छोटे बच्चों में गुस्सा, जिद, चिड़चिड़ापन और अपनी बात मनवाने की कोशिश करना उनके विकास का सामान्य हिस्सा माना जाता है। कई बार बच्चा अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता और ऐसे में वह रोने, चिल्लाने, चीजें फेंकने या हाथ-पैर चलाने लगता है। लेकिन जब यही व्यवहार माता-पिता को मारने तक पहुंच जाए, तो इसे केवल बच्चे की मासूम शरारत समझकर छोड़ देना सही नहीं है।
बच्चे का किसी पेरेंट पर हाथ उठाना इस बात का संकेत हो सकता है कि उसे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना और अपनी सीमाओं को समझना अभी सीखना है। ऐसे समय में माता-पिता की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर पेरेंट्स कभी इस व्यवहार पर हंसते हैं, कभी नजरअंदाज कर देते हैं और कभी बहुत ज्यादा गुस्सा करते हैं, तो बच्चे के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि आखिर सही व्यवहार क्या है।
पेरेंटिंग एक्सपर्ट इशिता बी. सदाना के मुताबिक, बच्चे की उम्र कम हो या ज्यादा, माता-पिता को मारना स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। बच्चे को यह सीमा स्पष्ट रूप से समझानी जरूरी है। इसके लिए पेरेंट्स को दो अहम बातों पर ध्यान देना चाहिए। पहली बात है कि बच्चे के सामने अपनी सीमा बिल्कुल साफ रखें और दूसरी बात यह कि जब बच्चा हाथ उठाए तो उसे तुरंत शारीरिक दूरी और स्पष्ट प्रतिक्रिया के जरिए रोकें।
पहले ही दिन से स्पष्ट करें कि मारना सही नहीं है
बच्चा जब पहली बार गुस्से में माता-पिता को मारता है, तो कई बार पेरेंट्स इसे उम्र का असर मानकर छोड़ देते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चा छोटा है और कुछ समय बाद खुद समझ जाएगा। लेकिन अगर इस व्यवहार को लगातार बिना किसी सीमा के छोड़ दिया जाए, तो बच्चा यह मान सकता है कि गुस्सा आने पर किसी को मारना भी अपनी बात मनवाने का एक तरीका है।
इसलिए बच्चे को शुरुआत से ही सरल शब्दों में बताना जरूरी है कि गुस्सा करना गलत नहीं है, लेकिन गुस्से में किसी को मारना स्वीकार्य नहीं है। बच्चे से लंबा भाषण देने के बजाय छोटे और स्पष्ट वाक्य इस्तेमाल करें। उदाहरण के लिए, शांत आवाज में कहा जा सकता है, “तुम गुस्सा हो सकते हो, लेकिन मार नहीं सकते।”
यह अंतर बच्चे को धीरे-धीरे यह समझने में मदद करता है कि भावना और व्यवहार दो अलग चीजें हैं। गुस्सा महसूस करना सामान्य है, लेकिन उस गुस्से के कारण दूसरे व्यक्ति को चोट पहुंचाना सही नहीं है।
बच्चे को डराने के बजाय अपनी सीमा बताएं
जब बच्चा हाथ उठाता है तो माता-पिता का तुरंत गुस्सा होना स्वाभाविक है। लेकिन बहुत तेज आवाज में चिल्लाना, बच्चे को डराना या बदले में मारना समस्या को और बढ़ा सकता है। बच्चे को यह समझाने के लिए कि मारना गलत है, पेरेंट्स को खुद भी संयम रखना चाहिए।
सीमा तय करने का मतलब बच्चे को डराना नहीं है। इसका अर्थ है कि माता-पिता अपने व्यवहार से यह स्पष्ट करें कि वे मारने वाले व्यवहार को स्वीकार नहीं करेंगे। आवाज शांत लेकिन दृढ़ होनी चाहिए।
मसलन, “हाथ नहीं उठाना है” या “अगर तुम गुस्से में हो तो मुझे बताओ, लेकिन मारना नहीं है” जैसे वाक्य इस्तेमाल किए जा सकते हैं। बच्चे की उम्र के हिसाब से शब्दों को और सरल बनाया जा सकता है।
बच्चे को रोकते समय नकली रोने से बचें
कई माता-पिता बच्चे को यह समझाने के लिए कि उसने चोट पहुंचाई है, जानबूझकर रोने या दर्द होने की एक्टिंग करने लगते हैं। वे बच्चे से कह सकते हैं, “देखो, मुझे कितनी चोट लगी” या “तुमने मुझे बहुत दुख दिया।” हालांकि ऐसी प्रतिक्रिया हर स्थिति में प्रभावी नहीं होती।
विशेषज्ञ के बताए तरीके के अनुसार, बच्चे के मारने पर मुख्य उद्देश्य उसे अपराधबोध में डालना नहीं, बल्कि यह समझाना होना चाहिए कि मारना स्वीकार्य व्यवहार नहीं है। इसलिए प्रतिक्रिया सीधी और स्पष्ट रखें।
अगर बच्चा आपको मारता है तो उसके सामने अपनी बात मजबूती से रखें। उसे यह समझाएं कि आपको चोट पहुंचाने वाला व्यवहार जारी नहीं रहने दिया जाएगा। इसके बाद बातचीत को लंबा खींचने के बजाय स्थिति को नियंत्रित करना अधिक जरूरी है।
दूसरी सबसे जरूरी बात: तुरंत थोड़ी दूरी बनाएं
जब बच्चा गुस्से में लगातार हाथ उठा रहा हो, तो केवल “नहीं” कहना पर्याप्त नहीं हो सकता। यदि बच्चा बार-बार मारने की कोशिश कर रहा है, तो माता-पिता को खुद को उसकी पहुंच से थोड़ा दूर कर लेना चाहिए।
उदाहरण के तौर पर, अगर बच्चा गोद में है और गुस्से में हाथ चला रहा है, तो उसे सुरक्षित तरीके से नीचे उतारा जा सकता है। इसके बाद पेरेंट्स कुछ दूरी पर रहकर उसे शांत होने का समय दे सकते हैं। इसका मकसद बच्चे को सजा देना नहीं, बल्कि मारने की स्थिति को तुरंत रोकना है।
यह तरीका बच्चे को व्यवहार और उसके परिणाम के बीच संबंध समझने में मदद करता है। उसे पता चलता है कि जैसे ही वह हाथ उठाता है, खेल, गोद या बातचीत सामान्य तरीके से आगे नहीं चलती।
हर बार एक जैसी प्रतिक्रिया देना जरूरी है
बच्चों को सीमाएं समझाने में सबसे बड़ी भूमिका निरंतरता की होती है। यदि एक दिन बच्चा मारता है और माता-पिता हंसकर उसे छोड़ देते हैं, लेकिन अगले दिन उसी व्यवहार पर बहुत गुस्सा करते हैं, तो बच्चा भ्रमित हो सकता है।
इसलिए परिवार के सभी सदस्यों को कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे के हाथ उठाने पर लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया हो। बच्चे को स्पष्ट संदेश मिले कि परिस्थिति चाहे कोई भी हो, किसी को मारना स्वीकार नहीं है।
यह नियम केवल माता-पिता तक सीमित नहीं होना चाहिए। बच्चे को धीरे-धीरे यह सिखाना जरूरी है कि छोटे भाई-बहन, दोस्त, दादा-दादी या घर के किसी अन्य व्यक्ति पर हाथ उठाना भी सही नहीं है।
बच्चे की भावना को समझें, लेकिन गलत व्यवहार को मंजूरी न दें
यह समझना जरूरी है कि बच्चे का गुस्सा अपने आप में समस्या नहीं है। उसे भी नाराज होने, निराश होने या अपनी इच्छा पूरी न होने पर दुखी होने का अधिकार है। समस्या तब पैदा होती है जब वह इन भावनाओं को मारपीट के जरिए व्यक्त करने लगता है।
ऐसे में पेरेंट्स को बच्चे की भावना को स्वीकार करते हुए उसके व्यवहार की सीमा तय करनी चाहिए। जैसे कहा जा सकता है, “मुझे पता है कि तुम बहुत गुस्से में हो, लेकिन मारना ठीक नहीं है।”
इस तरह बच्चे को यह संदेश मिलता है कि उसकी भावनाओं को दबाया नहीं जा रहा, लेकिन उन्हें व्यक्त करने का तरीका बदला जाना चाहिए।
बच्चे को गुस्सा निकालने के दूसरे तरीके सिखाएं
सिर्फ यह कहना कि “मारना नहीं है” काफी नहीं होता। बच्चे को यह भी बताना चाहिए कि जब उसे बहुत गुस्सा आए तो वह क्या कर सकता है। उसकी उम्र के अनुसार उसे कुछ विकल्प दिए जा सकते हैं।
बच्चा अपनी बात शब्दों में कह सकता है, कुछ देर शांत बैठ सकता है, गहरी सांस ले सकता है या माता-पिता को बता सकता है कि उसे क्या पसंद नहीं आया। छोटे बच्चे के लिए पेरेंट्स खुद उसके गुस्से को शब्द दे सकते हैं, जैसे, “तुम इसलिए नाराज हो क्योंकि मैंने अभी खिलौना नहीं दिया।”
धीरे-धीरे बच्चा यह सीख सकता है कि नाराजगी को हाथ उठाए बिना भी व्यक्त किया जा सकता है।
गलती के बाद लंबी डांट से बचें
जब बच्चा शांत हो जाए, तब घटना को संक्षेप में दोबारा समझाया जा सकता है। उसे बार-बार उसी बात के लिए शर्मिंदा करना या लंबे समय तक डांटते रहना जरूरी नहीं है।
पेरेंट्स कह सकते हैं, “अभी तुम बहुत गुस्से में थे और तुमने हाथ उठाया। अगली बार मुझे बताना कि तुम्हें गुस्सा आ रहा है, लेकिन हाथ नहीं उठाना।”
बच्चे को बार-बार सही व्यवहार का अभ्यास करवाना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
याद रखें, सीमा तय करना सजा देना नहीं है
बच्चे को गोद से उतारना, थोड़ी दूरी बनाना या बातचीत कुछ देर रोकना तभी उपयोगी है जब इसका उद्देश्य बच्चे को अपमानित करना या डराना न हो। इसका मकसद केवल यह दिखाना है कि मारने के बाद स्थिति सामान्य तरीके से जारी नहीं रहेगी।
पेरेंट्स को खुद बच्चे पर हाथ उठाकर “मारना गलत है” नहीं सिखाना चाहिए। इससे बच्चे को उल्टा यह संदेश मिल सकता है कि ताकतवर व्यक्ति गुस्से में मार सकता है।
सबसे प्रभावी तरीका यही है कि माता-पिता शांत रहें, स्पष्ट शब्दों में सीमा बताएं और बच्चे को दोबारा मारने का मौका न दें। समय के साथ लगातार एक जैसी प्रतिक्रिया मिलने पर बच्चा समझने लगता है कि गुस्सा होना ठीक है, लेकिन किसी पर हाथ उठाना नहीं।
बच्चे को सही सीमा सिखाने के ये दो कदम याद रखें
अगर बच्चा गुस्से में आपको मारता है, तो सबसे पहले स्पष्ट शब्दों में बताएं कि मारना स्वीकार्य नहीं है। बच्चे को डराने या बदले में मारने के बजाय शांत लेकिन दृढ़ आवाज में अपनी सीमा बताएं।
दूसरा, तुरंत थोड़ी शारीरिक दूरी बनाएं। अगर बच्चा गोद में है तो सुरक्षित तरीके से उसे नीचे उतारें और कुछ दूरी पर रहें, ताकि वह दोबारा हाथ न उठा सके।
इसके साथ बच्चे की भावनाओं को समझना और उसे गुस्सा व्यक्त करने के बेहतर तरीके सिखाना भी जरूरी है। पेरेंटिंग में हर व्यवहार का जवाब तुरंत डांट से देना जरूरी नहीं होता। कई बार शांत, स्पष्ट और लगातार दोहराई गई सीमा ही बच्चे को सही और गलत के बीच अंतर समझाने में सबसे ज्यादा मदद करती है।
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