हरियाणा सरकार ने सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए व्यापक योजना पर काम तेज कर दिया है। परिवहन मंत्री अनिल विज के नेतृत्व में राज्य के सरकारी बस बेड़े को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक और अन्य गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित तकनीकों में बदलने की तैयारी की जा रही है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक हरियाणा राज्य परिवहन उपक्रम की बसों को इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन या फ्यूल सेल जैसी स्वच्छ तकनीकों पर ले जाना है।
सरकार की यह योजना केवल डीजल बसों को इलेक्ट्रिक बसों से बदलने तक सीमित नहीं है। इसके तहत ई-बसों के लिए नए डिपो, हाई-पावर चार्जिंग स्टेशन, राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर चार्जिंग नेटवर्क, डिजिटल निगरानी व्यवस्था तथा यात्रियों की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। उद्देश्य ऐसा सार्वजनिक परिवहन तंत्र तैयार करना है जो पर्यावरण संरक्षण के साथ यात्रियों को बेहतर, सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा उपलब्ध करा सके।
हरियाणा सरकार के अनुसार, प्रदेश के प्रमुख एनसीआर शहरों को इस बदलाव में प्राथमिकता दी जा रही है। गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, पानीपत, करनाल और रोहतक जैसे शहरों में ई-बस सेवा का विस्तार किया जा रहा है। इन शहरों में बढ़ते यातायात और प्रदूषण को देखते हुए स्वच्छ सार्वजनिक परिवहन को महत्वपूर्ण समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
क्लीन एयर रणनीति के तहत वर्ष 2026 में प्रदेश के प्रमुख शहरों में 925 नई इलेक्ट्रिक बसें उतारने की दिशा में काम चल रहा है। इनमें से 575 बसों के लिए ऑर्डर दिए जाने की जानकारी सामने आई है। इन बसों के संचालन से शहरी परिवहन की क्षमता बढ़ाने के साथ निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जाएगा।
सरकार की योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा छोटे और मध्यम शहरों तक ई-बस सेवा पहुंचाना भी है। शुरुआती चरण में 11 जिला मुख्यालयों में इलेक्ट्रिक सिटी बसें शुरू की जा रही हैं। भिवानी, चरखी दादरी, फतेहाबाद, जींद, कैथल, सिरसा और हांसी सहित चयनित शहरों में प्रारंभिक तौर पर 10-10 ई-बसें चलाने की योजना है। इससे बड़े शहरों के अलावा जिला स्तर पर भी यात्रियों को आधुनिक सार्वजनिक परिवहन की सुविधा मिल सकेगी।
इस पहल से दैनिक यात्रियों के साथ विद्यार्थियों, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और नौकरीपेशा लोगों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। छोटे शहरों में बेहतर सिटी बस सेवा उपलब्ध होने से लोगों को निजी वाहनों के इस्तेमाल से राहत मिल सकती है और शहरों में यातायात का दबाव भी कम किया जा सकता है।
ई-बसों की सबसे बड़ी जरूरत मजबूत चार्जिंग नेटवर्क है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार बस अड्डों और प्रमुख परिवहन केंद्रों पर चार्जिंग सुविधाएं विकसित कर रही है। 11 जिलों के बस अड्डों में दो-दो प्रमुख इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा दिल्ली-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग सहित प्रमुख परिवहन मार्गों पर भी बड़े चार्जिंग हब विकसित किए जा रहे हैं।
करनाल जैसे प्रमुख परिवहन केंद्रों पर ऐसी चार्जिंग व्यवस्था तैयार करने की दिशा में काम हो रहा है, जहां एक साथ बड़ी संख्या में इलेक्ट्रिक बसों को चार्ज किया जा सके। इससे ई-बसों के संचालन में चार्जिंग की वजह से आने वाली रुकावटों को कम करने में मदद मिलेगी।
सरकार ने प्रदेश के 10 प्रमुख जिलों में आधुनिक ई-बस डिपो तैयार करने की योजना भी बनाई है। पंचकूला, अंबाला, कुरुक्षेत्र, करनाल, पानीपत, सोनीपत, रोहतक, हिसार, यमुनानगर और रेवाड़ी को पहले चरण में शामिल किया गया है। इन डिपो में पारंपरिक बस अड्डों की तुलना में इलेक्ट्रिक बसों की जरूरतों के अनुरूप विशेष सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
ई-बस डिपो में चार्जिंग प्वाइंट, पर्याप्त बिजली आपूर्ति, पार्किंग, रखरखाव और संचालन की सुविधाओं को एकीकृत किया जाएगा। पंचकूला के सेक्टर-5 बस स्टैंड सहित अन्य प्रमुख स्थानों पर भी चार्जिंग क्षमता बढ़ाने की तैयारी है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बसों की संख्या बढ़ने के साथ चार्जिंग ढांचा भी उसी गति से विकसित हो।
लंबी दूरी की ई-बस सेवा के लिए राजमार्गों पर चार्जिंग नेटवर्क को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के किनारे भारी क्षमता वाले चार्जिंग स्टेशन विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। दिल्ली-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे प्रमुख कॉरिडोर पर लगभग 25 से 100 किलोमीटर के अंतराल में चार्जिंग सुविधाएं विकसित करने की योजना है। इससे लंबी दूरी की बसों को बीच रास्ते पर चार्जिंग के लिए पर्याप्त विकल्प मिल सकेंगे।
चार्जिंग नेटवर्क के विस्तार के लिए सरकारी जमीन के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है। परिवहन विभाग समेत 18 सरकारी विभागों को अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध उपयुक्त जमीन की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं। बस अड्डों और सरकारी जमीन का उपयोग होने से चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है।
ई-बस योजना में यात्रियों की सुविधा और सामाजिक लाभ को भी जोड़ा गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की घोषणा के अनुसार, स्कूल और कॉलेज विद्यार्थियों के लिए जारी हरियाणा रोडवेज का वैध स्टूडेंट बस पास नई इलेक्ट्रिक बसों में भी मान्य रहेगा। विद्यार्थी अपने वैध पास के आधार पर ई-बसों में मुफ्त यात्रा कर सकेंगे। इससे विद्यार्थियों को सुरक्षित और किफायती परिवहन उपलब्ध कराने के साथ उनके परिवारों पर यात्रा का खर्च भी कम होगा।
सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए कर संबंधी रियायतें भी दे रही है। 30 लाख रुपये तक की एक्स-शोरूम कीमत वाले नए इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया और चार पहिया वाहनों पर मोटर वाहन कर तथा पंजीकरण शुल्क में पूरी छूट का प्रावधान किया गया है। इससे अधिक कीमत वाले इलेक्ट्रिक वाहनों पर मोटर वाहन कर में 50 प्रतिशत राहत देने की व्यवस्था है।
महिलाओं के नाम पर खरीदे जाने वाले गैर-परिवहन वाहनों के लिए भी अतिरिक्त कर राहत का प्रावधान है। इसके साथ ही सीएनजी वाहनों पर पहले से लागू 20 प्रतिशत कर छूट को जारी रखा गया है। सरकार का मानना है कि ऐसे प्रोत्साहनों से स्वच्छ ईंधन वाले वाहनों की मांग बढ़ाने में मदद मिलेगी।
सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में ई-बसों की खरीद को प्रोत्साहित करने के लिए शुरुआती 1,000 इलेक्ट्रिक बसों पर एक्स-शोरूम कीमत का 10 प्रतिशत इंसेंटिव देने का प्रावधान भी किया गया है। इसके अलावा इन बसों पर हरियाणा मोटर वाहन कर में 75 प्रतिशत तक की छूट और पंजीकरण के लिए 500 रुपये की टोकन फीस का प्रावधान बताया गया है।
हरियाणा के अधिकार क्षेत्र वाले राज्यीय राजमार्गों पर इन ई-बसों को राज्य टोल टैक्स में पूरी छूट देने की व्यवस्था भी योजना का हिस्सा है। ऐसे वित्तीय प्रोत्साहन सार्वजनिक परिवहन ऑपरेटरों के लिए इलेक्ट्रिक बसों की ओर बढ़ने को अधिक व्यावहारिक बना सकते हैं।
ई-बसों के संचालन में सरकार ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट यानी जीसीसी मॉडल को भी प्राथमिकता दे रही है। इस व्यवस्था के तहत निजी ऑपरेटर बसें उपलब्ध करा सकते हैं और सरकार निर्धारित आधार पर प्रति किलोमीटर भुगतान करती है। इससे सरकार को एक साथ बड़ी संख्या में बसें खरीदने और उनके रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी उठाने की आवश्यकता कम हो सकती है।
जीसीसी मॉडल के जरिए निजी क्षेत्र की तकनीकी विशेषज्ञता और संचालन क्षमता का उपयोग करते हुए ई-बस सेवा को अपेक्षाकृत तेजी से विस्तार दिया जा सकता है। साथ ही बसों के रखरखाव और परिचालन से जुड़े कुछ दायित्व ऑपरेटर के स्तर पर रहने से परिवहन विभाग के लिए प्रबंधन आसान हो सकता है।
सरकार ने नई बसों में यात्री सुरक्षा के लिए तकनीकी सुविधाओं को भी महत्व दिया है। ई-बसों में जीपीएस आधारित ट्रैकिंग और पैनिक बटन जैसी सुविधाओं को शामिल किया जा रहा है। बसों की निगरानी राज्य के एकीकृत कमांड एवं कंट्रोल सेंटर से की जाने की व्यवस्था होगी। इससे बसों की लोकेशन और संचालन पर नजर रखने के साथ आपात स्थिति में तत्काल प्रतिक्रिया देने में सहायता मिल सकती है।
ई-बसों की खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ को भी प्राथमिकता देने की नीति अपनाई जा रही है। भारत सरकार के फेज्ड मैन्युफैक्चरिंग कार्यक्रम के अनुरूप तैयार की गई बसों को प्राथमिकता देने से घरेलू इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर विनिर्माण गतिविधियों और रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि की संभावना है।
इलेक्ट्रिक परिवहन के विस्तार के साथ बैटरी प्रबंधन की चुनौती को भी सरकार ने योजना में शामिल किया है। पुरानी और इस्तेमाल हो चुकी बैटरियों के सुरक्षित निपटान के लिए रीसाइक्लिंग और मटेरियल रिकवरी की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। इससे इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल से पैदा होने वाले कचरे की समस्या को नियंत्रित किया जा सकेगा।
हरियाणा सरकार की यह पूरी कवायद केवल परिवहन विभाग की तकनीकी योजना नहीं है, बल्कि इसे प्रदूषण नियंत्रण और शहरी विकास की व्यापक नीति से भी जोड़ा जा रहा है। डीजल बसों की जगह इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ने से शहरों में स्थानीय स्तर पर उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। इलेक्ट्रिक बसों के अपेक्षाकृत कम शोर से शहरी ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी योगदान मिल सकता है।
हालांकि 2030 तक पूरे बस बेड़े को स्वच्छ ऊर्जा आधारित तकनीक में बदलना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। बसों की खरीद के साथ पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन, बिजली आपूर्ति, डिपो, रखरखाव केंद्र, प्रशिक्षित स्टाफ और बैटरी प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं को समान गति से विकसित करना होगा। लंबी दूरी के मार्गों पर ई-बसों के संचालन के लिए चार्जिंग नेटवर्क की विश्वसनीयता भी निर्णायक होगी।
यदि सरकार इन सभी व्यवस्थाओं को निर्धारित समय में विकसित करने में सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में हरियाणा के सार्वजनिक परिवहन का स्वरूप काफी बदल सकता है। शहरों में स्वच्छ ऊर्जा से चलने वाली बसें, आधुनिक डिपो, डिजिटल निगरानी और बेहतर यात्री सुविधाएं सार्वजनिक परिवहन को अधिक आकर्षक बना सकती हैं।
परिवहन मंत्री अनिल विज के नेतृत्व में शुरू की गई यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका दायरा केवल बसों की खरीद तक सीमित नहीं रखा गया है। सरकार परिवहन व्यवस्था को ईंधन, बुनियादी ढांचे, तकनीक, सुरक्षा और यात्री सुविधाओं के स्तर पर एक साथ बदलने की कोशिश कर रही है।
2030 का लक्ष्य निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन यदि ई-बसों की खरीद, चार्जिंग नेटवर्क और डिपो निर्माण की योजनाएं समान गति से आगे बढ़ती हैं तो हरियाणा देश के उन राज्यों में शामिल हो सकता है जो सार्वजनिक परिवहन को स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में तेजी से ले जा रहे हैं। इसका अंतिम लाभ यात्रियों को बेहतर परिवहन, शहरों को कम प्रदूषण और राज्य को अधिक टिकाऊ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के रूप में मिल सकता है।



