जमीन के बदले मिलेगा 50 प्रतिशत विकसित हिस्सा, चार साल तक प्रति एकड़ एक लाख रुपये सालाना सहायता; तय समय में प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ तो किसानों को लौटाई जाएगी जमीन
चंडीगढ़। हरियाणा में विकास परियोजनाओं के लिए जमीन देने वाले किसानों को अब केवल मुआवजे तक सीमित नहीं रहना पड़ेगा, बल्कि वे संबंधित परियोजनाओं के विकास में भी भागीदार बन सकेंगे। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में बहुप्रतीक्षित लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दे दी गई है। इस नीति के माध्यम से राज्य सरकार ने किसानों को जमीन के बदले बेहतर आर्थिक लाभ देने और उन्हें शहरीकरण तथा औद्योगिक विकास की प्रक्रिया में साझेदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
नई नीति के तहत सरकार विकास परियोजनाओं के लिए किसानों की जमीन पारंपरिक अधिग्रहण व्यवस्था के बजाय स्वैच्छिक भागीदारी के आधार पर प्राप्त करेगी। इसमें आवासीय, औद्योगिक और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन देने वाले किसानों को कई तरह के वित्तीय और संपत्ति संबंधी लाभ मिलेंगे। सरकार का उद्देश्य किसानों को उनकी जमीन का बेहतर मूल्य दिलाने के साथ-साथ विकास परियोजनाओं से भविष्य में होने वाले आर्थिक लाभों में भी हिस्सेदार बनाना है।
इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जमीन देने वाले किसानों को प्रति एकड़ एक लाख रुपये की वार्षिक अंतरिम वित्तीय सहायता मिलेगी। इसके अलावा, उन्हें अपनी दी गई जमीन का 50 प्रतिशत विकसित और बिक्री योग्य हिस्सा वापस दिया जाएगा। सरकार ने परियोजनाओं को पूरा करने के लिए चार साल की समय-सीमा भी निर्धारित की है। यदि निर्धारित अवधि में विकास कार्य पूरा नहीं होता है तो संबंधित किसानों को उनकी जमीन वापस लौटाने का प्रावधान किया गया है।
चार साल तक हर एकड़ पर मिलेंगे एक लाख रुपये सालाना
लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 के तहत किसानों को जमीन सौंपने के बाद आर्थिक सुरक्षा देने के लिए वार्षिक अंतरिम वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार, जो किसान स्वेच्छा से अपनी जमीन विकास परियोजनाओं के लिए संबंधित एजेंसी को देंगे, उन्हें सेल डीड की तारीख से प्रति एकड़ एक लाख रुपये प्रतिवर्ष की दर से सहायता मिलेगी।
यह राशि परियोजना पूरी होने तक अधिकतम चार साल तक दी जाएगी। इससे किसानों को जमीन सौंपने के बाद होने वाली संभावित आर्थिक परेशानी से राहत मिलेगी। खास बात यह है कि किसानों को परियोजना के पूरा होने और विकसित प्लॉट मिलने तक नियमित वित्तीय सहायता का लाभ मिलता रहेगा।
सरकार ने भुगतान में देरी रोकने के लिए भी व्यवस्था की है। नीति के अनुसार, यदि सेल डीड होने के 15 दिनों के भीतर संबंधित राशि किसान के बैंक खाते में जमा नहीं होती है तो सरकार को देरी की अवधि के लिए 9 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी देना होगा।
इस प्रावधान का उद्देश्य किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही तय करना है। इससे जमीन देने वाले किसानों को भुगतान के लिए लंबे समय तक इंतजार करने की स्थिति से बचाने में मदद मिलेगी।
जमीन का 50 प्रतिशत हिस्सा विकसित करके मिलेगा वापस
नई नीति में किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण लाभ विकसित जमीन के रूप में हिस्सेदारी का है। इसके तहत किसान जितनी जमीन विकास एजेंसी को सौंपेंगे, उसका 50 प्रतिशत हिस्सा उन्हें विकसित और बिक्री योग्य भूखंडों के रूप में वापस दिया जाएगा।
इसमें संबंधित भू-मालिक की पात्रता और परियोजना की प्रकृति के अनुसार आवासीय, व्यावसायिक अथवा औद्योगिक प्लॉट शामिल हो सकते हैं। यानी किसान केवल एकमुश्त आर्थिक भुगतान लेने के बजाय विकसित क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बनाए रख सकेंगे।
सरकार की इस व्यवस्था से किसानों को भविष्य में जमीन की बढ़ती कीमतों का लाभ मिलने की संभावना रहेगी। यदि किसी क्षेत्र में आवासीय या व्यावसायिक परियोजना विकसित होने के बाद संपत्तियों का मूल्य बढ़ता है तो किसान अपने हिस्से में मिले प्लॉट का इस्तेमाल कर सकते हैं या निर्धारित नियमों के अनुसार उन्हें बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
नीति में छोटे भू-मालिकों के हितों को भी ध्यान में रखा गया है। ऐसे किसानों के लिए न्यूनतम प्लॉट आकार निर्धारित करने का प्रावधान किया गया है। उदाहरण के तौर पर आवासीय भूखंड के लिए 100 वर्ग मीटर का न्यूनतम आकार रखा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम जमीन रखने वाले किसानों को भी नीति का लाभ मिल सके और विकसित हिस्से के आवंटन में उनके हितों की अनदेखी न हो।
चार साल में विकास कार्य पूरा करना होगा अनिवार्य
सरकार ने किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए विकास एजेंसियों पर समय-सीमा से संबंधित जिम्मेदारी भी तय की है। नई नीति के अनुसार, जिस एजेंसी को किसानों की जमीन विकास कार्यों के लिए दी जाएगी, उसे संबंधित परियोजना चार साल के भीतर पूरी करनी होगी।
यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई बार विकास परियोजनाओं के नाम पर जमीन लेने के बाद लंबे समय तक निर्माण और आधारभूत सुविधाओं का विकास पूरा नहीं हो पाता। इससे जमीन मालिकों को आर्थिक नुकसान और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।
लैंड पूलिंग पॉलिसी में इस समस्या को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट व्यवस्था की गई है कि यदि विकास एजेंसी निर्धारित चार साल की अवधि में परियोजना पूरी करने में विफल रहती है तो किसानों को उनकी जमीन वापस लौटा दी जाएगी।
इससे विकास एजेंसियों पर समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने का दबाव रहेगा। साथ ही किसानों को यह भरोसा मिलेगा कि उनकी जमीन अनिश्चितकाल तक परियोजनाओं में फंसी नहीं रहेगी।
प्लॉट वापस बेचने का विकल्प अब तीन साल तक
नई नीति में किसानों को विकसित प्लॉट मिलने के बाद अपनी जरूरत के अनुसार आर्थिक फैसला लेने की भी सुविधा दी गई है। इसके तहत प्लॉट के बायबैक विकल्प की अवधि एक साल से बढ़ाकर तीन साल कर दी गई है।
इसका मतलब है कि किसान चाहें तो विकसित प्लॉट अपने पास रख सकते हैं और भविष्य में उसकी कीमत बढ़ने का लाभ उठा सकते हैं। वहीं, यदि उन्हें तत्काल पैसों की जरूरत है तो वे निर्धारित शर्तों के अनुसार तीन साल के भीतर अपने प्लॉट संबंधित एजेंसी को वापस बेचकर नकद राशि प्राप्त कर सकेंगे।
इस सुविधा से किसानों को अपनी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलेगी। जिन किसानों को खेती, कारोबार, बच्चों की शिक्षा या अन्य जरूरतों के लिए नकदी की आवश्यकता होगी, उनके लिए बायबैक विकल्प उपयोगी साबित हो सकता है।
जबरन अधिग्रहण के बजाय विकास में भागीदारी पर जोर
हरियाणा में शहरी विस्तार, औद्योगिक विकास और आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए लगातार जमीन की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे में सरकार के सामने किसानों के हितों की रक्षा करते हुए विकास परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराने की चुनौती रहती है।
पारंपरिक भूमि अधिग्रहण व्यवस्था में किसानों को जमीन के बदले निर्धारित मुआवजा दिया जाता है, लेकिन परियोजना विकसित होने के बाद जमीन के मूल्य में होने वाली वृद्धि का लाभ सामान्य तौर पर उन्हें सीधे नहीं मिलता। लैंड पूलिंग व्यवस्था इस स्थिति को बदलने का प्रयास करती है।
इसमें किसान स्वेच्छा से अपनी जमीन विकास एजेंसी को देते हैं और बदले में उन्हें विकसित भूमि का एक निश्चित हिस्सा वापस मिलता है। इस तरह किसान केवल जमीन देने वाले व्यक्ति नहीं रहते, बल्कि विकसित क्षेत्र में संपत्ति के मालिक भी बने रहते हैं।
सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से किसानों और विकास एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सकता है। साथ ही आवासीय कॉलोनियों, औद्योगिक क्षेत्रों और व्यावसायिक केंद्रों के विकास के लिए जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है।
किसानों की आय और राज्य के विकास को मिलेगा नया आधार
लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी मिलने के बाद अब इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रहेगी। नीति के तहत किसानों को मिलने वाली वार्षिक सहायता, विकसित जमीन में हिस्सेदारी, न्यूनतम प्लॉट आकार और बायबैक की सुविधा इसके प्रमुख आकर्षण हैं।
हालांकि, नीति का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि किसानों को सभी सुविधाएं समय पर मिलें और विकास एजेंसियां निर्धारित शर्तों का पालन करें। विशेष रूप से चार साल की समय-सीमा और भुगतान में देरी पर ब्याज के प्रावधान को प्रभावी ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण होगा।
कुल मिलाकर, हरियाणा सरकार की इस नई नीति से किसानों को विकास परियोजनाओं में भागीदारी का अवसर मिलने की उम्मीद है। सरकार इसे जमीन के बेहतर उपयोग, किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और प्रदेश में औद्योगिक तथा शहरी विकास को गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रही है। अब देखना होगा कि नई व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है और कितने किसान स्वेच्छा से इस नीति का हिस्सा बनते हैं।




