर विधानसभा के भीतर पार्टी सरकार के खिलाफ साझा मोर्चा बनाए हुए है। यही विरोधाभास पार्टी की मौजूदा स्थिति को सबसे ज्यादा परिभाषित करता है। आने वाले महीनों में हाईकमान किस तरह वड़िंग, चन्नी, बाजवा और अन्य वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन कायम करता है, यही तय करेगा कि कांग्रेस 2027 के चुनाव की तैयारी किस दिशा में आगे बढ़ाती है।