चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियों को तेज करना शुरू कर दिया है। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 17 मार्च 2027 के आसपास पूरा होना है और 17 सितंबर से चुनावी प्रक्रिया के लिए करीब छह महीने का समय शेष रह जाएगा। ऐसे में सितंबर का दूसरा पखवाड़ा पंजाब की राजनीति के लिहाज से खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के साथ भाजपा, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल ने भी अपनी गतिविधियों को गति देने की तैयारी शुरू कर दी है।
राजनीतिक दलों की सक्रियता से साफ संकेत मिल रहे हैं कि पंजाब में चुनावी माहौल अब धीरे-धीरे तैयार हो रहा है। बैठकों, संगठनात्मक नियुक्तियों, जनसभाओं, यात्राओं और सरकार के कामकाज को लेकर प्रचार के बीच आने वाले दिनों में राजनीतिक गतिविधियां और बढ़ने की संभावना है। सभी प्रमुख दल अपने-अपने मुद्दों के साथ जनता के बीच जाने की रणनीति बना रहे हैं।
सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी पहले ही चुनावी तैयारी के चरण में प्रवेश कर चुकी है। पार्टी संगठन में नई नियुक्तियों के साथ-साथ अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो चुका है। मुख्यमंत्री भगवंत मान स्वयं विभिन्न हलकों में कार्यक्रमों में भाग लेकर सरकार के कामकाज और पार्टी की नीतियों को जनता तक पहुंचाने में जुटे हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आप संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर आगामी विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करने में लगी है।
नशा बनेगा चुनावी राजनीति का प्रमुख मुद्दा
पंजाब की चुनावी राजनीति में इस बार नशे का मुद्दा सबसे प्रमुख मुद्दों में शामिल होता दिखाई दे रहा है। आम आदमी पार्टी सरकार बनने के बाद से ही नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती रही है। सरकार ने ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ अभियान के तहत पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियों और नशा तस्करों की संपत्ति जब्त किए जाने समेत विभिन्न कदमों को लगातार प्रचारित किया है।
आप का प्रयास है कि नशे के खिलाफ चलाए गए अभियान को चुनाव से पहले अपनी प्रमुख उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखा जाए। पार्टी समय-समय पर कार्रवाई से संबंधित आंकड़े जारी कर यह बताती रही है कि नशा तस्करों और उनके नेटवर्क के खिलाफ किस स्तर पर कार्रवाई की गई है।
दूसरी ओर विपक्षी दल सरकार के इसी अभियान को लेकर सवाल भी उठा रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार ने नशे के खिलाफ इतना बड़ा अभियान चलाया है तो पंजाब में नशीले पदार्थों की उपलब्धता और इससे जुड़ी घटनाओं पर पूरी तरह रोक क्यों नहीं लग सकी। यही कारण है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में नशे का मुद्दा सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सीधा राजनीतिक मुकाबला बन सकता है।
18 सितंबर से भाजपा का अभियान
भाजपा ने भी पंजाब में चुनावी गतिविधियों को गति देने के लिए बड़ा कार्यक्रम तैयार किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही नशे के खिलाफ देशव्यापी लड़ाई को लेकर भाजपा की प्राथमिकता स्पष्ट कर चुके हैं। उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ अभियान के बाद अब देश में नशे की समस्या को समाप्त करने को प्रमुख लक्ष्य बताया है।
इसी क्रम में भाजपा ने पंजाब में 18 सितंबर से नशा विरोधी जागरूकता यात्राएं और रैलियां शुरू करने की घोषणा की है। पार्टी की योजना के अनुसार ये यात्राएं राज्य के सभी 117 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेंगी और करीब चार हजार किलोमीटर का सफर तय करेंगी।
भाजपा इस अभियान को केवल राजनीतिक कार्यक्रम के बजाय नशे के खिलाफ जनजागरूकता अभियान के रूप में पेश करने की तैयारी में है। हालांकि चुनाव नजदीक होने के कारण इसका राजनीतिक असर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी पंजाब में नशे को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार को घेरने के साथ-साथ अपने संगठन को गांव और बूथ स्तर तक सक्रिय करने की कोशिश करेगी।
भाजपा की रणनीति में नशे के मुद्दे को जनता से सीधे जोड़ने पर जोर रहेगा। पार्टी नेताओं की ओर से सरकार की नशा विरोधी नीति और उसके परिणामों पर सवाल उठाए जाने की संभावना है। इसके साथ ही भाजपा केंद्र सरकार द्वारा नशे के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाएगी।
15 सितंबर से पंजाब दौरे पर सचिन पायलट
कांग्रेस भी पंजाब में अपनी चुनावी गतिविधियों को तेज करने की तैयारी में है। पंजाब कांग्रेस के नए प्रभारी सचिन पायलट 15 सितंबर से अपने पहले पंजाब दौरे की शुरुआत करने जा रहे हैं। दौरे की शुरुआत ही नशे के मुद्दे से जुड़े एक मामले को लेकर होने वाली है।
कांग्रेस ने तूरबंजारा निवासी गुलजार सिंह से जुड़े मामले को प्रमुख मुद्दा बनाते हुए रोष मार्च और प्रदर्शन का कार्यक्रम तैयार किया है। कांग्रेस नेताओं के अनुसार नशे से जुड़ी परिस्थितियों के कारण आत्महत्या करने वाले गुलजार सिंह के मामले को लेकर सरकार से जवाब मांगा जाएगा। पार्टी ने इस दौरान कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा के आवास के घेराव का भी कार्यक्रम रखा है।
सचिन पायलट के पहले दौरे को कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नए प्रभारी के सामने पार्टी संगठन को चुनावी मोड में लाने की चुनौती है। पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से अलग-अलग नेताओं और गुटों के बीच राजनीतिक मतभेद चर्चा में रहे हैं। ऐसे में पायलट की कोशिश पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को एक मंच पर लाकर चुनाव से पहले एकजुटता का संदेश देने की होगी।
पहले ही दिन एकजुटता दिखाने की कोशिश
कांग्रेस के कार्यक्रम में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के शामिल होने की संभावना है। खास तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन में शामिल होने की घोषणा की है। चन्नी की इस घोषणा को कांग्रेस के भीतर एकजुटता दिखाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
पार्टी की रणनीति यह है कि सचिन पायलट के पंजाब दौरे की शुरुआत से ही कांग्रेस के प्रमुख नेता एक साथ नजर आएं। इससे कार्यकर्ताओं में चुनावी सक्रियता बढ़ाने के साथ जनता के बीच भी यह संदेश देने का प्रयास होगा कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए एकजुट होकर मैदान में उतर रही है।
पायलट के दौरे के दौरान संगठनात्मक स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण चर्चाएं होने की संभावना है। विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की स्थिति, स्थानीय नेताओं की सक्रियता और चुनावी रणनीति को लेकर कांग्रेस आने वाले महीनों में अपनी गतिविधियां बढ़ा सकती है।
अकाली दल भी पीछे नहीं
पंजाब की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाला शिरोमणि अकाली दल भी चुनावी गतिविधियों को तेज करने की तैयारी में है। पार्टी लंबे समय से संगठन को दोबारा मजबूत करने और जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। चुनाव नजदीक आने के साथ अकाली दल की ओर से भी राजनीतिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है।
इस तरह सितंबर का दूसरा पखवाड़ा पंजाब की राजनीति में कई बड़े घटनाक्रमों का गवाह बन सकता है। एक तरफ भाजपा 18 सितंबर से राज्यभर में नशा विरोधी यात्राओं के जरिए अपना अभियान शुरू करेगी, वहीं कांग्रेस इससे पहले 15 सितंबर से सचिन पायलट के दौरे के साथ सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। आम आदमी पार्टी पहले ही विधानसभा क्षेत्रों में अपनी गतिविधियां बढ़ा चुकी है।
छह महीने का समय, लेकिन तैयारियां अभी से
विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने में लगभग छह महीने का समय बाकी होने के बावजूद राजनीतिक दलों ने चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पंजाब जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य में चुनावी अभियान को अंतिम समय तक सीमित रखना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होता। संगठन मजबूत करने, उम्मीदवारों की संभावित दावेदारी पर काम करने, बूथ स्तर का नेटवर्क तैयार करने और जनता के बीच मुद्दों को स्थापित करने में लंबा समय लगता है।
आम आदमी पार्टी के सामने सरकार के कामकाज को चुनावी उपलब्धि के रूप में पेश करने की चुनौती है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा पहली बार राज्य में व्यापक स्तर पर अपने संगठन और राजनीतिक आधार को विस्तार देने पर जोर देगी। अकाली दल भी अपने पारंपरिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में रहेगा।
इन सभी दलों के अभियान में नशे का मुद्दा केंद्रीय भूमिका में दिखाई दे रहा है। फर्क केवल इतना होगा कि सत्तारूढ़ आप अपने अभियान और कार्रवाई को उपलब्धि के रूप में पेश करेगी, जबकि कांग्रेस और भाजपा सरकार से नशे की समस्या के स्थायी समाधान को लेकर सवाल पूछेंगे।
आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में रैलियों, यात्राओं, प्रदर्शन और जनसभाओं का सिलसिला बढ़ने की संभावना है। सितंबर के दूसरे पखवाड़े से शुरू होने वाली राजनीतिक गतिविधियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि राज्य में विधानसभा चुनाव का औपचारिक बिगुल भले ही अभी न बजा हो, लेकिन प्रमुख दलों ने चुनावी मैदान की तैयारी शुरू कर दी है। अब देखना होगा कि नशे के मुद्दे के साथ-साथ बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, विकास, किसानों और कर्मचारियों से जुड़े सवालों में से कौन से मुद्दे आने वाले महीनों में पंजाब के चुनावी विमर्श पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं।




