किडनी हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में शामिल है। यह हर समय खून को फिल्टर करने, शरीर में जमा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने का काम करती है। इसके साथ ही शरीर में पानी और नमक की सही मात्रा बनाए रखने तथा ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी किडनी की अहम भूमिका होती है। ऐसे में अगर किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगे तो इसका असर शरीर के कई दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है। चिंता की बात यह है कि आजकल बदलती जीवनशैली, गलत खानपान, मोटापा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के कारण किडनी से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
किडनी की बीमारी को लेकर एक ऐसा पहलू भी है, जिस पर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते। यह है परिवार में पहले से मौजूद बीमारी का इतिहास। अगर आपके माता-पिता, भाई-बहन या परिवार के किसी करीबी सदस्य को किडनी की समस्या रही है तो आपको भी अपनी सेहत को लेकर सतर्क रहने की जरूरत हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि परिवार में किसी एक व्यक्ति को किडनी की बीमारी होने पर बाकी सभी सदस्यों को भी यह समस्या जरूर होगी। कुछ किडनी रोग सीधे तौर पर जीन से जुड़े होते हैं, जबकि कुछ बीमारियों में आनुवंशिक प्रवृत्ति और जीवनशैली दोनों मिलकर जोखिम बढ़ा सकते हैं।
क्या माता-पिता की किडनी की बीमारी बच्चों तक पहुंच सकती है?
इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि परिवार के सदस्य को किस तरह की किडनी की बीमारी हुई है। किडनी से जुड़ी सभी समस्याएं आनुवंशिक नहीं होतीं। उदाहरण के लिए, लंबे समय तक अनियंत्रित डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कुछ संक्रमण या दवाओं के गलत इस्तेमाल से भी किडनी खराब हो सकती है। ऐसी स्थिति में बीमारी सीधे माता-पिता से बच्चों में नहीं पहुंचती।
हालांकि कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जिनका संबंध हमारे जीन से होता है। इन स्थितियों में माता-पिता से बच्चों को ऐसे जीन मिल सकते हैं, जिनके कारण भविष्य में किडनी संबंधी परेशानी विकसित होने की आशंका रहती है। इसलिए परिवार में किडनी फेलियर, क्रॉनिक किडनी डिजीज या किसी आनुवंशिक किडनी विकार का इतिहास होने पर डॉक्टर को इसकी जानकारी देना जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, परिवार में किसी को किडनी की बीमारी होने का मतलब केवल एक व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री नहीं है, बल्कि यह दूसरे सदस्यों के लिए भी स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी हो सकती है। समय रहते जांच कराने से बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचाना जा सकता है और जरूरी सावधानियां अपनाई जा सकती हैं।
पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज क्यों है चिंता का विषय?
आनुवंशिक किडनी रोगों में पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज यानी PKD एक प्रमुख उदाहरण है। इस बीमारी में किडनी के अंदर तरल पदार्थ से भरी छोटी-बड़ी कई गांठें या सिस्ट बनने लगती हैं। समय के साथ इनकी संख्या और आकार बढ़ सकता है। इसके कारण किडनी का सामान्य आकार प्रभावित हो सकता है और धीरे-धीरे उसकी काम करने की क्षमता कम होने लगती है।
इस बीमारी के कुछ प्रकार परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकते हैं। खासकर ऑटोसोमल डॉमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज में अगर माता या पिता में बीमारी पैदा करने वाला जीन मौजूद है, तो प्रत्येक बच्चे में उस जीन के मिलने की संभावना 50 प्रतिशत होती है। हालांकि जीन मिलने और बीमारी की गंभीरता एक जैसी होना जरूरी नहीं है।
शुरुआती समय में कई लोगों को इसके लक्षण महसूस नहीं होते। कुछ मामलों में पेट या कमर के आसपास दर्द, पेशाब में खून, हाई ब्लड प्रेशर और बार-बार यूरिन इंफेक्शन जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं। इसलिए परिवार में इस बीमारी का इतिहास होने पर डॉक्टर की सलाह से उचित जांच कराना फायदेमंद रहता है।
केवल जीन ही नहीं, इन बीमारियों से भी बढ़ सकता है खतरा
किडनी की सेहत पर परिवार से मिलने वाले जीन के अलावा कई दूसरे कारकों का भी प्रभाव पड़ता है। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर इसके दो बड़े उदाहरण हैं। इन बीमारियों में पारिवारिक प्रवृत्ति हो सकती है। अगर माता-पिता या भाई-बहन को इनमें से कोई समस्या है तो दूसरे सदस्यों में भी इनके विकसित होने की आशंका बढ़ सकती है।
लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर अधिक रहने से किडनी की बारीक रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसी तरह अनियंत्रित ब्लड प्रेशर किडनी के फिल्टर करने वाले हिस्सों पर दबाव डालता है। लगातार ऐसा होने पर किडनी की कार्यक्षमता कमजोर पड़ सकती है।
इसके अलावा मोटापा, शारीरिक गतिविधियों की कमी, ज्यादा नमक खाना, धूम्रपान और बिना जरूरत दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल भी किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले कारणों में शामिल हैं। इसलिए परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास होने पर केवल आनुवंशिक कारणों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। अपनी रोजमर्रा की आदतों को सुधारना भी उतना ही जरूरी है।
बिना लक्षणों के भी खराब हो सकती है किडनी
किडनी की बीमारियों को खतरनाक बनाने वाली एक बड़ी वजह यह है कि शुरुआती चरण में अक्सर इनके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोगों को तब तक किसी परेशानी का एहसास नहीं होता, जब तक किडनी की कार्यक्षमता काफी हद तक प्रभावित नहीं हो जाती।
शुरुआती दौर में कुछ लोगों को थकान, भूख कम लगना, पैरों या चेहरे पर सूजन, पेशाब में बदलाव और रात में बार-बार पेशाब आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन ये लक्षण केवल किडनी की बीमारी के कारण ही हों, ऐसा जरूरी नहीं है। इनकी सही वजह जानने के लिए मेडिकल जांच जरूरी होती है।
यही कारण है कि जिन लोगों के परिवार में किडनी रोगों का इतिहास रहा है, उन्हें केवल लक्षणों का इंतजार नहीं करना चाहिए। डॉक्टर उनकी उम्र, पारिवारिक इतिहास, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और अन्य जोखिमों के आधार पर जांच की सलाह दे सकते हैं।
इन तीन जांचों से मिल सकती है किडनी की सेहत की जानकारी
अगर परिवार में किसी सदस्य को किडनी की गंभीर बीमारी रही है तो डॉक्टर से मिलकर कुछ सामान्य जांचों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। इनसे किडनी की कार्यक्षमता और शुरुआती नुकसान के संकेतों का पता लगाने में मदद मिलती है।
1. सीरम क्रिएटिनिन और ईजीएफआर टेस्ट
इस जांच में खून में क्रिएटिनिन का स्तर मापा जाता है। क्रिएटिनिन शरीर की मांसपेशियों की सामान्य गतिविधियों से बनने वाला अपशिष्ट पदार्थ है, जिसे स्वस्थ किडनी खून से फिल्टर करके बाहर निकालती है। इसके आधार पर ईजीएफआर यानी अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट निकाला जाता है।
ईजीएफआर से पता चलता है कि किडनी खून को फिल्टर करने का काम कितनी प्रभावी तरीके से कर रही है। इसका स्तर कम होना किडनी की कार्यक्षमता में कमी का संकेत हो सकता है। हालांकि एक ही रिपोर्ट के आधार पर बीमारी की पुष्टि नहीं की जाती। डॉक्टर जरूरत पड़ने पर दोबारा जांच और दूसरी रिपोर्टों से स्थिति का आकलन करते हैं।
2. यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो (UACR)
किडनी की शुरुआती खराबी का पता लगाने में यह टेस्ट भी महत्वपूर्ण है। सामान्य स्थिति में किडनी खून को साफ करते समय जरूरी प्रोटीन को शरीर में बनाए रखती है। लेकिन जब इसके फिल्टर प्रभावित होने लगते हैं तो एल्ब्यूमिन नाम का प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर निकल सकता है।
UACR टेस्ट से पेशाब में एल्ब्यूमिन और क्रिएटिनिन के अनुपात की जानकारी मिलती है। पेशाब में एल्ब्यूमिन की मात्रा बढ़ना किडनी को नुकसान पहुंचने का शुरुआती संकेत हो सकता है। कई बार ईजीएफआर सामान्य होने के बावजूद UACR में गड़बड़ी मिल सकती है। इसलिए दोनों जांचों का अपना अलग महत्व है।
3. यूरिन रूटीन और माइक्रोस्कोपी टेस्ट
यह एक सामान्य पेशाब जांच है, जिसके जरिए यूरिन में प्रोटीन, खून, सफेद रक्त कोशिकाओं और संक्रमण से जुड़े संकेतों का पता लगाया जा सकता है। अगर पेशाब में लगातार प्रोटीन या खून पाया जाता है तो डॉक्टर आगे की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। हालांकि केवल इस टेस्ट से हर प्रकार की किडनी बीमारी का पता नहीं लगाया जा सकता।
कुछ आनुवंशिक बीमारियों, विशेषकर पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज के संदेह में डॉक्टर अल्ट्रासाउंड या अन्य इमेजिंग जांच भी करा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर परिवार के अन्य सदस्यों की जांच और जेनेटिक काउंसलिंग की सलाह भी दी जा सकती है।
परिवार में किडनी रोग होने पर इन आदतों को अपनाएं
आनुवंशिक जोखिम को हमेशा पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं होता, लेकिन सही समय पर सावधानी बरतकर किडनी को होने वाले नुकसान की आशंका कम की जा सकती है। इसके लिए कुछ जरूरी बातों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए।
नमक का सेवन सीमित रखें: खाने में जरूरत से ज्यादा नमक लेने से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से किडनी पर बुरा असर पड़ता है। चिप्स, नमकीन, पैकेट वाले स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स और अधिक नमक वाले प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें।
पानी पर्याप्त मात्रा में पिएं: शरीर को हाइड्रेट रखना जरूरी है। हालांकि हर व्यक्ति की पानी की जरूरत अलग होती है। मौसम, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार इसकी मात्रा बदल सकती है। जिन लोगों की किडनी पहले से कमजोर है, उन्हें पानी की मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही रखनी चाहिए।
वजन को नियंत्रित रखें: बढ़ता हुआ वजन डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ा सकता है। इसलिए नियमित रूप से पैदल चलना, योग करना और दूसरी शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा लेना फायदेमंद है।
पेनकिलर का इस्तेमाल सोच-समझकर करें: दर्द होने पर बार-बार बिना डॉक्टर की सलाह के दवाएं लेना नुकसानदायक हो सकता है। विशेष रूप से कुछ नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं (NSAIDs) लंबे समय तक या गलत तरीके से लेने पर किडनी को प्रभावित कर सकती हैं।
डायबिटीज और ब्लड प्रेशर पर रखें नजर: अगर परिवार में इन बीमारियों का इतिहास है तो समय-समय पर ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर की जांच कराएं। समस्या सामने आने पर उसका सही इलाज और नियंत्रण जरूरी है।
धूम्रपान से बनाएं दूरी: स्मोकिंग से रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है और किडनी की सेहत भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए इससे दूरी बनाकर रखना बेहतर है।
कब डॉक्टर से मिलना जरूरी है?
अगर आपके माता-पिता, भाई-बहन या परिवार के किसी करीबी सदस्य को कम उम्र में किडनी फेलियर हुआ है, पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज पाई गई है या किसी अन्य आनुवंशिक किडनी विकार का पता चला है तो डॉक्टर से अपनी जांच और जोखिम के बारे में चर्चा जरूर करें। पेशाब में खून या लगातार झाग आना, पैरों और चेहरे पर सूजन, ब्लड प्रेशर बढ़ना या पेशाब की आदतों में असामान्य बदलाव होने पर भी चिकित्सकीय सलाह लें।
ध्यान रखें कि परिवार में किडनी की बीमारी होना भविष्य में आपके बीमार होने की गारंटी नहीं है। इसी तरह परिवार में किसी को बीमारी न होने का मतलब यह भी नहीं कि आपको किडनी रोग नहीं हो सकता। सही जानकारी, समय पर जांच, स्वस्थ जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह से किडनी को लंबे समय तक स्वस्थ रखने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी जांच, दवा या उपचार का निर्णय अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर की सलाह लेकर ही करें।




