हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में विकास योजनाओं और सरकार की ओर से दिए गए आश्वासनों के क्रियान्वयन में हो रही देरी को लेकर विधानसभा की कल्याण समिति ने कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने विभिन्न विकास परियोजनाओं की धीमी प्रगति पर नाराजगी जताते हुए संबंधित विभागों से अद्यतन स्थिति रिपोर्ट तलब की है। खासतौर पर किन्नौर, लाहुल-स्पीति और चंबा जैसे जनजातीय जिलों से जुड़े कई मामलों में लंबे समय से अपेक्षित कार्रवाई न होने पर समिति ने अधिकारियों से जवाब मांगा है।
समिति की समीक्षा में किन्नौर के शिपकीला में प्रस्तावित ट्रेड सेंटर का मामला प्रमुखता से सामने आया। यह परियोजना लंबे समय से लंबित है और इसके निर्माण को लेकर पहले भी कई बार प्रक्रिया आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा चुका है। जानकारी के अनुसार, परियोजना के लिए चार बार निविदाएं आमंत्रित की गईं, लेकिन किसी भी चरण में अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद वर्ष 2023 में कार्य का आबंटन किया गया था। बावजूद इसके परियोजना की वर्तमान स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध न होने पर समिति ने संबंधित विभाग से ताजा प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
समिति ने निर्देश दिए हैं कि रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाए कि परियोजना पर अब तक कितना काम पूरा हुआ है, कितनी राशि खर्च की जा चुकी है और शेष कार्य को पूरा करने के लिए क्या समयसीमा निर्धारित की गई है। समिति का मानना है कि सीमावर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में ऐसी परियोजनाओं में अनावश्यक देरी से स्थानीय लोगों को मिलने वाले संभावित आर्थिक और रोजगार संबंधी लाभ भी प्रभावित होते हैं।
बैठक में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों से जुड़े छात्रावासों के निर्माण की स्थिति पर भी चर्चा हुई। लड़कों के हास्टल नंबर-1 और लड़कियों के हास्टल नंबर-2 व 3 के निर्माण की गति संतोषजनक न पाए जाने पर समिति ने संबंधित निर्माण एजेंसी से विस्तृत जानकारी मांगी है। समिति ने निर्देश दिए कि निर्माण एजेंसी को जारी की गई राशि, अब तक हुए निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति और साइट की मौजूदा तस्वीरों सहित पूरी रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए।
समिति ने स्पष्ट किया कि जनजातीय क्षेत्रों में विद्यार्थियों के लिए आवासीय सुविधाओं का निर्माण केवल बुनियादी ढांचे का विषय नहीं है, बल्कि इससे दूरदराज के इलाकों के बच्चों की शिक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ता है। छात्रावासों के निर्माण में देरी के कारण विद्यार्थियों को अपेक्षित सुविधाएं समय पर नहीं मिल पा रही हैं। इसलिए निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी और निर्धारित समय में उन्हें पूरा करना आवश्यक है।
वहीं, भूमि से जुड़े पुराने मामलों को लेकर भी समिति ने सरकार से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है। किन्नौर, लाहुल-स्पीति और चंबा जिलों में नौतोड़ भूमि आवंटन से संबंधित लंबित मामलों तथा वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत एक हेक्टेयर तक भूमि से जुड़े मामलों की जानकारी देने के निर्देश दिए गए हैं।
जनजातीय क्षेत्रों में भूमि का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। स्थानीय लोगों की आजीविका, खेती और पारंपरिक अधिकारों से जुड़े मामलों के चलते भूमि आवंटन और वन अधिकार से संबंधित दावों के निपटारे को विशेष महत्व दिया जाता है। समिति ने विभाग से कहा है कि लंबित मामलों की संख्या, उनके निपटारे की वर्तमान स्थिति और किन कारणों से मामले अटके हुए हैं, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जून 2025 तक किन्नौर की जिलास्तरीय समिति ने वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत 461 व्यक्तिगत दावों को अंतिम मंजूरी प्रदान करते हुए संबंधित लाभार्थियों को पट्टे जारी किए हैं। इनमें पूह क्षेत्र के 109, कल्पा के 277 और निचार के 75 दावे शामिल हैं। समिति ने एफआरए से संबंधित प्रक्रिया की समीक्षा के दौरान इन आंकड़ों को भी ध्यान में रखा।
हिमाचल प्रदेश में वन अधिकार अधिनियम के तहत पात्र दावेदारों को उनके अधिकार दिलाने के लिए एफआरए कैलेंडर 2025-26 भी जारी किया गया है। समिति ने इस प्रक्रिया को निर्धारित समय के भीतर आगे बढ़ाने और पात्र मामलों में अनावश्यक देरी से बचने पर जोर दिया है।
जनजातीय विकास विभाग से जुड़े सरकारी आश्वासनों की समीक्षा के दौरान भी समिति ने कई मामलों में कार्रवाई की स्थिति पर सवाल उठाए। समीक्षा के दौरान एक आश्वासन को पूरा मानते हुए समाप्त कर दिया गया, जबकि नौ अन्य आश्वासनों को अभी लंबित रखा गया है। समिति ने इन लंबित आश्वासनों के संबंध में विभाग से दोबारा विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
समिति ने अधिकारियों से कहा है कि लंबित आश्वासनों को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें तय समयसीमा में पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। रिपोर्ट में प्रत्येक आश्वासन की वर्तमान स्थिति, अब तक की गई कार्रवाई, सामने आ रही अड़चनें और आगे की कार्ययोजना का उल्लेख करने को कहा गया है।
जनजातीय क्षेत्रों में तैनात होने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों से जुड़ा मुद्दा भी समिति की बैठक में उठा। कल्याण समिति ने सिफारिश की है कि जनजातीय और पिछड़ा वर्ग कोटे के तहत नियुक्त अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवाओं का लाभ अनिवार्य रूप से जनजातीय क्षेत्रों में भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
समिति का मानना है कि जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए केवल योजनाओं को मंजूरी देना पर्याप्त नहीं है। वहां पर्याप्त संख्या में अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध होना भी जरूरी है, ताकि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर प्रभावी तरीके से हो सके। स्थानीय क्षेत्रों में कर्मचारियों की तैनाती से प्रशासनिक सेवाओं की पहुंच बेहतर होने और विकास योजनाओं की निगरानी मजबूत होने की उम्मीद है।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को लेकर भी समिति ने सरकार से जवाब मांगा है। समिति के सामने यह जानकारी आई कि वर्ष 2025-26 के दौरान इस कार्यक्रम में कोई अतिरिक्त गांव शामिल नहीं किया गया। सीमावर्ती और दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले इस कार्यक्रम में नए गांवों को शामिल न किए जाने के कारणों को लेकर समिति ने स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
भरमौर में करीब 13 लाख रुपये की लागत वाले कम्युनिटी हॉल की स्वीकृति रद्द किए जाने का मामला भी समिति के संज्ञान में आया। समिति ने इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए संबंधित विभाग से इसका कारण बताने और परियोजना की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। समिति यह जानना चाहती है कि परियोजना की स्वीकृति किन परिस्थितियों में रद्द की गई और स्थानीय स्तर पर इसके लिए आगे क्या योजना है।
बैठक के दौरान ट्रांस-गिरी क्षेत्र और हाटी समुदाय से संबंधित अदालती मामलों का मुद्दा भी उठा। इन मामलों को लेकर समिति ने विभाग को निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। समिति ने कहा कि जिन मामलों में न्यायिक प्रक्रिया या कानूनी पेचिदगियां हैं, उनमें भी संबंधित विभागों को समन्वय के साथ आगे बढ़ना चाहिए, ताकि अनावश्यक रूप से मामले लंबे समय तक लंबित न रहें।
विधानसभा की कल्याण समिति की समीक्षा से यह स्पष्ट हुआ है कि जनजातीय क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं और सरकारी आश्वासनों की प्रगति अपेक्षित गति से नहीं हो रही है। ट्रेड सेंटर से लेकर छात्रावासों, भूमि अधिकारों और सरकारी आश्वासनों तक कई मामलों में विभागों को अपनी कार्यप्रणाली तेज करने की जरूरत है।
समिति ने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन होने के बावजूद विकास परियोजनाओं में लगातार देरी को सामान्य स्थिति के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। दुर्गम क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा, आवास और भूमि अधिकारों से जुड़ी योजनाओं का समय पर क्रियान्वयन वहां रहने वाली आबादी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
अब संबंधित विभागों को समिति के निर्देशों के अनुसार विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। इन रिपोर्टों में लंबित परियोजनाओं की प्रगति, खर्च की गई राशि, निर्माण की स्थिति, प्रशासनिक अड़चनों और आगे की समयसीमा की जानकारी देनी होगी। समिति की अगली समीक्षा में इन रिपोर्टों के आधार पर यह देखा जाएगा कि विभागों ने दिए गए निर्देशों पर कितना अमल किया है।
कुल मिलाकर, विधानसभा की कल्याण समिति ने जनजातीय क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने और लंबे समय से लंबित मामलों का समाधान करने के लिए विभागों पर दबाव बढ़ा दिया है। समिति की सख्ती से उम्मीद है कि शिपकीला ट्रेड सेंटर, एकलव्य छात्रावास, एफआरए और नौतोड़ भूमि मामलों सहित अन्य लंबित योजनाओं को आगे बढ़ाने में तेजी आएगी और सरकारी आश्वासनों का लाभ वास्तविक रूप से जनजातीय क्षेत्रों के लोगों तक पहुंच सकेगा।




