SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर उठे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम सुनवाई की। अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को फिलहाल निलंबित करने या उन्हें पद से हटाकर काम करने से रोकने का अंतरिम आदेश देने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू, डॉ. विवेक जोशी, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और DG (IT) सीमा खन्ना को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से संबंधित करीब 14 महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल मीडिया रिपोर्ट या आरोपों के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सभी फैसले अकेले लिए गए थे। इसके लिए चुनाव आयोग का रिकॉर्ड देखना जरूरी है और आयोग को इस बारे में स्पष्ट तथा पारदर्शी जवाब देना होगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की दलीलों पर कई सवाल उठाए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि वर्ष 2023 में बनाए गए कानून के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की शक्तियों तथा कानूनी सुरक्षा की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि पहले के मुकाबले अब CEC को विशेष सुरक्षा प्राप्त है और ऐसे में चुनाव आयोग की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल पैदा हो रहे हैं। उन्होंने अनूप बरनवाल मामले का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके मुताबिक, यदि आयोग के भीतर ही निर्णय लेने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है तो यह सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सबसे पहले यह समझने की कोशिश की कि 2023 के कानून में आखिर ऐसा क्या बदलाव किया गया है, जिसके आधार पर याचिकाकर्ता मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों पर सवाल उठा रहे हैं। विकास सिंह ने बताया कि नए कानून की धारा 16 के तहत CEC और चुनाव आयुक्तों को विशेष कानूनी सुरक्षा दी गई है। उनका तर्क था कि इस प्रावधान के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को सामान्य संवैधानिक पदों की तुलना में अलग और अधिक सुरक्षित स्थिति मिल गई है। याचिकाकर्ता की दूसरी वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि जिस कानूनी व्यवस्था के जरिए कथित गलत कामों को सुरक्षा मिल रही है, उसी व्यवस्था की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठता है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता हैं और यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर ही संदेह पैदा हो जाए तो इसका असर लोगों के भरोसे पर पड़ता है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी आग्रह किया कि SIR से जुड़े विवादित फैसलों का पूरा रिकॉर्ड मंगाया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि रिकॉर्ड में किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। उनका आरोप है कि जिन 14 फैसलों का जिक्र किया जा रहा है, उनमें बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी। इस पर जस्टिस बागची ने सीधा सवाल किया कि क्या याचिकाकर्ताओं का दावा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इन फैसलों पर आपत्ति दर्ज की थी। जवाब में विकास सिंह ने कहा कि उनका यही आरोप है और इसकी वास्तविकता रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
अदालत ने इस मुद्दे पर यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग में निर्णय हमेशा सर्वसम्मति से हों, ऐसा कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि आयोग से स्वाभाविक रूप से उम्मीद की जाती है कि वह सर्वसम्मति से फैसले लेने का प्रयास करे, लेकिन यदि सदस्यों के बीच सहमति नहीं बनती तो कानून के तहत बहुमत से निर्णय लिया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अभी याचिकाकर्ता मुख्य रूप से एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर अपनी दलील आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए रिकॉर्ड और आयोग के जवाब के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत जरूर दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित हो जाता है कि किसी फैसले को लेने की निर्धारित संवैधानिक या कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो अदालत उस फैसले पर हस्तक्षेप कर सकती है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर यह सामने आता है कि किसी फैसले को आवश्यक सहमति के बिना लिया गया था तो उस पर रोक लगाई जा सकती है और जरूरत पड़ने पर उसे कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर भी घोषित किया जा सकता है। यानी अदालत ने फिलहाल CEC के खिलाफ कोई व्यक्तिगत कार्रवाई नहीं की, लेकिन यह साफ कर दिया कि चुनाव आयोग के फैसले भी न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं हैं।
विकास सिंह ने सुनवाई में यह भी मांग की कि अगली सुनवाई तक चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि महत्वपूर्ण निर्णय केवल सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाएं। हालांकि कोर्ट ने इस मांग पर तत्काल कोई आदेश जारी नहीं किया। CJI सूर्यकांत ने कहा कि कानून में निर्णय लेने की व्यवस्था निर्धारित है और आयोग को उसी का पालन करना होगा। यदि यह साबित होता है कि कानून का उल्लंघन किया गया है तो अदालत उसके खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम है। इसी दौरान याचिकाकर्ता ने यह सवाल भी उठाया कि यदि 14 फैसले वास्तव में निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत लिए गए हैं तो कोर्ट के पास उन्हें रोकने या रद्द करने की क्या शक्ति होगी। अदालत ने जवाब में कहा कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही इस पर उचित फैसला लिया जा सकता है।
सुनवाई में CEC को तत्काल निलंबित करने की मांग भी रखी गई। विकास सिंह ने कहा कि आरोप इतने गंभीर हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अंतरिम तौर पर अपने पद के कामकाज से अलग किया जाना चाहिए। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि बाकी दो चुनाव आयुक्त चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं। हालांकि जस्टिस बागची ने सवाल किया कि यदि CEC को हटा दिया जाए या काम से रोक दिया जाए तो चुनाव प्रक्रिया का संचालन कौन करेगा। याचिकाकर्ता की ओर से जवाब दिया गया कि देश में चुनाव कराने के लिए अन्य चुनाव आयुक्त मौजूद हैं और संस्था का काम किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। लेकिन कोर्ट ने तत्काल ऐसी कोई व्यवस्था बनाने का आदेश नहीं दिया।
CEC को निलंबित करने की मांग पर कानूनी स्थिति भी इस मामले में महत्वपूर्ण है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनाव कराने और उसकी निगरानी की संवैधानिक जिम्मेदारी दी गई है। वहीं मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया भी संविधान में विशेष रूप से निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट के पास CEC को सीधे निलंबित करने की कोई स्पष्ट विशेष संवैधानिक शक्ति नहीं बताई गई है। हालांकि यदि चुनाव आयोग का कोई निर्णय कानून या संविधान के खिलाफ पाया जाता है तो अदालत न्यायिक समीक्षा के जरिए उस फैसले पर रोक लगा सकती है या उसे निरस्त कर सकती है। इसी अंतर को देखते हुए अदालत ने व्यक्तिगत रूप से CEC के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के बजाय पहले आयोग से जवाब और रिकॉर्ड मांगना उचित समझा।
यह विवाद उस समय और बढ़ा जब एक मीडिया रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर कथित मतभेदों का दावा किया गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR की प्रक्रिया को लेकर आयोग के अंदर कई बार अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाए कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कुछ महत्वपूर्ण निर्णय बाकी सदस्यों की सहमति के बिना लिए। चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों को पूरी तरह और स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किए जाने को भी याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील का आधार बनाया।
मामले में 2023 के कानून की धारा 16 को लेकर भी तीखी बहस हुई। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इस प्रावधान के तहत CEC को ऐसी कानूनी सुरक्षा हासिल है जो सामान्य तौर पर अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को नहीं मिलती। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि ऐसी सुरक्षा शायद राष्ट्रपति को प्राप्त है और यहां तक कि न्यायाधीशों को भी इस तरह की सुरक्षा नहीं मिली है। विकास सिंह ने जवाब दिया कि प्रधानमंत्री को भी ऐसी सुरक्षा हासिल नहीं है और उनका आरोप है कि नए कानून ने CEC को असाधारण रूप से मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि CEC पर लगाए जा रहे आरोप राजनीतिक और आधारहीन हैं। ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। विपक्ष इससे पहले भी उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर चुका है। अप्रैल 2026 में विपक्ष की ओर से महाभियोग का नोटिस दिया गया था, लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हो गया था। राज्यसभा में इससे जुड़ी प्रक्रिया अभी लंबित बताई जा रही है।
CEC को पद से हटाने का संवैधानिक रास्ता महाभियोग की प्रक्रिया से जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी व्यवस्था से जुड़ी है। महाभियोग प्रस्ताव को संसद में आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। इसके बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत पड़ती है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में विपक्ष के पास दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई समर्थन नहीं है। इसी वजह से तत्काल महाभियोग के जरिए CEC को हटाना विपक्ष के लिए आसान नहीं माना जा रहा है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार को न तो निलंबित किया है और न ही उनके कामकाज पर रोक लगाई है। अदालत ने केवल संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए मामले में जवाब और रिकॉर्ड मांगा है। CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि लोक प्रहरी मामले की सुनवाई 27 अक्टूबर को प्रस्तावित है और मौजूदा मामले को उससे पहले सुना जा रहा है। अब अगली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग 14 कथित फैसलों से जुड़े रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया को लेकर क्या स्पष्टीकरण देता है। यदि रिकॉर्ड से आरोपों की पुष्टि होती है तो सुप्रीम कोर्ट संबंधित फैसलों की वैधता पर हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन फिलहाल अदालत ने बिना रिकॉर्ड देखे CEC के खिलाफ कोई कठोर अंतरिम कदम उठाने से इनकार कर दिया है। इस तरह SIR विवाद में अगला निर्णायक मोड़ चुनाव आयोग के जवाब और उसके सामने रखे जाने वाले आधिकारिक रिकॉर्ड से आएगा।




