मोबाइल ने बदली बच्चों की पढ़ाई की आदत, स्क्रीन बढ़ी तो रीडिंग के साथ मैथ्स-साइंस भी कमजोर

मोबाइल ने बदली बच्चों की पढ़ाई की आदत, स्क्रीन बढ़ी तो रीडिंग के साथ मैथ्स-साइंस भी कमजोर

आज के दौर में स्मार्टफोन, टैबलेट और दूसरे डिजिटल उपकरण बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक, किशोरों का काफी समय स्क्रीन के सामने गुजर रहा है। लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस बढ़ते स्क्रीन टाइम के शिक्षा पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर बच्चे डिजिटल डिवाइस पर जरूरत से ज्यादा समय बिताते हैं तो इसका सीधा असर उनकी एकाग्रता, पढ़ने की आदत और अकादमिक प्रदर्शन पर दिखाई दे सकता है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन यानी ओईसीडी की ओर से जारी 2025 के इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट यानी पीआईएसए के आंकड़ों में 15 साल की उम्र के छात्रों के प्रदर्शन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इस वैश्विक आकलन में 91 देशों के करीब 7.6 लाख छात्रों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट में पढ़ने, गणित और विज्ञान जैसे तीन प्रमुख क्षेत्रों में छात्रों की क्षमता का मूल्यांकन किया गया।

इस अध्ययन से सामने आई सबसे अहम बात यह है कि इस सदी में 15 साल के विद्यार्थियों की पढ़ने, गणित और विज्ञान से जुड़ी औसत क्षमता अब तक के सबसे कमजोर स्तरों में पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन बढ़ता स्क्रीन टाइम और किताबें पढ़ने के लिए घटता समय इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

पढ़ने की क्षमता में लगातार आई गिरावट

पीआईएसए के आंकड़ों पर नजर डालें तो छात्रों की रीडिंग क्षमता में पिछले एक दशक से ज्यादा समय में उल्लेखनीय कमी आई है। साल 2012 में पढ़ने का औसत स्कोर 501 अंक था। अब यह आंकड़ा घटकर 466 अंक रह गया है। यानी छात्रों के प्रदर्शन में काफी बड़ा अंतर देखने को मिला है।

रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि आज के 15 वर्षीय छात्रों का औसत पढ़ने का स्तर उस क्षमता के आसपास पहुंच गया है, जिसकी पहले करीब एक साल कम उम्र के छात्रों से उम्मीद की जाती थी। इसका मतलब है कि उम्र बढ़ने के साथ जिस स्तर की समझ और पढ़ने की क्षमता विकसित होनी चाहिए, उसमें अपेक्षित प्रगति नहीं हो रही है।

इस बदलाव को केवल परीक्षा के अंकों की गिरावट के तौर पर नहीं देखा जा रहा। पढ़ने की क्षमता कमजोर होने का असर किसी भी विषय को समझने, लंबे सवालों को पढ़ने, जानकारी का विश्लेषण करने और सही निष्कर्ष तक पहुंचने पर पड़ सकता है।

स्क्रीन पर बढ़ता वक्त बन रहा है चिंता की वजह

ओईसीडी के मुताबिक, डिजिटल उपकरण अपने आप में पढ़ाई के लिए नुकसानदायक नहीं हैं। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो स्मार्टफोन, कंप्यूटर और टैबलेट छात्रों को पढ़ाई में मदद कर सकते हैं। ऑनलाइन जानकारी, शैक्षणिक सामग्री और डिजिटल संसाधन सीखने की प्रक्रिया को आसान भी बना सकते हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब स्क्रीन का इस्तेमाल पढ़ाई की जरूरत से आगे निकलकर मनोरंजन और लगातार डिजिटल गतिविधियों तक पहुंच जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ओईसीडी देशों में छात्र हर कार्य दिवस औसतन करीब 3.4 घंटे मनोरंजन के लिए डिजिटल डिवाइस इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा कक्षा और घर पर पढ़ाई से जुड़े कामों के लिए भी वे लगभग तीन घंटे डिजिटल उपकरणों पर बिताते हैं।

यानी कई छात्रों के दिन का एक बड़ा हिस्सा किसी न किसी रूप में स्क्रीन के सामने गुजर रहा है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब स्क्रीन टाइम और पढ़ने की आदत के बीच संबंध पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

ओईसीडी के महासचिव माथियास कॉर्मन ने भी डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर की। उनके मुताबिक, जब स्क्रीन का इस्तेमाल एक निश्चित सीमा से आगे बढ़ जाता है तो छात्रों के शैक्षणिक परिणाम कमजोर पड़ने लगते हैं। खास तौर पर पांच घंटे से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करने वाले छात्रों के प्रदर्शन में गिरावट का संबंध सामने आया है।

बच्चे पढ़ रहे हैं, लेकिन पहले जैसी गहराई से नहीं

डिजिटल दौर ने जानकारी हासिल करने का तरीका बदल दिया है। बच्चे और किशोर अब लंबे लेख या किताब पढ़ने के बजाय छोटी-छोटी जानकारियों, पोस्ट, वीडियो और तेजी से बदलती डिजिटल सामग्री के आदी होते जा रहे हैं। इसका असर पढ़ने की शैली पर भी पड़ सकता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि छात्र अब कई बार पाठ को तेजी से पढ़ते हैं और सवालों का जवाब देने में जल्दबाजी करते हैं। नतीजतन, वे कई बार सही जानकारी सामने होने के बावजूद गलत उत्तर दे देते हैं।

यह समस्या केवल पढ़ने की गति से जुड़ी नहीं है। किसी लंबे पाठ को समझने के लिए ध्यान बनाए रखना, जरूरी जानकारी पहचानना और पूरे संदर्भ को समझना जरूरी होता है। लगातार डिजिटल कंटेंट देखने की आदत इन क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है।

यही कारण है कि विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा बढ़ रही है कि बच्चों के लिए सिर्फ स्क्रीन का कुल समय ही नहीं, बल्कि वे स्क्रीन पर क्या कर रहे हैं, यह भी महत्वपूर्ण है।

मैथ्स और साइंस में भी कमजोर हुआ प्रदर्शन

पीआईएसए के आंकड़ों में केवल रीडिंग स्कोर ही नीचे नहीं गया है। गणित और विज्ञान में भी छात्रों के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज हुई है।

विज्ञान में 2009 में छात्रों का औसत स्कोर 506 अंक था, जो अब घटकर 486 रह गया है। इसी तरह गणित का औसत स्कोर 2009 में 502 अंक था और अब यह 469 तक पहुंच गया है।

गणित और विज्ञान जैसे विषयों में मजबूत प्रदर्शन के लिए केवल रटने की क्षमता पर्याप्त नहीं होती। छात्रों को सवाल समझना, उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण करना और उसके आधार पर समाधान निकालना पड़ता है। ऐसे में अगर पढ़ने की समझ और एकाग्रता प्रभावित होती है तो उसका असर दूसरे विषयों पर भी पड़ सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि पढ़ाई में बेहतर संसाधनों की सुविधा रखने वाले परिवारों के बच्चों में भी रीडिंग स्कोर में गिरावट देखने को मिली है। इससे संकेत मिलता है कि यह समस्या केवल आर्थिक रूप से कमजोर या सीमित संसाधनों वाले परिवारों तक ही नहीं है।

कक्षा में भी डिजिटल डिवाइस बन रहे हैं ध्यान भटकाने की वजह

स्क्रीन टाइम का प्रभाव सिर्फ घर तक सीमित नहीं है। स्कूल और कक्षा में इस्तेमाल होने वाले डिजिटल उपकरण भी छात्रों का ध्यान भटका सकते हैं।

ओईसीडी के अध्ययन में 82 शिक्षा प्रणालियों में से 59 में डिजिटल डिवाइस से होने वाला ध्यान भटकाव और विज्ञान के कमजोर प्रदर्शन के बीच संबंध पाया गया। यानी जिन जगहों पर छात्रों का ध्यान डिजिटल उपकरणों की वजह से ज्यादा भटक रहा था, वहां विज्ञान के नतीजे भी अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दिए।

एक चौथाई से ज्यादा छात्रों ने यह भी माना कि कक्षा में डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल की वजह से उनके साथ पढ़ने वाले दूसरे विद्यार्थियों का ध्यान भटकता है। इसका असर पूरी कक्षा के सीखने के माहौल पर पड़ सकता है।

हालांकि, ओईसीडी ने स्कूलों में स्मार्टफोन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की सिफारिश नहीं की है। संगठन का रुख यह है कि डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए, ताकि इसके फायदे मिलें और अनावश्यक ध्यान भटकाव से बचा जा सके।

एआई चैटबॉट का इस्तेमाल भी बढ़ा, लेकिन नतीजे सवाल खड़े करते हैं

पढ़ाई के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई चैटबॉट का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में सामने आया कि लगभग आधे छात्र पढ़ाई से जुड़े कामों के लिए नियमित रूप से एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करते हैं।

एआई का उपयोग अगर किसी कठिन विषय को समझने, अतिरिक्त जानकारी जुटाने या अपनी गलतियां पहचानने के लिए किया जाए तो यह सीखने में मदद कर सकता है। लेकिन जब छात्र खुद सोचने और लिखने की प्रक्रिया को छोड़कर पूरा काम एआई से करवाने लगते हैं, तो समस्या पैदा हो सकती है।

अध्ययन के अनुसार, जो छात्र निबंध लिखने, किसी पाठ का सारांश तैयार करने या किसी विषय पर शोध करने के लिए एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करते थे, उनका विज्ञान में औसत स्कोर ऐसे छात्रों की तुलना में करीब 20 अंक कम रहा, जो इस तरह एआई का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। यह अंतर लगभग एक साल की पढ़ाई के बराबर बताया गया है।

हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि एआई का इस्तेमाल ही कम स्कोर की एकमात्र वजह है। छात्रों की पढ़ाई की आदत, तकनीक के इस्तेमाल का तरीका और अन्य शैक्षणिक परिस्थितियां भी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।

पूर्वी एशियाई देशों का प्रदर्शन सबसे मजबूत

इस वैश्विक आकलन में पूर्वी एशिया के कई देशों ने शानदार प्रदर्शन किया। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और ताइवान पढ़ने, गणित और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल रहे।

शीर्ष 10 में ब्रिटेन और एस्टोनिया को छोड़कर अधिकांश देश इसी क्षेत्र से रहे। इससे यह भी पता चलता है कि अलग-अलग देशों में शिक्षा व्यवस्था, डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल और छात्रों की पढ़ाई की आदतों के बीच काफी अंतर हो सकता है।

कुल मिलाकर पीआईएसए के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि बच्चों के लिए डिजिटल दुनिया और पारंपरिक पढ़ाई के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता जा रहा है। स्मार्टफोन और डिजिटल तकनीक को पूरी तरह शिक्षा से अलग करना व्यावहारिक समाधान नहीं है, लेकिन मनोरंजन के लिए लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने और किताबों से दूरी बढ़ने के असर को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

विशेषज्ञों की चिंता अब सिर्फ इस बात पर नहीं है कि बच्चे कितने घंटे मोबाइल देखते हैं, बल्कि इस पर भी है कि उस दौरान उनका दिमाग किस तरह की गतिविधि में लगा रहता है। अगर स्क्रीन बच्चों के पढ़ने, ध्यान केंद्रित करने और खुद सोचने के समय को लगातार कम करती रही, तो इसका असर परीक्षा के अंकों से कहीं आगे उनकी सीखने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।

इसलिए बच्चों के लिए डिजिटल डिवाइस का संतुलित इस्तेमाल, नियमित किताब पढ़ने की आदत और बिना स्क्रीन के पढ़ाई करने का समय तय करना आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

Photo : Shutterstock