किशाऊ परियोजना पर आठ साल का गतिरोध खत्म, हिमाचल को बिना निवेश मिलेगा बिजली से बड़ा आर्थिक लाभ

किशाऊ परियोजना पर आठ साल का गतिरोध खत्म, हिमाचल को बिना निवेश मिलेगा बिजली से बड़ा आर्थिक लाभ

शिमला/नई दिल्ली। हिमाचल प्रदेश के लिए लंबे समय से अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर मंगलवार को बड़ा समझौता हुआ। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में हिमाचल प्रदेश समेत छह राज्यों ने 422 मेगावाट क्षमता वाली किशाऊ परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना की अनुमानित लागत 15,624 करोड़ रुपये है। समझौते के साथ ही परियोजना को लेकर कई वर्षों से चले आ रहे जल बंटवारे और लागत साझेदारी के विवाद को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है।

इस समझौते से हिमाचल प्रदेश के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्य को परियोजना के अपने हिस्से के बिजली घटक की अनुमानित करीब 2,000 करोड़ रुपये की लागत नहीं उठानी होगी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के अनुसार यह राशि उन लाभार्थी राज्यों द्वारा वहन की जाएगी, जिन्हें किशाऊ परियोजना के जल घटक से लाभ मिलेगा। इससे हिमाचल को अपने सीमित वित्तीय संसाधनों से इतनी बड़ी राशि निवेश करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

परियोजना के पूरा होने के बाद हिमाचल को उसके हिस्से की बिजली भी प्राप्त होगी। मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य को करीब 211 मेगावाट बिजली का हिस्सा बिना उत्पादन लागत वहन किए मिलेगा, जिससे सालाना लगभग 1,000 मिलियन यूनिट बिजली के रूप में आर्थिक लाभ होने का अनुमान है। विभिन्न रिपोर्टों में इस बिजली की वार्षिक कीमत करीब 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है।

छह राज्यों ने किया समझौता

नई दिल्ली में हुए कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। समझौते पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल के अलावा हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हस्ताक्षर किए।

समारोह में हिमाचल के मुख्य सचिव केके पंत और अतिरिक्त मुख्य सचिव आरडी नजीम भी मुख्यमंत्री के साथ मौजूद रहे। समझौते के बाद अब परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है।

15,624 करोड़ की परियोजना, 422 मेगावाट होगी क्षमता

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है। टौंस यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है और प्रस्तावित बांध हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड की सीमा के निकट बनाया जाना है। केंद्र सरकार के अनुसार परियोजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध का निर्माण प्रस्तावित है। परियोजना की जल भंडारण क्षमता करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी।

परियोजना से सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन के क्षेत्र में लाभ मिलने की योजना है। केंद्र के अनुसार इससे करीब 97,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा विकसित होगी और लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत का उत्पादन किया जाएगा।

जल घटक का 90 प्रतिशत खर्च केंद्र उठाएगा

समझौते के अनुसार किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना के तौर पर केंद्र से बड़ी वित्तीय सहायता मिलेगी। परियोजना के जल घटक की करीब 90 प्रतिशत वित्तीय लागत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि भागीदार राज्यों द्वारा साझा की जाएगी।

हिमाचल प्रदेश के लिए सबसे अहम बदलाव बिजली घटक से जुड़ी लागत को लेकर हुआ है। पहले राज्य के सामने अपनी हिस्सेदारी के लिए बड़ी राशि खर्च करने की स्थिति थी। मुख्यमंत्री सुक्खू ने इस मुद्दे पर केंद्र के सामने राज्य के वित्तीय हितों को लेकर आपत्ति जताई थी। अब हुए समझौते में हिमाचल के हिस्से के बिजली घटक की अनुमानित लागत को लाभार्थी राज्यों से साझा कराने पर सहमति बनी है।

जून की बैठक में बनी थी सहमति

किशाऊ परियोजना को लेकर निर्णायक पहल 16 जून 2026 को हुई उच्चस्तरीय बैठक में हुई थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में छह राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों को दूर करने की कोशिश की गई थी। इसी दौरान हिमाचल के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराने के बदले राज्य के बिजली घटक की लागत साझा करने पर सहमति बनने की जानकारी सामने आई थी।

मुख्यमंत्री सुक्खू के अनुसार, जून की बैठक में केंद्र सरकार ने सैद्धांतिक रूप से इस बात पर सहमति दी थी कि हिमाचल प्रदेश के बिजली घटक की करीब 2,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा वहन करेंगे। मंगलवार को हुए एमओयू में इसी व्यवस्था को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ।

पानी के बदले बिजली में आर्थिक हिस्सेदारी

किशाऊ परियोजना के समझौते में हिमाचल प्रदेश के लिए पानी और बिजली की हिस्सेदारी का मुद्दा महत्वपूर्ण है। समझौते के तहत हिमाचल के हिस्से के पानी का लाभ अन्य राज्यों को मिलेगा। इसके बदले हिमाचल के हिस्से के बिजली घटक की लागत में लाभार्थी राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

यानी हिमाचल को परियोजना में अपनी बिजली हिस्सेदारी हासिल करने के लिए पहले जैसी वित्तीय जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ेगी। यही कारण है कि राज्य सरकार इसे अपने वित्तीय हितों से जुड़ा महत्वपूर्ण परिणाम बता रही है।

पिछले प्रस्ताव में हिमाचल पर था आर्थिक भार

मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि पिछली सरकार के समय हिमाचल प्रदेश की ओर से परियोजना में करीब 800 करोड़ रुपये की राशि देने पर सहमति जताई गई थी। मौजूदा सरकार ने राज्य की वित्तीय स्थिति और परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों के हितों को देखते हुए इस व्यवस्था पर पुनर्विचार किया।

सुक्खू के अनुसार, पहाड़ी राज्य के सीमित संसाधनों को देखते हुए इतनी बड़ी परियोजना में बिजली घटक का खर्च उठाना हिमाचल के लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ता। इसी वजह से सरकार ने केंद्र के समक्ष राज्य के हिस्से का खर्च लाभार्थी राज्यों से वहन करवाने का मुद्दा उठाया। अब समझौते के बाद करीब 2,000 करोड़ रुपये का अनुमानित भार हिमाचल से हटने की बात कही जा रही है।

बिना बड़े निवेश के बिजली से आय का दावा

किशाऊ परियोजना पूरी होने के बाद हिमाचल को अपने हिस्से की बिजली प्राप्त होगी। मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसे राज्य के लिए दीर्घकालिक आर्थिक लाभ से जोड़ते हुए कहा है कि हिमाचल को करीब 1,000 मिलियन यूनिट बिजली सालाना मिलेगी। इसकी बाजार कीमत के आधार पर राज्य को हर साल 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ मिलने का अनुमान है। कुछ रिपोर्टों में यह अनुमान करीब 1,200 करोड़ रुपये सालाना तक बताया गया है।

इस व्यवस्था की खास बात यह है कि हिमाचल को बिजली उत्पादन की लागत में अपनी अनुमानित हिस्सेदारी खर्च किए बिना बिजली का लाभ मिलने की बात कही गई है। इससे परियोजना के संचालन के बाद राज्य के लिए यह नियमित राजस्व अथवा बिजली मूल्य के रूप में आर्थिक लाभ का स्रोत बन सकता है।

दिल्ली समेत कई राज्यों को मिलेगा पानी

किशाऊ परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका मुख्य हिस्सा जल भंडारण और विभिन्न राज्यों को पानी उपलब्ध कराने से जुड़ा है। परियोजना से यमुना बेसिन में जल उपलब्धता को नियंत्रित करने, सिंचाई बढ़ाने और पेयजल आपूर्ति को मजबूत करने की योजना है।

केंद्र के अनुसार दिल्ली को परियोजना से पेयजल आपूर्ति में विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। वहीं हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य भागीदार राज्यों को भी परियोजना के जल घटक से लाभ मिलेगा।

कई वर्षों से अटकी थी परियोजना

किशाऊ परियोजना लंबे समय से विभिन्न कारणों से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। मुख्य अड़चनों में राज्यों के बीच पानी के बंटवारे, बिजली की हिस्सेदारी और परियोजना की लागत साझा करने से जुड़े मुद्दे शामिल थे। हालिया समझौते से इन मुद्दों पर राज्यों के बीच सहमति बनने का दावा किया गया है।

अब एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को क्रियान्वयन की दिशा में आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होगी। केंद्र सरकार की ओर से इसे लंबे समय से लंबित अंतरराज्यीय जल सहयोग के मामले में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है।

हिमाचल सरकार ने बताया वित्तीय हितों की सुरक्षा

मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने समझौते के बाद कहा कि हिमाचल प्रदेश ने परियोजना को लेकर अपने आर्थिक हितों की रक्षा की है। उनका कहना है कि राज्य के हिस्से के पानी का लाभ लेने वाले राज्यों द्वारा हिमाचल के बिजली घटक की लागत साझा करने से प्रदेश पर बड़ा वित्तीय भार नहीं आएगा।

सरकार के अनुसार, एक ओर करीब 2,000 करोड़ रुपये के संभावित खर्च से हिमाचल को राहत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर परियोजना के पूरा होने के बाद राज्य को बिजली हिस्सेदारी से नियमित आर्थिक लाभ प्राप्त होगा। इस तरह परियोजना में हिमाचल की भूमिका केवल लागत वहन करने वाले राज्य की नहीं रहेगी, बल्कि उसे अपनी हिस्सेदारी के अनुरूप बिजली लाभ भी मिलेगा।

अब आगे बढ़ेगी परियोजना की प्रक्रिया

छह राज्यों के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के क्रियान्वयन का रास्ता पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट हुआ है। केंद्र सरकार की ओर से परियोजना के बड़े हिस्से की लागत वहन किए जाने और राज्यों के बीच पानी व बिजली घटक को लेकर सहमति बनने के बाद अब आगामी प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रियाओं पर ध्यान रहेगा।

हिमाचल के लिए इस समझौते का सबसे बड़ा पहलू राज्य पर आने वाले अनुमानित 2,000 करोड़ रुपये के बिजली खर्च से राहत और परियोजना से मिलने वाली बिजली हिस्सेदारी है। वहीं परियोजना के निर्माण से यमुना बेसिन के राज्यों में सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन से जुड़े लाभ मिलने की उम्मीद है। इस समझौते के साथ किशाऊ परियोजना वर्षों से चले आ रहे गतिरोध से बाहर निकलकर क्रियान्वयन के अगले चरण में पहुंच गई है।