धनतेरस और दिवाली के त्योहार से पहले भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला है। गुरुवार, 5 नवंबर को बाजार खुलते ही खरीदारी का ऐसा माहौल बना कि सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ने लंबी छलांग लगा दी। सेंसेक्स में करीब 2,000 अंकों की तेजी दर्ज की गई, जबकि निफ्टी भी 550 अंकों से अधिक ऊपर पहुंच गया। बाजार में आई इस तेजी ने निवेशकों के चेहरे पर मुस्कान ला दी। एक ही कारोबारी दिन में निवेशकों की संपत्ति में 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का इजाफा हो गया।
शेयर बाजार में आई इस तेजी के पीछे केवल घरेलू निवेशकों की खरीदारी ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का भी बड़ा योगदान माना जा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी को मिडटर्म चुनाव में मिली हार, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, भारतीय कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजे और डॉलर के कमजोर होने की उम्मीद ने बाजार का माहौल बदल दिया है। इन घटनाओं के चलते निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ और उन्होंने बाजार में जमकर पैसा लगाया।
गौर करने वाली बात यह है कि भारतीय शेयर बाजार में लगातार छठे कारोबारी दिन तेजी देखने को मिली है। पिछले कुछ दिनों से जारी इस बढ़त ने बाजार को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। सेंसेक्स ने करीब सात महीने बाद एक बार फिर इतनी बड़ी एकदिवसीय छलांग लगाई है।
सात महीने बाद सेंसेक्स में इतनी बड़ी तेजी
गुरुवार को कारोबार के दौरान बीएसई का सेंसेक्स लगभग 2,000 अंक चढ़कर 79,300 के स्तर तक पहुंच गया। प्रतिशत के लिहाज से इसमें करीब 2.60 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई। दूसरी तरफ नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी 550 अंक यानी लगभग 2.40 फीसदी मजबूत होकर 24,500 के पार कारोबार करता नजर आया।
निफ्टी के लिए भी यह तेजी काफी अहम रही। इसने 4 सितंबर के बाद पहली बार 24,000 अंकों के स्तर को पार किया। बाजार के दोनों प्रमुख इंडेक्स में एक साथ आई इस मजबूती से यह संकेत मिला कि निवेशकों ने अलग-अलग सेक्टरों के शेयरों में खरीदारी की।
सेंसेक्स की इस साल की बड़ी तेजी के आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले 8 अप्रैल को इंडेक्स में करीब 2,946 अंकों की उछाल दर्ज की गई थी। उस दिन भी बाजार में जोरदार खरीदारी देखने को मिली थी। अब नवंबर में आई यह तेजी साल की दूसरी सबसे बड़ी बढ़त बन गई है।
इससे पहले बाजार में लंबे समय तक उतार-चढ़ाव का माहौल बना हुआ था। वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों के कारण निवेशक सतर्क थे। हालांकि, अब परिस्थितियों में बदलाव के संकेत मिलने से बाजार में सकारात्मक माहौल बनता दिखाई दे रहा है।
अमेरिकी राजनीति में बदलाव से दुनियाभर के बाजारों को मिला सहारा
भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी की एक प्रमुख वजह अमेरिका के मिडटर्म चुनाव के नतीजे भी हैं। इन चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को दोनों सदनों में हार का सामना करना पड़ा है। इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निवेशकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही।
अमेरिका की राजनीति का असर केवल वहां के शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहता। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण वहां होने वाले बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलावों का प्रभाव भारत सहित कई देशों के बाजारों पर पड़ता है।
ट्रम्प की पार्टी को चुनाव में झटका लगने के बाद ईरान के साथ जारी तनाव और संभावित युद्ध को लेकर भी नई उम्मीदें पैदा हुई हैं। निवेशकों को लग रहा है कि आने वाले समय में क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
अगर ईरान से जुड़ा तनाव कम होता है तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री रास्तों पर बनी अनिश्चितता भी घट सकती है। इससे ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बाजार की चिंताएं कम होंगी। इसी संभावना के चलते वैश्विक शेयर बाजारों में सकारात्मक रुख देखने को मिला, जिसका फायदा भारतीय बाजार को भी मिला।
अमेरिकी चुनाव के नतीजों के बाद वहां के शेयर बाजार में भी अच्छी तेजी दर्ज की गई। इसका असर दूसरे देशों के बाजारों पर भी दिखाई दिया।
कच्चे तेल के सस्ता होने से भारत को मिल सकती है राहत
भारतीय शेयर बाजार को मजबूती देने वाला दूसरा बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट है। ईरान से जुड़े तनाव में कमी आने की संभावनाओं के बीच कच्चे तेल के दाम नीचे आए हैं।
ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर करीब 94 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड लगभग 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया।
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट काफी महत्वपूर्ण है। देश अपनी कुल जरूरत का 80 फीसदी से अधिक तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत को आयात के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इसका असर देश के व्यापार घाटे, महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
इसके उलट अगर कच्चा तेल सस्ता होता है तो भारत का आयात बिल कम होने की संभावना रहती है। इससे सरकार और कंपनियों दोनों को राहत मिल सकती है। पेट्रोलियम उत्पादों की लागत घटने से परिवहन और उत्पादन क्षेत्र पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, तेल की कीमतों में लगातार नरमी बनी रहती है तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त सहारा मिल सकता है। यही वजह है कि कच्चे तेल में गिरावट को शेयर बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
बड़ी कंपनियों के नतीजों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया
बाजार में तेजी की तीसरी अहम वजह भारतीय कंपनियों के सितंबर तिमाही के वित्तीय नतीजे हैं। कई बड़ी कंपनियों ने अपने कारोबार और कमाई के मामले में बेहतर प्रदर्शन किया है। इससे निवेशकों को उम्मीद मिली है कि कंपनियों की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंफोसिस और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयरों में भी तेजी देखने को मिली। इन कंपनियों का शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स में अच्छा खासा प्रभाव है। इसलिए इनके शेयरों में खरीदारी होने से सेंसेक्स और निफ्टी को मजबूती मिलती है।
सेंसेक्स में देश की 30 प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। इन कंपनियों के शेयरों की कीमतों में होने वाला बदलाव इंडेक्स की चाल को प्रभावित करता है। गुरुवार को सेंसेक्स में शामिल ज्यादातर कंपनियों के शेयर हरे निशान में कारोबार करते नजर आए।
कंपनियों के मजबूत नतीजों से निवेशकों को यह भरोसा मिला है कि बाजार में आगे भी कमाई के अच्छे अवसर बन सकते हैं। जब कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है और भविष्य को लेकर उम्मीदें बेहतर होती हैं, तो निवेशक उनके शेयर खरीदने में दिलचस्पी दिखाते हैं।
सितंबर तिमाही के नतीजों ने बाजार के कमजोर सेंटिमेंट को बदलने में मदद की है। इसका असर गुरुवार की जोरदार खरीदारी में साफ दिखाई दिया।
डॉलर की कमजोरी की संभावना से विदेशी निवेशकों को मिल सकता है फायदा
बाजार में तेजी की चौथी वजह अमेरिकी डॉलर को लेकर बन रही संभावनाएं हैं। निवेशकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में डॉलर की मजबूती कम हो सकती है। इसका फायदा भारत जैसे उभरते बाजारों को मिल सकता है।
दरअसल, जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है तो विदेशी निवेशकों के लिए दूसरे देशों में निवेश करना अपेक्षाकृत महंगा पड़ सकता है। वहीं डॉलर कमजोर होने पर भारत जैसे बाजारों में निवेश आकर्षक हो सकता है।
विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार में बड़ी मात्रा में पैसा लगाते हैं। उनके निवेश में बदलाव का असर सेंसेक्स और निफ्टी की चाल पर भी दिखाई देता है। अगर वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं और डॉलर कमजोर पड़ता है तो विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार में दिलचस्पी बढ़ सकती है।
ऐसे में शेयरों की मांग बढ़ने से बाजार को अतिरिक्त मजबूती मिल सकती है। हालांकि, डॉलर की चाल कई आर्थिक और राजनीतिक कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए इसे लेकर बनी उम्मीदों का वास्तविक असर आने वाले दिनों में ही स्पष्ट होगा।
लगातार छह कारोबारी सत्रों से बाजार में तेजी
भारतीय शेयर बाजार में पिछले छह कारोबारी सत्रों से लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है। 28 अक्टूबर से शुरू हुई इस तेजी ने सेंसेक्स को काफी ऊपर पहुंचा दिया है।
28 अक्टूबर को सेंसेक्स करीब 73,246 के स्तर पर था। इसके बाद बाजार में धीरे-धीरे खरीदारी बढ़ती गई और 5 नवंबर को यह 79,000 के आसपास पहुंच गया। कुछ ही कारोबारी दिनों में इंडेक्स में हजारों अंकों की बढ़त दर्ज की गई है।
इस तेजी से निवेशकों की संपत्ति में भी बड़ा इजाफा हुआ है। गुरुवार को बाजार में आई उछाल के कारण कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन बढ़ा और निवेशकों की दौलत में 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि हुई।
धनतेरस से पहले बाजार की तेजी ने बढ़ाया उत्साह
त्योहारी सीजन के बीच शेयर बाजार में आई यह तेजी निवेशकों के लिए खास मायने रखती है। धनतेरस को पारंपरिक रूप से सोने, चांदी और दूसरी कीमती वस्तुओं की खरीदारी के लिए शुभ माना जाता है। ऐसे में त्योहार से ठीक पहले शेयर बाजार में भी खरीदारी का मजबूत माहौल बन गया है।
हालांकि, बाजार में आई तेजी को देखते हुए निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य बात है। वैश्विक राजनीति, कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर की स्थिति और कंपनियों के नतीजे आगे भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
फिलहाल अमेरिकी चुनाव के नतीजों, तेल की कीमतों में गिरावट और कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन ने बाजार को मजबूती दी है। आने वाले कारोबारी सत्रों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निवेशकों का उत्साह बरकरार रहता है या बाजार में मुनाफावसूली शुरू होती है। फिलहाल धनतेरस से पहले सेंसेक्स और निफ्टी की जोरदार तेजी ने शेयर बाजार में रौनक जरूर लौटा दी है।




