गर्भावस्था को आमतौर पर बच्चे के जन्म तक सीमित स्वास्थ्य अवस्था के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इस दौरान सामने आने वाली कुछ मेडिकल परेशानियां महिला की आगे की सेहत के बारे में भी महत्वपूर्ण संकेत दे सकती हैं। ब्रिटेन में किए गए एक बड़े अध्ययन ने इसी दिशा में गंभीर चिंता सामने रखी है। शोध के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर, गर्भावधि डायबिटीज, समय से पहले डिलीवरी और प्रसव के बाद डिप्रेशन जैसी जटिलताओं का सामना करने वाली महिलाओं में भविष्य के वर्षों में हृदय रोग, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और क्रोनिक किडनी डिजीज जैसी बीमारियों का जोखिम सामान्य महिलाओं की तुलना में अधिक पाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं को केवल उस समय की समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ये शरीर में मौजूद कुछ लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिमों की शुरुआती झलक भी हो सकती हैं।
यह अध्ययन ब्रिटेन में पंजीकृत 14 लाख से ज्यादा महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड और अस्पताल से जुड़े आंकड़ों के आधार पर किया गया। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली अलग-अलग जटिलताओं और बाद के जीवन में सामने आने वाली प्रमुख कार्डियो-मेटाबोलिक-रीनल बीमारियों के बीच किस तरह का संबंध है। अध्ययन में विशेष रूप से चार स्थितियों पर ध्यान दिया गया, जिनमें हृदय से जुड़ी बीमारियां, टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और क्रोनिक किडनी डिजीज शामिल हैं। अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘बीएमजे मेडिसिन’ में प्रकाशित हुए हैं।
गर्भावस्था में शुगर बढ़ना भविष्य के डायबिटीज जोखिम का बड़ा संकेत
अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज यानी जेस्टेशनल डायबिटीज का संबंध भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज से पाया गया। शोध के अनुसार, जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या होती है, उनमें बाद के जीवन में टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने का जोखिम सामान्य महिलाओं की तुलना में करीब सात गुना तक अधिक हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज होने वाली हर महिला को आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज जरूर होगी, लेकिन यह स्थिति भविष्य में मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को लेकर अतिरिक्त निगरानी की जरूरत जरूर बताती है।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज का संबंध केवल भविष्य में बढ़ी हुई ब्लड शुगर से नहीं है। ऐसी महिलाओं में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा भी अधिक देखा गया। यही वजह है कि विशेषज्ञों के मुताबिक गर्भावधि डायबिटीज को डिलीवरी के बाद समाप्त हो जाने वाली समस्या मानकर पूरी तरह भूल जाना उचित नहीं है। बच्चे के जन्म के बाद भी महिला की ब्लड शुगर, वजन, ब्लड प्रेशर और समग्र मेटाबॉलिक हेल्थ पर नजर रखना महत्वपूर्ण हो सकता है।
प्रेग्नेंसी में हाई BP भी आगे की सेहत के लिए चेतावनी
गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर को भी अध्ययन में भविष्य की स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा महत्वपूर्ण संकेत पाया गया। जिन महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान उच्च रक्तचाप की समस्या हुई, उनमें आगे चलकर सामान्य हाई ब्लड प्रेशर होने की संभावना तीन गुना से अधिक बताई गई। इसके अलावा इन महिलाओं में क्रोनिक किडनी डिजीज का खतरा भी लगभग दोगुना पाया गया।
हाई BP का संबंध केवल किडनी से ही नहीं रहा। अध्ययन में गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर की समस्या और बाद के वर्षों में हृदय रोग तथा टाइप-2 डायबिटीज के बढ़े हुए जोखिम के बीच भी संबंध सामने आया। इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर कई बार लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के मौजूद रहता है। ऐसे में गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर की समस्या का इतिहास डॉक्टरों के लिए भविष्य की स्वास्थ्य निगरानी में उपयोगी जानकारी बन सकता है।
डिलीवरी के बाद डिप्रेशन को सिर्फ मानसिक समस्या मानना ठीक नहीं
अध्ययन का एक अहम पहलू प्रसव के बाद होने वाले डिप्रेशन से जुड़ा है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन को आमतौर पर महिला के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या के रूप में देखा जाता है, लेकिन इस शोध में इसके और भविष्य में होने वाली कई शारीरिक बीमारियों के बीच भी संबंध सामने आया। शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रसव के बाद डिप्रेशन का सामना करने वाली महिलाओं में हृदय रोग, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और क्रोनिक किडनी डिजीज का जोखिम लगभग 35 से 56 प्रतिशत तक अधिक पाया गया।
हालांकि, शोध यह साबित नहीं करता कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन सीधे तौर पर इन बीमारियों को पैदा करता है। इसके बजाय यह संबंध इस ओर इशारा करता है कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध हो सकता है। बच्चे के जन्म के बाद महिला के स्वास्थ्य की देखभाल केवल शारीरिक रिकवरी तक सीमित रखने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य को भी समान महत्व देना जरूरी है।
समय से पहले डिलीवरी और दूसरी जटिलताएं भी महत्वपूर्ण
शोध में गर्भावस्था से जुड़ी कई अन्य स्थितियों का भी विश्लेषण किया गया। इनमें प्रीटर्म डिलीवरी यानी समय से पहले बच्चे का जन्म, गर्भपात, मृत शिशु का जन्म, प्लेसेंटा का गर्भाशय की दीवार से समय से पहले अलग होना तथा बच्चे का गर्भावस्था की अवधि के हिसाब से बहुत छोटा या बहुत बड़ा होना शामिल था।
इन स्थितियों में से कई का संबंध आगे चलकर कम से कम एक कार्डियो-मेटाबोलिक-रीनल बीमारी के बढ़े हुए खतरे से पाया गया। इसका अर्थ यह है कि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान सामने आई जटिलताओं की जानकारी महिला के मेडिकल रिकॉर्ड में लंबे समय तक महत्वपूर्ण रह सकती है। भविष्य में किसी अन्य बीमारी की जांच या उपचार के दौरान डॉक्टर के लिए यह इतिहास जोखिम का आकलन करने में मददगार हो सकता है।
14 लाख से ज्यादा महिलाओं के रिकॉर्ड से निकले निष्कर्ष
इस शोध की खास बात इसका बड़ा डेटा सेट है। ब्रिटेन में पंजीकृत 14 लाख से अधिक महिलाओं के स्वास्थ्य और अस्पताल से संबंधित रिकॉर्ड का अध्ययन किया गया। इतने बड़े समूह के आंकड़ों के विश्लेषण से शोधकर्ताओं को गर्भावस्था की अलग-अलग जटिलताओं और बाद में सामने आने वाली बीमारियों के बीच संबंधों को समझने का व्यापक अवसर मिला।
इतने बड़े अध्ययन से सामने आए आंकड़े यह संकेत देते हैं कि महिला के प्रजनन स्वास्थ्य और उसके लंबे समय के स्वास्थ्य को अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान सामने आई किसी महत्वपूर्ण समस्या को भविष्य की मेडिकल हिस्ट्री का हिस्सा माना जाना चाहिए, खासकर तब जब महिला को हाई BP, गर्भावधि डायबिटीज या प्रसव के बाद डिप्रेशन जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा हो।
क्या गर्भावस्था की जटिलता बीमारी की वजह बनती है?
शोधकर्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अध्ययन में सामने आए संबंधों का मतलब यह नहीं है कि गर्भावस्था की कोई जटिलता सीधे तौर पर भविष्य में बीमारी पैदा करती है। यानी यदि किसी महिला को प्रेग्नेंसी के दौरान हाई BP या डायबिटीज हुई है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह निश्चित रूप से आगे चलकर हृदय रोग या डायबिटीज की मरीज बनेगी।
इसके बजाय वैज्ञानिकों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान सामने आने वाली कुछ समस्याएं महिला के शरीर में पहले से मौजूद या भविष्य में विकसित होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों का संकेत हो सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान शरीर में हार्मोनल, मेटाबॉलिक और कार्डियोवैस्कुलर स्तर पर बड़े बदलाव होते हैं। कुछ महिलाओं में ये बदलाव ऐसे जोखिमों को सामने ला सकते हैं जो सामान्य परिस्थितियों में काफी समय तक दिखाई नहीं देते।
इसी वजह से शोधकर्ताओं ने इन जटिलताओं को एक तरह के शुरुआती ‘सिग्नल’ के तौर पर देखने की बात कही है। हालांकि, इन संबंधों के पीछे काम करने वाले जैविक कारणों को पूरी तरह समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।
डॉक्टरों के लिए भी बदल सकती है मेडिकल हिस्ट्री देखने की जरूरत
अध्ययन से निकलने वाला एक महत्वपूर्ण संदेश डॉक्टरों के लिए भी है। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि महिलाओं का इलाज करते समय उनकी मेडिकल हिस्ट्री के साथ-साथ पूरे प्रजनन इतिहास पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। महिला को पहले कभी गर्भावस्था के दौरान हाई BP हुआ था या नहीं, गर्भावधि डायबिटीज रही थी या नहीं, समय से पहले डिलीवरी हुई थी या प्रसव के बाद डिप्रेशन जैसी समस्या आई थी—ऐसी जानकारी आगे के स्वास्थ्य जोखिमों को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
इस तरह की जानकारी डॉक्टरों को भविष्य में ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, किडनी फंक्शन और हृदय संबंधी जोखिमों की निगरानी के बारे में बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकती है। खासकर उन महिलाओं के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है जिनके गर्भावस्था के दौरान एक से अधिक जटिलताएं सामने आई हों।
महिलाओं के लिए क्या है सबसे बड़ा संदेश?
अध्ययन का मुख्य संदेश डर पैदा करना नहीं, बल्कि भविष्य के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना है। गर्भावस्था के दौरान हाई BP या डायबिटीज जैसी समस्या होने पर डिलीवरी के बाद मेडिकल फॉलो-अप को पूरी तरह बंद कर देना उचित नहीं माना जाना चाहिए। महिला को अपनी पुरानी गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं की जानकारी संभालकर रखनी चाहिए और भविष्य में डॉक्टर से मिलते समय इस इतिहास के बारे में बताना चाहिए।
समय के साथ वजन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और किडनी से संबंधित सामान्य स्वास्थ्य जांच पर ध्यान देना भी उपयोगी हो सकता है। वहीं, प्रसव के बाद लंबे समय तक उदासी, चिंता, रुचि में कमी या मानसिक परेशानी महसूस होने पर इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
ब्रिटेन के इस बड़े अध्ययन ने यह संकेत दिया है कि गर्भावस्था महिला के स्वास्थ्य के लिए केवल नौ महीने की अवधि नहीं है, बल्कि इस दौरान सामने आने वाली कुछ जटिलताएं उसके आने वाले वर्षों की सेहत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती हैं। गर्भावस्था में हाई BP, जेस्टेशनल डायबिटीज, प्रीटर्म डिलीवरी और पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी स्थितियों को गंभीरता से लेना और इनके बाद लंबे समय तक स्वास्थ्य की निगरानी करना भविष्य में संभावित बीमारियों की पहचान और रोकथाम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।




