भारत अब वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका को नए सिरे से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार की कोशिश केवल दूसरे देशों से सामान मंगाने तक सीमित रहने के बजाय भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए विदेशी बाजारों में ज्यादा अवसर तैयार करने की है। इसी रणनीति के तहत चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान में भारतीय निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने उम्मीद जताई है कि आने वाले वर्षों में भारत इन बाजारों में वस्तुओं और सेवाओं का एक बड़ा आपूर्तिकर्ता बन सकता है।
नीदरलैंड के हेग में भारतीय पत्रकारों से बातचीत के दौरान गोयल ने भारत की व्यापार नीति, वैश्विक कंपनियों के लिए देश की बढ़ती उपयोगिता और विभिन्न देशों के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौतों पर अपनी बात रखी। उनके मुताबिक, भारत का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ऐसे अवसर हासिल करना है, जिनसे घरेलू उद्योग को फायदा मिले, रोजगार के नए रास्ते खुलें और विदेशी मुद्रा की कमाई में बढ़ोतरी हो। सरकार चाहती है कि भारतीय कारोबारियों को विदेशों में अपने उत्पाद बेचने के लिए बेहतर परिस्थितियां मिलें और भारतीय सेवाओं की मांग भी बढ़े।
चीन के साथ व्यापार में संतुलन बनाने की चुनौती
भारत और चीन के बीच व्यापार लंबे समय से असंतुलन का विषय रहा है। भारत चीन से हर साल 130 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का सामान खरीदता है, जबकि दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा लगभग 100 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि भारत चीन से जितना सामान आयात करता है, उसकी तुलना में वहां भारतीय निर्यात काफी कम है। ऐसे में चीन को भारतीय उत्पादों के लिए एक बड़े बाजार के रूप में विकसित करना आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत के लिए इस अंतर को कम करना केवल आयात घटाने का मामला नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि भारतीय कंपनियां चीन समेत दूसरे बड़े बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बढ़ाएं। इसके तहत उत्पादों की गुणवत्ता, उत्पादन लागत, आपूर्ति व्यवस्था और बाजार तक पहुंच जैसे पहलुओं की अहम भूमिका होगी। सरकार की मंशा है कि भारतीय उद्योग को ऐसे अवसर मिलें, जिनसे वह वैश्विक मांग के अनुरूप उत्पादन कर सके और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक अपनी पहुंच बढ़ा सके।
गोयल ने इस संदर्भ में कहा कि भारत अलग-अलग देशों के साथ पारस्परिक आधार पर व्यापार के अवसर तलाश रहा है। भारत चाहता है कि उसके सामान और सेवाओं को दूसरे देशों के बाजारों में उचित जगह मिले। हालांकि, किसी उत्पाद की कीमत या व्यापारिक व्यवहार में अनुचित स्थिति सामने आती है, तो उसके समाधान के लिए निर्धारित कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं। व्यापार को बढ़ावा देने के साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना भी इस व्यवस्था का हिस्सा है।
आसियान को लेकर पहले दिए गए बयान पर भी चर्चा
गोयल का चीन और आसियान के बाजारों में निर्यात बढ़ाने पर दिया गया बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पहले उन्होंने भारत-आसियान व्यापार समझौते को लेकर आलोचनात्मक टिप्पणी की थी। पिछले साल लंदन में उन्होंने इस समझौते को बेतुका बताते हुए आसियान को चीन की बी टीम कहा था। उस टिप्पणी के बाद विवाद खड़ा हुआ था और व्यापारिक संबंधों को लेकर उनकी सोच पर चर्चा हुई थी।
अब आसियान क्षेत्र को भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संभावित बाजार के रूप में पेश किया जा रहा है। यह बदलाव इस बात को रेखांकित करता है कि भारत की व्यापार रणनीति में अलग-अलग क्षेत्रों के साथ आर्थिक अवसर तलाशने पर जोर दिया जा रहा है। आसियान में दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश शामिल हैं, जहां विनिर्माण, तकनीक, कृषि उत्पादों और सेवाओं के क्षेत्र में कारोबार की संभावनाएं मौजूद हैं।
हालांकि, किसी भी व्यापार समझौते से वास्तविक लाभ मिलने के लिए बाजार की परिस्थितियों और घरेलू उद्योग की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा। भारत के लिए चुनौती यह है कि विदेशी बाजारों तक पहुंच बढ़ाने के साथ घरेलू उत्पादकों के हितों को भी सुरक्षित रखा जाए। इसी कारण व्यापार वार्ताओं में उद्योग जगत की भागीदारी और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विदेशी कंपनियों के काम भारत लाने पर जोर
वाणिज्य मंत्री ने भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए कामकाज का प्रमुख केंद्र बनाने की संभावनाओं पर भी बात की। उन्होंने कोविड महामारी के दौर से मिली सीख का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरे देशों में भारतीय प्रतिभा को भेजने के बजाय काम को भारत में लाना अधिक उपयोगी साबित हो सकता है। इससे भारत में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं।
दुनिया के कई विकसित देश युवाओं और कामकाजी आबादी की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में कंपनियों के लिए भारत में अपने वैश्विक क्षमता केंद्र स्थापित करना एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है। इन केंद्रों के जरिए कंपनियां तकनीकी सहायता, वित्तीय सेवाएं, अनुसंधान, डिजिटल संचालन और दूसरे पेशेवर कार्य भारत से संचालित कर सकती हैं।
भारत को इससे दोहरा लाभ मिलने की उम्मीद है। पहला, विदेशी कंपनियों की ओर से यहां खर्च किए जाने वाले धन और सेवाओं के निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है। दूसरा, देश के युवाओं को अपने ही शहरों और राज्यों में बेहतर रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। विदेश में नौकरी करने के लिए जाने वाले लोगों के मुकाबले भारत में काम करने वाले कर्मचारियों को अपने परिवार के साथ रहने का अवसर भी मिलता है।
गोयल के मुताबिक, जितनी अधिक वैश्विक कंपनियां भारत में अपने क्षमता केंद्र स्थापित करेंगी, देश के लिए उतना ही बेहतर होगा। हालांकि, इन अवसरों को बढ़ाने के लिए कुशल कर्मचारियों, आधुनिक बुनियादी ढांचे, तकनीकी सुविधाओं और कारोबारी माहौल को मजबूत करना भी आवश्यक होगा। भारत की बड़ी कार्यशील आबादी और पेशेवर सेवाओं का अनुभव इस दिशा में मददगार हो सकता है।
पुराने व्यापार समझौतों से सरकार ने क्या सीखा?
भारत की नई व्यापार नीति में पहले हुए समझौतों के अनुभवों को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गोयल ने स्वीकार किया कि पुराने समझौतों को तैयार करते समय संभव है कि उद्योगों और संबंधित हितधारकों से पर्याप्त चर्चा नहीं हुई हो। इसका असर कुछ संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा और भारतीय उद्योगों के अपेक्षित लाभ पर पड़ा होगा। इसी वजह से पुराने समझौतों को लेकर कारोबारी जगत में हमेशा सकारात्मक धारणा नहीं रही।
सरकार अब व्यापार समझौतों से पहले परामर्श की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने पर जोर दे रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समझौते की शर्तें तय करते समय उद्योगों की वास्तविक जरूरतों, निर्यात की संभावनाओं और घरेलू बाजार पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया जा सके। अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधियों से बातचीत करके उन मुद्दों की पहचान की जा सकती है, जिन पर वार्ता के दौरान विशेष ध्यान देना जरूरी है।
गोयल के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में व्यापार वार्ताओं के लिए बाकायदा नियमावली तैयार की गई है। समझौतों से जुड़ी प्रक्रियाओं और दस्तावेजों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज करने की व्यवस्था भी विकसित की गई है। इससे किसी अधिकारी के बदलने पर बातचीत के दौरान हासिल अनुभव और महत्वपूर्ण जानकारियां खोने की आशंका कम होगी।
सरकार समझौतों पर हस्ताक्षर होने के बाद भी काम जारी रखने की रणनीति अपना रही है। इसके लिए बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडलों को संबंधित देशों में भेजकर भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर तलाशे जाते हैं। केवल समझौता कर लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि कंपनियों को यह समझने में मदद देना भी जरूरी है कि वे नए बाजार में अपने उत्पाद कैसे बेच सकती हैं और स्थानीय कारोबारियों से संपर्क कैसे स्थापित कर सकती हैं।
चिली से समझौता करीब, कनाडा के साथ बातचीत आगे बढ़ी
भारत अब कई देशों और व्यापारिक समूहों के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की तैयारी में है। गोयल ने संकेत दिया कि अमेरिका के अलावा आठ नए व्यापार समझौतों से जुड़ी संभावनाओं पर काम चल रहा है। इन वार्ताओं की स्थिति अलग-अलग है और कुछ देशों के साथ बातचीत आगे बढ़ चुकी है, जबकि कुछ के साथ प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है।
मंत्री के मुताबिक, चिली के साथ व्यापार समझौता पूरा होने के करीब है। वहीं, कनाडा के साथ बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है। मेक्सिको भी भारत के साथ जल्द शुरुआती समझौता करना चाहता है। इन देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत होने से भारतीय कंपनियों को अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए अतिरिक्त बाजार मिल सकते हैं।
दक्षिण अफ्रीका के नेतृत्व वाले दक्षिणी अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ यानी साकू के साथ भी भारत ने बातचीत शुरू की है। इस समूह में दक्षिण अफ्रीका के अलावा बोत्सवाना, इस्वातिनी, लेसोथो और नामीबिया शामिल हैं। भारत ने अगस्त में इस समूह के साथ तरजीही व्यापार समझौते के लिए औपचारिक बातचीत की शर्तों पर हस्ताक्षर किए थे। चूंकि वार्ता अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए इसे अंतिम रूप देने में समय लग सकता है।
तरजीही व्यापार समझौते का उद्देश्य आम तौर पर चुनिंदा वस्तुओं पर व्यापारिक रियायतें उपलब्ध कराना होता है। इससे संबंधित देशों के कारोबारियों को कुछ उत्पादों के लिए बेहतर बाजार पहुंच मिल सकती है। हालांकि, रियायतों का वास्तविक दायरा समझौते की शर्तों और वार्ता के अंतिम परिणाम पर निर्भर करेगा।
मर्कोसुर, खाड़ी देशों और इस्राइल के साथ भी संभावनाएं
भारत दक्षिण अमेरिकी व्यापार समूह मर्कोसुर के साथ अपने मौजूदा तरजीही व्यापार समझौते का विस्तार करने पर भी विचार कर रहा है। इस दिशा में बातचीत तेज होने की संभावना वहां चुनावी प्रक्रिया पूरी होने और सरकार की निरंतरता स्पष्ट होने के बाद बन सकती है। समझौते का विस्तार होने पर भारतीय निर्यातकों के लिए दक्षिण अमेरिकी बाजार में अवसर बढ़ाने की गुंजाइश बन सकती है।
इसके अलावा खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी के साथ व्यापार वार्ता भी भारत की प्राथमिकताओं में शामिल है। इस समूह के साथ समझौते से खाड़ी क्षेत्र के चार और देशों के साथ व्यापारिक अवसरों को आगे बढ़ाने की संभावना है। भारत के लिए यह क्षेत्र ऊर्जा, वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में वार्ता में प्रगति होने से दोनों पक्षों के कारोबारियों को लाभ मिल सकता है।
इस्राइल के साथ व्यापार समझौते को लेकर भी बातचीत जारी है, लेकिन पश्चिम एशिया में संकट के कारण प्रक्रिया में अधिक समय लग सकता है। गोयल ने संकेत दिया कि परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण होने के बावजूद भारत वार्ता को गति देने के लिए तैयार है।
भारत की व्यापार रणनीति अब निर्यात बढ़ाने, विदेशी कंपनियों को देश में कामकाज स्थापित करने के लिए आकर्षित करने और नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने पर केंद्रित दिखाई देती है। चीन और आसियान जैसे बड़े बाजारों में भारतीय उत्पादों की मौजूदगी बढ़ाना इस लक्ष्य का अहम हिस्सा है। वहीं, चिली, कनाडा, मेक्सिको, अफ्रीकी देशों, मर्कोसुर, खाड़ी देशों और इस्राइल के साथ संभावित समझौते भारत के व्यापारिक विकल्पों का विस्तार कर सकते हैं।
इन प्रयासों की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि समझौतों के जरिए भारतीय उद्योग को कितनी प्रभावी बाजार पहुंच मिलती है, निर्यात में कितना इजाफा होता है और घरेलू कारोबारियों के हितों की रक्षा किस तरह की जाती है। सरकार के सामने चुनौती केवल नए समझौते करने की नहीं, बल्कि उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और निर्यात के लिए ठोस लाभ में बदलने की भी है।




