हरियाणा सरकार ने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को नए सिरे से मजबूत करने की दिशा में व्यापक योजना पर काम तेज कर दिया है। सरकार का फोकस केवल विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सुविधाएं बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षा और कौशल विकास तक पूरे शिक्षा तंत्र को आपस में जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को इसी व्यापक बदलाव का आधार बनाया गया है।
इसी दिशा में मंगलवार को पंचकूला में उच्चतर शिक्षा काउंसिल की समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता उच्चतर शिक्षा मंत्री महीपाल ढांडा ने की। इसमें प्रदेश के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में चल रहे विकास कार्यों, शैक्षणिक गुणवत्ता, संस्थागत विकास योजनाओं, प्रशासनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की प्रगति की विस्तार से समीक्षा की गई।
बैठक के दौरान मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित न रखा जाए। इसके प्रावधानों को तय समयसीमा के भीतर लागू करने के साथ-साथ उनके परिणामों की भी लगातार समीक्षा की जाए। सरकार चाहती है कि एनईपी के माध्यम से विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था मिले, जो बदलती तकनीक, रोजगार की जरूरतों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप हो।
महीपाल ढांडा ने कहा कि प्रदेश के विद्यार्थियों को उच्च गुणवत्ता वाली आधुनिक शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों या विदेशों की ओर जाने की जरूरत कम से कम हो, इसके लिए हरियाणा में ही बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करना सरकार की प्राथमिकता है। विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के साथ शोध, नवाचार और कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
बैठक में उच्च शिक्षण संस्थानों की आधारभूत सुविधाओं का भी जायजा लिया गया। इसमें शिक्षण भवनों, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, तकनीकी सुविधाओं और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अन्य संसाधनों की स्थिति पर चर्चा हुई। सरकार का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए केवल बेहतर पाठ्यक्रम पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को आधुनिक बुनियादी ढांचा और सीखने के अनुकूल माहौल उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।
उच्च शिक्षण संस्थानों को अधिक स्वायत्तता देने के मुद्दे पर भी बैठक में विचार-विमर्श किया गया। एनईपी-2020 के तहत विश्वविद्यालयों और संस्थानों को शैक्षणिक एवं प्रशासनिक स्तर पर अधिक स्वतंत्रता देने की दिशा में कई प्रावधान किए गए हैं। हरियाणा सरकार भी इस दिशा में संभावनाओं पर काम कर रही है।
सरकार का मानना है कि यदि विश्वविद्यालयों को अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों, शोध गतिविधियों और नवाचार से जुड़े निर्णय लेने में पर्याप्त स्वतंत्रता मिलती है तो वे स्थानीय जरूरतों के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की चुनौतियों के अनुरूप बेहतर काम कर सकेंगे। इससे संस्थानों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की संभावनाएं मजबूत होंगी।
बैठक में संस्थागत विकास योजनाओं की भी समीक्षा की गई। विभिन्न विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों ने अपनी-अपनी योजनाओं की प्रगति की जानकारी अधिकारियों के सामने रखी। मंत्री ने कहा कि विकास योजनाएं केवल फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनका वास्तविक लाभ विद्यार्थियों और शिक्षकों तक पहुंचना चाहिए।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि संस्थागत विकास योजनाओं की निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार की जाए। प्रत्येक योजना की प्रगति, निर्धारित लक्ष्य और उसके परिणामों का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाए। जहां काम निर्धारित गति से नहीं हो रहा है, वहां कारणों की पहचान कर आवश्यक सुधार किए जाएँ।
शिक्षा व्यवस्था में बेहतर प्रशासन को भी सरकार ने प्राथमिकता दी है। उच्च शिक्षण संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रभावी प्रबंधन को मजबूत करने पर जोर दिया गया। सरकार चाहती है कि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक निर्णय तेजी से हों और विद्यार्थियों से जुड़े मामलों का समाधान समयबद्ध तरीके से किया जाए।
इस पूरी कवायद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को केवल उच्चतर शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं माना जा रहा है। सरकार स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और प्रारंभिक बाल शिक्षा को एक-दूसरे से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
बैठक में स्कूल शिक्षा विभाग, कौशल विकास एवं औद्योगिक प्रशिक्षण विभाग तथा महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने एनईपी से जुड़े अपने-अपने काम और प्रगति की जानकारी प्रस्तुत की। इससे यह संकेत मिला कि सरकार शिक्षा के विभिन्न स्तरों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में चलाने के बजाय एक एकीकृत व्यवस्था तैयार करना चाहती है।
प्रारंभिक स्तर पर बच्चों की शिक्षा और उनके समग्र विकास से लेकर स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगार आधारित कौशल प्रशिक्षण तक एक निरंतर शैक्षणिक ढांचा तैयार करने की योजना पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी जब स्कूल से निकलकर कॉलेज या विश्वविद्यालय पहुंचे तो उसकी शिक्षा और कौशल विकास के बीच बेहतर तालमेल बना रहे।
कौशल विकास को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ना भी इस योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मौजूदा समय में रोजगार के लिए केवल पारंपरिक डिग्री पर्याप्त नहीं मानी जाती। उद्योगों की जरूरत के अनुसार तकनीकी और व्यावसायिक कौशल का होना भी जरूरी है। ऐसे में सरकार उच्च शिक्षा के साथ कौशल प्रशिक्षण को जोड़कर विद्यार्थियों को रोजगार के लिए अधिक तैयार करना चाहती है।
इसके लिए उच्च शिक्षण संस्थानों और कौशल विकास से जुड़े विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने की जरूरत पर भी चर्चा हुई। यदि विद्यार्थी अपनी नियमित शिक्षा के साथ व्यावहारिक और रोजगारपरक प्रशिक्षण हासिल करते हैं तो इससे उनके करियर विकल्प बढ़ सकते हैं।
महिला एवं बाल विकास विभाग की भूमिका भी एनईपी के शुरुआती चरणों को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण मानी गई है। बच्चों के प्रारंभिक विकास और सीखने की नींव मजबूत करने के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि बच्चे की शिक्षा की शुरुआत से ही उसे बेहतर सीखने का वातावरण मिले।
स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक शिक्षा की इस कड़ी को मजबूत करने के लिए विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। इसी कारण उच्चतर शिक्षा मंत्री ने सभी संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ काम करने के निर्देश दिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि अलग-अलग विभाग अपनी योजनाओं को स्वतंत्र रूप से चलाने के बजाय एक साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ें।
बैठक में यह भी माना गया कि एनईपी के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए शिक्षकों और संस्थानों की क्षमता बढ़ाना जरूरी होगा। नई शिक्षा नीति में बहुविषयक अध्ययन, शोध, कौशल विकास, तकनीक आधारित शिक्षा और नवाचार पर जोर दिया गया है। इन प्रावधानों को जमीन पर लागू करने के लिए विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को पर्याप्त संसाधन और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना होगा।
हरियाणा सरकार उच्च शिक्षा को अधिक प्रतिस्पर्धी और आधुनिक बनाने के लिए शोध एवं नवाचार को भी बढ़ावा देना चाहती है। विश्वविद्यालयों में नई तकनीक, अनुसंधान और उद्योगों के साथ सहयोग की संभावनाओं को मजबूत करने पर भविष्य में अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
सरकार का लक्ष्य यह भी है कि प्रदेश के विश्वविद्यालय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता विकसित करें। इसके लिए शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध, आधुनिक पाठ्यक्रम और बेहतर आधारभूत ढांचे को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मंत्री ने अधिकारियों को यह भी संकेत दिया कि योजनाओं की सफलता का आकलन केवल बजट खर्च या निर्माण कार्यों से नहीं किया जाना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि इन योजनाओं से विद्यार्थियों को वास्तविक लाभ कितना मिला है। शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थियों की उपलब्धियां, रोजगार के अवसर और शोध गतिविधियों में बढ़ोतरी जैसे परिणामों को भी समीक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
बैठक में उच्चतर शिक्षा काउंसिल के चेयरमैन कैलाश चंद्र शर्मा, महिला एवं बाल विकास विभाग की निदेशक डॉ. प्रियंका सोनी, प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलगुरु और वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। अधिकारियों ने अपने-अपने विभागों और संस्थानों से संबंधित प्रगति की जानकारी साझा की तथा एनईपी को लागू करने में सामने आ रही चुनौतियों पर भी चर्चा की।
हरियाणा सरकार की इस पहल से आने वाले समय में प्रदेश के शिक्षा तंत्र में कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल सकते हैं। स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा के बीच बेहतर तालमेल, कौशल विकास को पाठ्यक्रम से जोड़ना, विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता देना और आधुनिक आधारभूत सुविधाओं का विस्तार इस बदलाव के प्रमुख हिस्से होंगे।
हालांकि, इन योजनाओं की वास्तविक सफलता इनके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विभागों के बीच निरंतर समन्वय, पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक और मजबूत निगरानी व्यवस्था जरूरी होगी। सरकार ने फिलहाल अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने और योजनाओं के परिणामों की लगातार समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं।
कुल मिलाकर हरियाणा सरकार शिक्षा व्यवस्था को अलग-अलग स्तरों में बांटकर देखने के बजाय एक ऐसी प्रणाली विकसित करने की दिशा में बढ़ रही है, जिसमें बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय और रोजगारपरक कौशल तक एक-दूसरे से जुड़े हों। सरकार का दावा है कि इस बदलाव के जरिए प्रदेश के विद्यार्थियों को राज्य में ही आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शिक्षा का माहौल उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी।




