भारत में परिवार में बच्चों की संख्या को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। एक समय था जब तेजी से बढ़ती आबादी को देश के सामने बड़ी चुनौती माना जाता था। इसी चिंता के चलते कुछ राज्यों ने ऐसे नियम बनाए, जिनके तहत दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को सरकारी नौकरी, स्थानीय निकाय चुनाव और कुछ सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है। हालांकि, बदलते जनसांख्यिकीय हालात के बीच अब इन नियमों की जरूरत पर ही सवाल उठने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इस मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है।
दरअसल, देश की सर्वोच्च अदालत ने दो से अधिक संतान वाले लोगों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रावधानों की प्रासंगिकता पर विचार करने की जरूरत बताई है। अदालत का मानना है कि भारत में प्रजनन दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। ऐसे में दशकों पहले जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से बनाए गए प्रतिबंधों को आज के हालात के हिसाब से परखना जरूरी हो गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मतलब यह नहीं है कि देशभर में दो बच्चों से जुड़े सभी नियम समाप्त हो गए हैं। अलग-अलग राज्यों में इनकी स्थिति अब भी अलग है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाया दो बच्चों वाले कानून पर सवाल?
यह मामला महाराष्ट्र की एक पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा हुआ है। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो से ज्यादा बच्चों के आधार पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने के नियम पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। मंगला भीमराव महाराष्ट्र के काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच थीं। उन्हें तीसरी संतान के जन्म के कारण पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
उनके खिलाफ महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत कार्रवाई की गई थी। इस प्रावधान के मुताबिक निर्धारित सीमा से अधिक बच्चे होने पर व्यक्ति स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकता है। इसी नियम के आधार पर उनकी अयोग्यता का आदेश जारी किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान उनकी अयोग्यता से संबंधित आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने 2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए गए अपने पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता जताई और इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर लोगों को दंडित करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब पहले जैसी नहीं रह गई है। उनके मुताबिक, इन नियमों के पीछे जो मुख्य आधार था, यानी तेजी से बढ़ती आबादी का डर, वह पिछले कुछ दशकों में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण कमजोर पड़ा है।
क्या है टू चाइल्ड पॉलिसी और इसे क्यों बनाया गया था?
टू चाइल्ड पॉलिसी का सामान्य अर्थ है कि परिवार में बच्चों की संख्या दो तक सीमित रखने को प्रोत्साहित करना। इस तरह की नीति को मुख्य रूप से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने और परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपनाया गया था।
दुनिया के कई देशों में जब जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी, तब सरकारों ने इस दिशा में अलग-अलग उपाय किए। इनमें लोगों को छोटे परिवार के फायदे बताने से लेकर बच्चों की संख्या के आधार पर सरकारी सुविधाओं और अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने तक के कदम शामिल थे।
चीन इसका बड़ा उदाहरण रहा है। वहां लंबे समय तक एक बच्चे की नीति लागू रही। बाद में जनसंख्या और उम्र संबंधी बदलती परिस्थितियों को देखते हुए इस नीति में बदलाव किए गए। भारत में भी जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कई दशकों से चर्चा होती रही है, लेकिन यहां केंद्र सरकार ने देशभर में दो बच्चों की अनिवार्य सीमा लागू नहीं की है।
भारत में टू चाइल्ड पॉलिसी को लेकर राज्यों ने अपने स्तर पर अलग-अलग नियम बनाए। कुछ जगहों पर सरकारी नौकरी पाने के लिए दो बच्चों की शर्त रखी गई, तो कहीं पंचायत और नगर निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए यह सीमा निर्धारित की गई। कुछ राज्यों में सरकारी योजनाओं और सुविधाओं से जुड़े प्रावधान भी इस नीति के तहत बनाए गए।
क्या पूरे भारत में लागू है दो बच्चों का नियम?
इस सवाल का जवाब है- नहीं। भारत में ऐसा कोई एक केंद्रीय कानून नहीं है, जिसके तहत दो से ज्यादा बच्चे होने पर हर नागरिक के अधिकार अपने आप समाप्त हो जाते हों। देश में परिवार के बच्चों की संख्या को लेकर कोई समान राष्ट्रीय प्रतिबंध लागू नहीं है।
हालांकि, कुछ राज्यों ने अपने कानूनों और सरकारी आदेशों के माध्यम से इस तरह की शर्तें लागू की हैं। इनका दायरा भी हर जगह एक जैसा नहीं है। कहीं यह नियम पंचायत चुनाव लड़ने तक सीमित है, तो कहीं सरकारी सेवा में नियुक्ति के लिए भी बच्चों की संख्या को पात्रता से जोड़ा गया है।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि दो से अधिक बच्चे होने का मतलब पूरे देश में सरकारी नौकरी, मतदान या दूसरी नागरिक सुविधाओं से वंचित होना नहीं है। किसी व्यक्ति पर कौन-सा नियम लागू होगा, यह उसके राज्य और संबंधित कानून पर निर्भर करता है।
असम में सरकारी नौकरी के लिए क्या है प्रावधान?
असम उन राज्यों में शामिल है, जहां दो बच्चों की नीति को लेकर सरकारी स्तर पर महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी लंबे समय से छोटी परिवार व्यवस्था के समर्थक रहे हैं।
साल 2021 में राज्य में लागू किए गए नियमों के तहत दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना गया। इस व्यवस्था का उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण और छोटे परिवार को प्रोत्साहित करना बताया गया था।
इस तरह असम में बच्चों की संख्या केवल व्यक्तिगत और पारिवारिक निर्णय तक सीमित नहीं रही, बल्कि कुछ सरकारी सेवाओं में पात्रता का आधार भी बनी। हालांकि, ऐसे नियमों की व्यावहारिक स्थिति और उनका दायरा संबंधित सरकारी प्रावधानों के अनुसार समझना जरूरी है।
महाराष्ट्र में चुनाव और सरकारी सेवा से जुड़े नियम
महाराष्ट्र में दो बच्चों से संबंधित प्रावधान स्थानीय निकाय चुनावों के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण रहे हैं। महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के तहत निर्धारित सीमा से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जा सकता है।
मंगला भीमराव का मामला भी इसी कानून से जुड़ा था। तीसरी संतान होने के आधार पर उनकी अयोग्यता का फैसला किया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रद्द कर दिया।
इसके अलावा महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों से जुड़े कुछ प्रावधान भी चर्चा में रहे हैं। साल 2001 के सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, दो से अधिक बच्चों वाले कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार के किसी सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति देने पर प्रतिबंध से संबंधित नियम बनाए गए थे।
इसका अर्थ है कि बच्चों की संख्या का असर कुछ परिस्थितियों में सरकारी सेवा से जुड़े लाभों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, इन प्रावधानों को संबंधित सरकारी आदेश और लागू शर्तों के अनुसार ही समझा जाना चाहिए।
राजस्थान में भी चुनाव लड़ने पर लग सकती है रोक
राजस्थान में भी दो से अधिक बच्चों वाले लोगों के लिए कुछ कड़े नियम लागू किए गए थे। राज्य के पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत निर्धारित सीमा से अधिक संतान वाले व्यक्ति को ग्राम पंचायत या वार्ड सदस्य जैसे स्थानीय निकाय पदों के चुनाव के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
इसके अलावा सरकारी नौकरी की पात्रता को लेकर भी राज्य में दो बच्चों से जुड़े प्रतिबंधों का प्रावधान रहा है।
इन नियमों का उद्देश्य जनप्रतिनिधियों और सरकारी सेवा में आने वाले लोगों के माध्यम से छोटे परिवार की अवधारणा को बढ़ावा देना था। हालांकि, समय के साथ इनकी उपयोगिता और व्यक्तिगत अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
मध्य प्रदेश में भी बदला दो बच्चों वाला नियम
मध्य प्रदेश में भी लंबे समय तक दो से अधिक बच्चों को लेकर प्रतिबंधात्मक व्यवस्था रही है। राज्य में सरकारी नौकरी से संबंधित लगभग 23 साल पुराने दो बच्चों वाले नियम को लेकर जून 2026 में सरकार ने इसे समाप्त करने का फैसला किया।
वहीं, स्थानीय निकाय चुनावों के संदर्भ में मध्य प्रदेश पहले ही इस तरह की अयोग्यता की व्यवस्था को खत्म कर चुका था। साल 2005 में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से उठाई गई आपत्तियों के बाद इस प्रतिबंध को हटाया गया था।
इससे स्पष्ट होता है कि अलग-अलग राज्यों में समय और परिस्थितियों के अनुसार दो बच्चों की नीति में बदलाव होते रहे हैं। कुछ राज्यों ने प्रतिबंधों को जारी रखा है, जबकि कुछ ने उन्हें समाप्त करने का रास्ता चुना है।
देश के कितने राज्यों में अब भी लागू हैं ऐसे नियम?
सुप्रीम कोर्ट में 4 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान अदालत के सामने अलग-अलग राज्यों में दो बच्चों से जुड़े कानूनों की स्थिति भी रखी गई। इस दौरान उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देश के सात राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने दो बच्चों की शर्त को समाप्त कर दिया है। वहीं 15 राज्यों में इस तरह की कोई नीति लागू नहीं है।
इसके अलावा असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में दो बच्चों से जुड़े प्रावधान अब भी लागू होने की जानकारी अदालत को दी गई।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि इन सभी राज्यों में नियमों का स्वरूप और उनका दायरा समान नहीं है। कहीं सरकारी नौकरी से संबंधित शर्तें हैं, तो कहीं स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवार की पात्रता के लिए बच्चों की संख्या को आधार बनाया गया है।
क्या घटती प्रजनन दर के दौर में बदलने चाहिए ये कानून?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के पीछे सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत में बदलती जनसंख्या की स्थिति है। देश में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार पहले के मुकाबले धीमी हुई है और प्रजनन दर में भी लगातार गिरावट आई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुराने जनसंख्या नियंत्रण कानूनों को आज भी उसी तरह लागू रखना उचित है?
एक तरफ छोटे परिवार को बढ़ावा देने की नीति को जनसंख्या नियंत्रण का माध्यम माना जाता रहा है। दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि बच्चों की संख्या के आधार पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने या सरकारी सेवा से जुड़े अवसरों से वंचित करना उसके व्यक्तिगत अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से पुराने फैसले पर पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ को मामला भेजना इसी बहस को आगे बढ़ाने वाला कदम है। अब बड़ी पीठ के सामने यह सवाल होगा कि मौजूदा सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में ऐसे प्रतिबंधों को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी से देश में दो बच्चों की शर्त अपने आप समाप्त नहीं हुई है। राज्यों के मौजूदा कानून और सरकारी आदेश तब तक लागू रहेंगे, जब तक उनमें संबंधित कानूनी या प्रशासनिक बदलाव नहीं किया जाता। आने वाले समय में बड़ी पीठ का फैसला इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।




