दूरदराज बच्चों के लिए घर तक पहुंचेगा इलाज, सुक्खू सरकार ने तीन मोबाइल थैरेपी सेंटर किए शुरू

दूरदराज बच्चों के लिए घर तक पहुंचेगा इलाज, सुक्खू सरकार ने तीन मोबाइल थैरेपी सेंटर किए शुरू

हिमाचल प्रदेश में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को विशेषज्ञ चिकित्सा और पुनर्वास सेवाएं उपलब्ध करवाने की दिशा में सरकार ने नई पहल शुरू की है। अब बच्चों और उनके अभिभावकों को फिजियोथैरेपी, स्पीच थैरेपी और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए बार-बार दूर शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। समग्र शिक्षा हिमाचल प्रदेश की ओर से ‘मोबाइल रिसोर्स सेंटर-थैरेपी ऑन व्हील्स’ परियोजना शुरू की गई है, जिसके तहत विशेषज्ञ सेवाएं मोबाइल वाहनों के माध्यम से बच्चों के घर और स्कूल के नजदीक पहुंचाई जाएंगी।

मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने सोमवार को शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर की मौजूदगी में तीन मोबाइल रिसोर्स सेंटर वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। परियोजना का पहला चरण मंडी, शिमला और कांगड़ा जिलों में लागू किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य उन विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों तक विशेषज्ञ सेवाएं पहुंचाना है, जिनके लिए नियमित रूप से अस्पताल या पुनर्वास केंद्र तक जाना मुश्किल होता है।

एक ही जगह कई विशेषज्ञ सेवाएं

‘थैरेपी ऑन व्हील्स’ के तहत मोबाइल रिसोर्स सेंटर में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की जरूरत के अनुसार कई तरह की सेवाएं उपलब्ध होंगी। बच्चों को फिजियोथैरेपी, व्यावसायिक चिकित्सा, वाणी एवं भाषा चिकित्सा तथा विशेष शिक्षा जैसी सुविधाएं एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल सकेंगी।

इसके अलावा मोबाइल टीम बच्चों की स्क्रीनिंग करेगी और उनकी जरूरत के मुताबिक आकलन भी किया जाएगा। आवश्यकता के आधार पर बहु-विषयक थैरेपी, पुनर्वास और परामर्श सेवाएं भी उपलब्ध करवाई जाएंगी।

परियोजना का फोकस केवल बच्चे को थैरेपी देने तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञ अभिभावकों को भी यह समझाएंगे कि बच्चे की स्थिति के अनुसार घर पर किस तरह की देखभाल और अभ्यास किया जा सकता है। इससे परिवार बच्चों के पुनर्वास की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन सकेंगे।

पहचान से लेकर फॉलोअप तक निगरानी

इस परियोजना में विशेष बच्चों की जरूरतों को शुरुआती स्तर पर पहचानने से लेकर उनके आकलन, उपचार, पुनर्वास और फॉलोअप तक सहायता उपलब्ध करवाने की योजना है।

विशेषज्ञ बच्चों की स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद उनके लिए जरूरी सेवाओं और थैरेपी का निर्धारण करेंगे। इसके बाद समय-समय पर उनकी प्रगति की निगरानी भी की जाएगी। जिन बच्चों को उच्च स्तर की विशेषज्ञ चिकित्सा की आवश्यकता होगी, उन्हें संबंधित विशेषज्ञ संस्थानों या स्वास्थ्य केंद्रों के लिए रेफर किया जाएगा।

सरकार का मानना है कि विकासात्मक देरी या किसी तरह की दिव्यांगता की समय रहते पहचान होने पर उचित थैरेपी और प्रशिक्षण से बच्चों की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।

बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर

परियोजना का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को दैनिक जीवन के कार्यों में अधिक आत्मनिर्भर बनाना है। इसके लिए बच्चों को उनकी क्षमता के अनुसार रोजमर्रा की गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

इसके साथ ही बच्चों के संचार कौशल, शारीरिक एवं कार्यात्मक क्षमता और सामाजिक सहभागिता को विकसित करने पर ध्यान दिया जाएगा। परियोजना के माध्यम से बच्चों की शैक्षणिक गतिविधियों में भागीदारी बढ़ाने का भी प्रयास होगा, ताकि दिव्यांगता के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो।

समावेशी शिक्षा की अवधारणा को मजबूत करते हुए यह कोशिश की जाएगी कि विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थी स्कूल और समाज की मुख्यधारा से जुड़े रहें।

शिक्षकों और अभिभावकों को भी प्रशिक्षण

‘थैरेपी ऑन व्हील्स’ परियोजना में केवल विद्यार्थियों के लिए ही सेवाएं नहीं रखी गई हैं। शिक्षकों और विशेष शिक्षकों के लिए भी ओरिएंटेशन और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

इसका उद्देश्य शिक्षकों को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझने और कक्षा में उनके साथ प्रभावी तरीके से काम करने के लिए तैयार करना है। शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार, सीखने की क्षमता और आवश्यक सहयोग से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी जाएगी।

वहीं, अभिभावकों की काउंसिलिंग भी परियोजना का हिस्सा होगी। उन्हें बच्चों की दिव्यांगता, विकासात्मक जरूरतों और सरकार की ओर से उपलब्ध सहायता सेवाओं के बारे में जानकारी दी जाएगी। इससे अभिभावकों को बच्चों के लिए सही समय पर उचित सहायता लेने में मदद मिलेगी।

ग्रामीण और दुर्गम इलाकों को प्राथमिकता

समग्र शिक्षा के स्टेट प्रोजेक्ट डायरेक्टर राजेश शर्मा ने कहा कि इस पहल के पीछे मुख्य उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों को उनके आसपास ही जरूरी विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध करवाना है। उन्होंने कहा कि परियोजना समावेशी शिक्षा को अधिक सुलभ, व्यावहारिक और विद्यार्थी केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में इस तरह की मोबाइल सेवा की जरूरत और भी अधिक महसूस होती है। कई ग्रामीण और दुर्गम इलाकों से बच्चों को विशेषज्ञ डॉक्टरों या पुनर्वास केंद्रों तक ले जाना परिवारों के लिए आसान नहीं होता। लंबी दूरी, परिवहन की समस्या और बार-बार आने-जाने का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी बाधा बन जाता है।

ऐसे में यदि विशेषज्ञ सेवाएं ही बच्चों के आसपास पहुंच जाएं तो परिवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव दोनों कम हो सकते हैं।

कई बच्चे घर से निकलने में भी असमर्थ

विशेष आवश्यकता वाले कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें चलने-फिरने में कठिनाई होती है या जो गंभीर शारीरिक अथवा विकासात्मक समस्याओं के कारण नियमित रूप से घर से बाहर नहीं निकल पाते। ऐसे बच्चों को अस्पताल या पुनर्वास केंद्र तक ले जाना परिवार के लिए विशेष चुनौती बन जाता है।

कई बार दूरी और संसाधनों की कमी के कारण बच्चे जरूरी थैरेपी से वंचित भी रह जाते हैं। मोबाइल रिसोर्स सेंटर ऐसे बच्चों तक सेवाएं पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं।

सरकार का मानना है कि उपचार और थैरेपी को बच्चों के करीब ले जाने से नियमित फॉलोअप भी बेहतर तरीके से संभव होगा। इससे बच्चों की प्रगति को लंबे समय तक ट्रैक किया जा सकेगा और जरूरत पड़ने पर उनकी थैरेपी में बदलाव भी किया जा सकेगा।

शुरुआती पहचान से बेहतर परिणाम की उम्मीद

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में विकासात्मक देरी या दिव्यांगता की पहचान जितनी जल्दी हो, उतनी ही जल्दी उचित हस्तक्षेप शुरू किया जा सकता है। शुरुआती उम्र में थैरेपी और प्रशिक्षण मिलने से बच्चे की शारीरिक, मानसिक, संचार और सामाजिक क्षमताओं के विकास में मदद मिल सकती है।

इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए मोबाइल सेंटरों में स्क्रीनिंग और आवश्यकता आधारित आकलन को भी शामिल किया गया है। इससे ऐसे बच्चों की पहचान में मदद मिल सकती है, जिन्हें अतिरिक्त चिकित्सा, शैक्षणिक या पुनर्वास सहयोग की जरूरत है।

परियोजना का उद्देश्य बच्चों को केवल बीमारी या दिव्यांगता के नजरिये से देखने के बजाय उनकी क्षमताओं को विकसित करना है।

प्रदेश में 6,692 विशेष विद्यार्थी

प्रदेश सरकार के आधिकारिक अनुमानों के अनुसार हिमाचल में करीब 8,000 विशेष आवश्यकता वाले बच्चे हैं। इनमें से 6,692 विद्यार्थी वर्तमान में स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। ये विद्यार्थी पहली कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार इनमें 3,679 लड़के और 3,013 लड़कियां शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को उनकी जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध करवाना सरकार के सामने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

मोबाइल रिसोर्स सेंटर के माध्यम से इन बच्चों तक सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, ताकि भौगोलिक दूरी उनकी शिक्षा और पुनर्वास के रास्ते में बाधा न बने।

कांगड़ा और शिमला में अधिक मामले

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक हिमाचल में हाल के वर्षों के दौरान हर साल बड़ी संख्या में बच्चे जन्मजात दिव्यांगताओं के साथ जन्म ले रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों में कांगड़ा और शिमला जिलों में जन्मजात दिव्यांगता के मामलों की संख्या अधिक बताई गई है।

इसी कारण परियोजना के शुरुआती चरण में शिमला और कांगड़ा जैसे जिलों को शामिल करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मंडी को भी पहले चरण का हिस्सा बनाया गया है। इन जिलों में परियोजना के अनुभवों के आधार पर आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।

एक साल चलेगी परियोजना, परिणाम के आधार पर होगा विस्तार

‘मोबाइल रिसोर्स सेंटर-थैरेपी ऑन व्हील्स’ फिलहाल एक वर्ष के लिए संचालित की जाएगी। इस दौरान परियोजना के तहत बच्चों तक पहुंच, उपलब्ध करवाई गई सेवाओं, थैरेपी के परिणाम और विद्यार्थियों की प्रगति का आकलन किया जाएगा।

सरकार इन अनुभवों के आधार पर भविष्य में परियोजना को प्रदेश के अन्य जिलों और दुर्गम क्षेत्रों तक विस्तार देने पर विचार कर सकती है।

कुल मिलाकर, ‘थैरेपी ऑन व्हील्स’ हिमाचल में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए स्वास्थ्य, पुनर्वास और शिक्षा सेवाओं को उनके घर और स्कूल के करीब लाने की कोशिश है। यदि परियोजना अपने निर्धारित उद्देश्यों में सफल रहती है, तो पहाड़ी और दूरदराज इलाकों के उन परिवारों को बड़ी राहत मिल सकती है, जिन्हें बच्चों की थैरेपी के लिए बार-बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।