भगवंत मान सरकार का फैसला, 385 नए पदों पर होगी नियुक्ति; अदालतों में 52,577 मामले लंबित, इनके निपटारे के लिए 75 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत
चंडीगढ़। पंजाब में नशा तस्करी और नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के खिलाफ कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाने के लिए राज्य सरकार ने न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में प्रदेशभर में 35 विशेष एनडीपीएस अदालतें स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। इन अदालतों का मुख्य उद्देश्य नशे से जुड़े मामलों का तेजी से निपटारा करना, अदालतों में वर्षों से लंबित मामलों का बोझ कम करना और आरोपियों के खिलाफ चल रही न्यायिक प्रक्रिया को गति देना है।
सरकार का मानना है कि नशे के खिलाफ अभियान को सफल बनाने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियां पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि मामलों की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया भी समयबद्ध तरीके से पूरी होनी चाहिए। बड़ी संख्या में मामले दर्ज होने के बावजूद अदालतों में सीमित संख्या में सुनवाई और निपटारे के कारण लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल ने पहले चरण में 35 विशेष अदालतें स्थापित करने का निर्णय लिया है।
मुख्यमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता ने बताया कि पंजाब लंबे समय से नशा तस्करी और नशीले पदार्थों के सेवन की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। राज्य में हर साल लगभग 20 हजार एनडीपीएस मामले दर्ज होते हैं और करीब 27 हजार गिरफ्तारियां की जाती हैं। इतनी बड़ी संख्या में मामले सामने आने के बावजूद न्यायिक स्तर पर उनका निपटारा अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा है। इसके कारण लंबित मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
हर साल 20 हजार मामले, निपटारा केवल 5700 का
मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, पंजाब में प्रतिवर्ष दर्ज होने वाले लगभग 20 हजार एनडीपीएस मामलों में से करीब 12 हजार मामलों की सुनवाई सत्र अदालतों द्वारा की जाती है। इसके मुकाबले हर साल लगभग 5700 मामलों का ही निपटारा हो पाता है। मामलों के दाखिल होने और उनके निपटारे के बीच इस अंतर के कारण अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती गई है।
प्रवक्ता ने बताया कि 31 अगस्त 2026 तक राज्य में एनडीपीएस से जुड़े लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 52,577 हो चुकी थी। यह स्थिति न्यायिक व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती बन गई है। बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित रहने से न केवल अदालतों पर काम का दबाव बढ़ता है, बल्कि जांच, गवाही और सुनवाई की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।
सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, एनडीपीएस मामलों के निपटारे में औसतन आठ वर्ष तक का समय लग जाता है। इतने लंबे समय तक मुकदमे चलने से न्याय मिलने में देरी होती है और अभियोजन पक्ष के लिए भी मामले को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है। विशेष अदालतें स्थापित होने से इस स्थिति में सुधार आने की उम्मीद जताई जा रही है।
पुराने मामलों के निपटारे के लिए उच्च न्यायालय ने जताई थी जरूरत
पंजाब में लंबित एनडीपीएस मामलों की समस्या को देखते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने आगामी पांच से सात वर्षों के दौरान पुराने मामलों का निपटारा करने के लिए अतिरिक्त विशेष अदालतों की आवश्यकता का आकलन किया था। इस आकलन में लंबित मुकदमों की संख्या और उनके निपटारे में लगने वाले समय को ध्यान में रखा गया।
इसी जरूरत के आधार पर राज्य मंत्रिमंडल ने पहले चरण में 35 विशेष एनडीपीएस अदालतें स्थापित करने को मंजूरी दी है। इन अदालतों को विशेष रूप से नशे से संबंधित मामलों की सुनवाई और निपटारे के लिए समर्पित किया जाएगा। इससे सामान्य अदालतों पर एनडीपीएस मामलों का दबाव कम करने और इन मुकदमों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
सरकार का उद्देश्य केवल नई अदालतें स्थापित करना नहीं है, बल्कि उनके माध्यम से लंबित मामलों के निपटारे की गति बढ़ाना भी है। विशेष अदालतों के जरिए सुनवाई की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकेगी और लंबे समय से लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का रास्ता तैयार होगा।
न्यायिक व्यवस्था के लिए 385 नए पद मंजूर
35 विशेष एनडीपीएस अदालतों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मंत्रिमंडल ने 385 नए पदों को भी मंजूरी दी है। इनमें 35 अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के पद शामिल हैं। इसके अलावा अदालतों के दैनिक कामकाज, दस्तावेजों के प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए 315 सहायक स्टाफ सदस्यों के पद स्वीकृत किए गए हैं।
इनके साथ ही अभियोजन पक्ष को मजबूत बनाने के लिए 35 सहायक जिला अटॉर्नी के पद भी मंजूर किए गए हैं। इस तरह प्रत्येक विशेष अदालत के लिए न्यायिक अधिकारी, सहायक कर्मचारियों और अभियोजन से जुड़े अधिकारियों की व्यवस्था की जाएगी।
इन नियुक्तियों का उद्देश्य अदालतों में मामलों की सुनवाई के लिए जरूरी मानव संसाधन उपलब्ध कराना है। बड़ी संख्या में मुकदमों का समय पर निपटारा करने के लिए न्यायिक अधिकारियों के साथ-साथ सहायक कर्मचारियों और अभियोजन पक्ष की पर्याप्त उपलब्धता भी जरूरी होती है। नए पदों की मंजूरी से विशेष अदालतों के कामकाज को व्यवस्थित बनाने में मदद मिलेगी।
75 करोड़ रुपये के बजट को भी हरी झंडी
मंत्रिमंडल ने 35 विशेष एनडीपीएस अदालतों की स्थापना और संचालन के लिए लगभग 75 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट को भी मंजूरी दी है। इस राशि में अदालतों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे पर होने वाला खर्च भी शामिल है।
नई अदालतों के गठन के लिए भवन, कार्यालय व्यवस्था, कर्मचारियों और अन्य जरूरी सुविधाओं की आवश्यकता होगी। सरकार की ओर से स्वीकृत बजट के माध्यम से इन व्यवस्थाओं को विकसित करने की योजना है। न्यायिक संस्थानों के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध होने से मामलों की सुनवाई को नियमित और प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सकेगा।
विशेष अदालतों के गठन के साथ ही न्यायिक अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों की नियुक्ति भी इस योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। सरकार का प्रयास है कि अदालतों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर उन्हें पूरी क्षमता से काम करने योग्य बनाया जाए।
नई अदालतें शुरू होने तक पुरानी व्यवस्था जारी रहेगी
मंत्रिमंडल के निर्णय के अनुसार, जब तक नई विशेष एनडीपीएस अदालतें पूरी तरह कार्यशील नहीं हो जातीं, तब तक पहले से मौजूद नामित अदालतें अपना कामकाज जारी रखेंगी। इससे नई व्यवस्था लागू होने के दौरान मामलों की सुनवाई प्रभावित नहीं होगी।
यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य में पहले से ही हजारों एनडीपीएस मामले लंबित हैं। यदि नई अदालतों की स्थापना और संचालन की प्रक्रिया के दौरान मौजूदा अदालतों का कामकाज प्रभावित होता है, तो लंबित मामलों की संख्या और बढ़ सकती है। इसलिए नई व्यवस्था पूरी तरह तैयार होने तक वर्तमान नामित अदालतों को सक्रिय रखने का निर्णय लिया गया है।
इसके बाद नई विशेष अदालतों के कार्यभार संभालने पर मामलों के वितरण और सुनवाई की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित किया जा सकेगा। इससे अदालतों में मुकदमों का दबाव बांटने और लंबे समय से लंबित मामलों को आगे बढ़ाने में सहायता मिलेगी।
सरकारी गवाहों के समय का भी होगा बेहतर प्रबंधन
सरकार के अनुसार, विशेष एनडीपीएस अदालतों की स्थापना से केवल मामलों के निपटारे में तेजी नहीं आएगी, बल्कि सुनवाई के दौरान होने वाली देरी को कम करने में भी मदद मिलेगी। इन अदालतों में नशे से जुड़े मामलों की सुनवाई पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इससे गवाहों की पेशी, दस्तावेजों की जांच और अभियोजन से संबंधित प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सकेगा।
एनडीपीएस मामलों में पुलिस अधिकारियों, जांच से जुड़े कर्मचारियों और अन्य सरकारी गवाहों को अदालत में पेश होना पड़ता है। अलग-अलग अदालतों में सुनवाई की तारीखें होने के कारण कई बार उनका समय और संसाधन प्रभावित होते हैं। समर्पित अदालतों के माध्यम से ऐसे मामलों की सुनवाई अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी। इससे सरकारी गवाहों के समय का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, लंबित मुकदमों की संख्या कम होने से न्यायिक अधिकारियों और अभियोजन पक्ष को भी मामलों पर अधिक प्रभावी ढंग से ध्यान देने का अवसर मिलेगा। सरकार को उम्मीद है कि इससे नशे से जुड़े अपराधों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रभाव मजबूत होगा।
नशे के खिलाफ अभियान को न्यायिक मजबूती देने की कोशिश
पंजाब सरकार की ओर से 35 विशेष एनडीपीएस अदालतें स्थापित करने का फैसला नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को न्यायिक स्तर पर मजबूती देने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। राज्य में नशा तस्करी से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां और मुकदमे दर्ज होने के बावजूद लंबित मामलों का बढ़ता आंकड़ा सरकार और न्यायिक व्यवस्था के सामने चुनौती बना हुआ है।
विशेष अदालतों के गठन से इस चुनौती से निपटने के लिए अतिरिक्त क्षमता तैयार होगी। सरकार का उद्देश्य है कि नशे से जुड़े मामलों में सुनवाई अनावश्यक रूप से लंबी न खिंचे और कानूनी प्रक्रिया निर्धारित समय में आगे बढ़े। इससे दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इन अदालतों की वास्तविक प्रभावशीलता उनके समय पर गठन, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति तथा पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं पर निर्भर करेगी। साथ ही लंबित मामलों के निपटारे के लिए सुनवाई की नियमितता और अभियोजन की तैयारी भी महत्वपूर्ण होगी।
कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की अध्यक्षता में लिया गया यह निर्णय पंजाब की न्यायिक व्यवस्था में नशे से जुड़े मामलों के लिए विशेष ढांचा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 35 अदालतों, 385 नए पदों और लगभग 75 करोड़ रुपये के बजट की मंजूरी से सरकार ने लंबित एनडीपीएस मामलों को कम करने की योजना को आगे बढ़ाया है। अब इन अदालतों की स्थापना और उनके पूरी तरह कार्यशील होने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आठ वर्ष तक चलने वाली औसत सुनवाई अवधि और 52,577 लंबित मामलों के बोझ को कम करने में यह पहल कितनी प्रभावी साबित होती है।




