राजस्थान को बिजली बेचकर हिमाचल भरेगा खजाना, इस साल 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है कमाई

राजस्थान को बिजली बेचकर हिमाचल भरेगा खजाना, इस साल 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है कमाई

फरवरी 2027 तक 1300 मेगावाट बिजली की आपूर्ति का करार, 15.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से मिलेगा मूल्य; पिछले वर्षों के मुकाबले दोगुना हो सकता है राजस्व

शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार को इस बार बिजली की बिक्री से पहले के मुकाबले कहीं अधिक राजस्व मिलने की उम्मीद है। प्रदेश ने राजस्थान के साथ बिजली आपूर्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण करार किया है। इसके तहत राजस्थान फरवरी 2027 तक हिमाचल प्रदेश से अधिकतम 1300 मेगावाट बिजली खरीदेगा। इस बिजली की दर 15.50 रुपये प्रति यूनिट तय की गई है। बेहतर कीमत पर बिजली बेचने का अवसर मिलने से प्रदेश सरकार के राजस्व में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने की संभावना है।

राज्य सरकार को उम्मीद है कि बिजली बिक्री से इस वित्त वर्ष में होने वाली कमाई करीब 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। यदि यह अनुमान पूरा होता है तो पिछले वर्षों की तुलना में प्रदेश की आय लगभग दोगुनी हो जाएगी। हिमाचल प्रदेश लंबे समय से अपनी जलविद्युत क्षमता के दम पर दूसरे राज्यों को बिजली बेचकर राजस्व अर्जित करता रहा है। हालांकि, इस बार राजस्थान के साथ हुए समझौते और बेहतर दर मिलने से बिजली कारोबार प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए अधिक लाभकारी साबित हो सकता है।

प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं से बड़ी मात्रा में बिजली का उत्पादन होता है। गर्मियों और बरसात के मौसम में नदियों तथा जलाशयों में पानी की उपलब्धता बढ़ने के कारण उत्पादन भी अधिक रहता है। ऐसे में अतिरिक्त बिजली को दूसरे राज्यों को बेचकर सरकार आमदनी बढ़ाने का प्रयास करती है। राजस्थान के साथ हुआ समझौता इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

15.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से होगा बिजली का कारोबार

राजस्थान के साथ हुए करार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बिजली की बिक्री के लिए तय की गई दर है। इसके तहत 15.50 रुपये प्रति यूनिट की कीमत निर्धारित की गई है। इस दर पर अधिकतम 1300 मेगावाट तक बिजली की आपूर्ति फरवरी 2027 तक की जानी है।

बिजली की कीमत बेहतर मिलने से हिमाचल को अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का आर्थिक लाभ उठाने का अवसर मिलेगा। पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश बिजली बेचकर सालाना लगभग 1000 से 1500 करोड़ रुपये तक की आय अर्जित करता रहा है। इस बार सरकार को उम्मीद है कि यह कमाई बढ़कर करीब 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

बिजली बिक्री से होने वाली आय में संभावित वृद्धि राज्य के वित्तीय संसाधनों को मजबूत करने में मददगार हो सकती है। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए जलविद्युत क्षेत्र राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है। प्रदेश में कई बड़ी और छोटी जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हैं, जिनसे उत्पादित बिजली की बिक्री के माध्यम से सरकार और बिजली क्षेत्र से जुड़े संस्थानों को आर्थिक लाभ मिलता है।

हालांकि, वास्तविक कमाई बिजली की उपलब्धता, आपूर्ति की मात्रा, तय दर और अनुबंध की शर्तों के अनुसार निर्धारित होगी।

राजस्व बढ़ाने के लिए दूसरे राज्यों से भी संपर्क

राज्य सरकार और ऊर्जा विभाग बिजली कारोबार के माध्यम से आय बढ़ाने के लिए अन्य राज्यों के साथ भी संभावनाएं तलाश रहे हैं। प्रदेश में उपलब्ध अतिरिक्त बिजली को बेहतर कीमत पर बेचने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार की कोशिश है कि बिजली उत्पादन अधिक होने के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त ऊर्जा का अधिकतम आर्थिक लाभ लिया जा सके।

हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां जलविद्युत उत्पादन के लिहाज से अनुकूल हैं। यहां नदियों और जलधाराओं के माध्यम से बिजली उत्पादन की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। गर्मियों और बरसात के दौरान पानी की उपलब्धता बढ़ने से कई परियोजनाओं में उत्पादन बेहतर रहता है। इसके विपरीत सर्दियों में नदियों का जलस्तर कम होने के कारण बिजली उत्पादन में गिरावट आ जाती है।

इसी मौसमी अंतर को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा विभाग को बिजली की उपलब्धता और बिक्री के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। अधिक उत्पादन के समय बिजली बेचकर राजस्व अर्जित करना और कम उत्पादन के समय घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध करवाना विभाग के सामने दोहरी चुनौती रहती है।

सर्दियों में बढ़ सकती है बिजली बोर्ड की परेशानी

राजस्थान को बिजली बेचने से जहां प्रदेश की आय बढ़ने की उम्मीद है, वहीं सर्दियों में राज्य की अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करना बिजली बोर्ड के लिए चुनौती बन सकता है। हिमाचल में ठंड के मौसम के दौरान बिजली की मांग बढ़ जाती है। घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में हीटिंग उपकरणों के इस्तेमाल के कारण खपत में भी वृद्धि होती है।

दूसरी तरफ, सर्दियों में जलविद्युत परियोजनाओं का उत्पादन कम हो जाता है। ऐसे में बिजली की उपलब्धता और मांग के बीच अंतर पैदा होने की आशंका रहती है। यदि प्रदेश के पास पर्याप्त अतिरिक्त बिजली उपलब्ध नहीं होती है तो राज्य बिजली बोर्ड को दूसरे राज्यों से बिजली खरीदनी पड़ सकती है।

इस बार बिजली बोर्ड के सामने यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहले प्रदेश में गर्मियों और बरसात के दौरान अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होने पर बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से सर्दियों के लिए बिजली का प्रबंध किया जाता था। इस व्यवस्था के तहत अतिरिक्त बिजली दूसरे राज्यों को देकर जरूरत के समय उसके बदले बिजली प्राप्त की जाती थी।

अब बिजली आपूर्ति और उपलब्धता की नई परिस्थितियों में बोर्ड को सर्दियों की जरूरतें पूरी करने के लिए बाजार से बिजली खरीदने पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।

बैंकिंग व्यवस्था की जगह खरीद पर निर्भरता

हिमाचल प्रदेश में बिजली उत्पादन का स्वरूप मौसम के अनुसार बदलता रहता है। गर्मियों और बरसात में नदियों में पानी अधिक होने से उत्पादन बढ़ जाता है, जबकि सर्दियों में पानी का प्रवाह कम होने के कारण उत्पादन घट जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए पहले बिजली बैंकिंग व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।

बैंकिंग व्यवस्था में प्रदेश अतिरिक्त बिजली दूसरे राज्यों को उपलब्ध करवाता था और बाद में जरूरत पड़ने पर उतनी बिजली वापस प्राप्त करता था। इससे बिजली बोर्ड को सर्दियों में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलती थी।

लेकिन इस बार उपलब्ध बिजली के बेहतर मूल्य पर बिक्री और आपूर्ति संबंधी बदलती परिस्थितियों के कारण बोर्ड को सर्दियों में अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बिजली खरीदने की व्यवस्था करनी पड़ सकती है। इसके लिए दो-तीन अन्य राज्यों से बिजली खरीदने के विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। इसके अलावा प्रदेश सरकार से उपलब्ध बिजली खरीदकर भी आपूर्ति व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत पड़ सकती है।

इसका अर्थ है कि सरकार के लिए बिजली बेचकर अधिक राजस्व अर्जित करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी बिजली बोर्ड के लिए सर्दियों में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना भी होगा।

कमाई और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन जरूरी

राजस्थान के साथ हुआ बिजली आपूर्ति समझौता हिमाचल प्रदेश के लिए बेहतर आर्थिक अवसर लेकर आया है। 15.50 रुपये प्रति यूनिट की दर और 1300 मेगावाट तक आपूर्ति की संभावना से प्रदेश की आय में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि राज्य अपनी घरेलू जरूरतों और दूसरे राज्यों को की जाने वाली आपूर्ति के बीच किस तरह तालमेल बनाता है।

ऊर्जा विभाग और बिजली बोर्ड के सामने उत्पादन, मांग, उपलब्धता तथा बाजार से खरीद की लागत का आकलन करना महत्वपूर्ण रहेगा। यदि सर्दियों में मांग के अनुरूप बिजली उपलब्ध नहीं होती है तो बाहर से खरीद करनी पड़ सकती है, जिससे बोर्ड पर वित्तीय दबाव भी बढ़ सकता है।

फिलहाल सरकार को उम्मीद है कि राजस्थान के साथ हुआ समझौता बिजली बिक्री से होने वाली कमाई को नई ऊंचाई तक पहुंचाएगा। इस बार करीब 3000 करोड़ रुपये का संभावित राजस्व प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकता है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि बिजली की बिक्री से होने वाली वास्तविक आय कितनी रहती है और सर्दियों में प्रदेश की घरेलू बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली बोर्ड क्या व्यवस्था करता है।