दिनभर स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखना पड़ सकता है भारी, जानें आंखों को कैसे बचाएं

दिनभर स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखना पड़ सकता है भारी, जानें आंखों को कैसे बचाएं

मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऑफिस का काम हो, ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन या सोशल मीडिया का इस्तेमाल—दिन का बड़ा हिस्सा अब स्क्रीन के सामने ही बीतता है। हालांकि तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसका लगातार उपयोग आंखों पर गंभीर दबाव भी डाल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बिना रुके स्क्रीन देखने की आदत धीरे-धीरे आंखों की प्राकृतिक नमी कम कर सकती है और कई तरह की परेशानियों को जन्म दे सकती है।

ग्वालियर के रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक, निदेशक और नेत्र सर्जन डॉ. पुरेंद्र भसीन के अनुसार, आधुनिक जीवनशैली में तेजी से बढ़ रही एक आम समस्या “डिजिटल आई स्ट्रेन” या “आई बर्नआउट” है। यह स्थिति उन लोगों में अधिक देखने को मिलती है जो रोजाना कई घंटों तक डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं। सही समय पर सावधानी न बरती जाए तो यह परेशानी कामकाज और दैनिक जीवन दोनों को प्रभावित कर सकती है।

आखिर डिजिटल आई स्ट्रेन क्यों होता है?

जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित रखता है, तो उसकी पलकें सामान्य से कम झपकती हैं। सामान्य परिस्थितियों में पलकें लगातार झपकने से आंखों की सतह पर नमी बनी रहती है, लेकिन स्क्रीन पर लगातार नजर टिकाए रखने से यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है। परिणामस्वरूप आंखों की सतह सूखने लगती है और जलन, चुभन या भारीपन महसूस होने लगता है।

कई लोगों को ऐसा लगता है जैसे आंखों में धूल या रेत चली गई हो। कुछ मामलों में लंबे समय तक काम करने के बाद आंखें बेहद थकी हुई महसूस होती हैं और व्यक्ति को स्क्रीन पर ध्यान बनाए रखने में कठिनाई होने लगती है।

किन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?

डिजिटल आई स्ट्रेन की शुरुआत अक्सर छोटे-छोटे लक्षणों से होती है, जिन्हें लोग सामान्य थकान समझकर अनदेखा कर देते हैं। लेकिन समय रहते इन संकेतों को पहचानना जरूरी है।

इस समस्या में आंखें लाल हो सकती हैं या देखने में हल्का धुंधलापन महसूस हो सकता है। कई लोगों को बार-बार सिरदर्द की शिकायत रहती है, जबकि कुछ को गर्दन और कंधों में जकड़न या दर्द महसूस होता है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने के बाद फोकस बदलने में परेशानी आना, तेज रोशनी से चुभन होना या आंखों में दर्द होना भी इसके प्रमुख संकेत माने जाते हैं।

अगर ये लक्षण लगातार बने रहें तो व्यक्ति की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और सामान्य काम करना भी मुश्किल लगने लगता है।

क्या इससे आंखों को स्थायी नुकसान हो सकता है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, अधिकांश मामलों में डिजिटल आई स्ट्रेन आंखों को स्थायी रूप से नुकसान नहीं पहुंचाता। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि इसे हल्के में लिया जाए। लगातार आंखों पर दबाव पड़ने से थकान बढ़ती है, काम में एकाग्रता कम होती है और लंबे समय तक स्क्रीन पर बने रहना मुश्किल हो जाता है।

जिन लोगों को पहले से ड्राई आई सिंड्रोम, चश्मे का नंबर या अन्य नेत्र संबंधी समस्याएं हैं, उनके लिए यह स्थिति अधिक असुविधाजनक साबित हो सकती है। ऐसे लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लेने की आवश्यकता होती है।

20-20-20 नियम क्यों माना जाता है असरदार?

डॉ. पुरेंद्र भसीन का कहना है कि आंखों को आराम देने का सबसे सरल तरीका 20-20-20 नियम अपनाना है। इसके तहत हर 20 मिनट बाद लगभग 20 सेकंड का विराम लेकर 20 फीट दूर मौजूद किसी वस्तु को देखना चाहिए।

यह अभ्यास आंखों की फोकस करने वाली मांसपेशियों को आराम देता है और लगातार स्क्रीन देखने से पैदा होने वाले तनाव को कम करने में मदद करता है। खास बात यह है कि इसे ऑफिस, घर या पढ़ाई के दौरान आसानी से अपनाया जा सकता है।

स्क्रीन और बैठने की सही स्थिति भी है जरूरी

आंखों की सुरक्षा केवल ब्रेक लेने से ही नहीं होती, बल्कि स्क्रीन की दूरी और कार्यस्थल की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि मॉनिटर या लैपटॉप को आंखों से उचित दूरी पर रखा जाए और उसकी ऊंचाई ऐसी हो कि गर्दन पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।

इसके अलावा जिस कमरे में काम किया जा रहा हो, वहां पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए। बहुत तेज या बहुत कम रोशनी दोनों ही आंखों पर अतिरिक्त तनाव डाल सकती हैं।

ब्राइटनेस और कॉन्ट्रास्ट का रखें ध्यान

कई लोग मोबाइल या लैपटॉप की ब्राइटनेस को पूरे दिन एक जैसी रखते हैं, जबकि आसपास के वातावरण के हिसाब से इसमें बदलाव करना चाहिए। अत्यधिक चमकदार स्क्रीन आंखों में चुभन पैदा कर सकती है, वहीं बहुत कम रोशनी में स्क्रीन देखने से भी आंखों को अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

अगर स्क्रीन की सेटिंग्स परिवेश के अनुरूप रखी जाएं तो आंखों पर पड़ने वाला अनावश्यक दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।

पलकें झपकाने की आदत न भूलें

डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करते समय लोग अनजाने में पलकें कम झपकाते हैं। इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि काम करते हुए बीच-बीच में जानबूझकर आंखें झपकाने की आदत डालनी चाहिए। इससे आंसुओं की प्राकृतिक परत बनी रहती है और आंखों का सूखापन कम होता है।

यह छोटी-सी आदत लंबे समय तक स्क्रीन उपयोग करने वालों के लिए काफी लाभकारी साबित हो सकती है।

पानी, नींद और संतुलित दिनचर्या का भी है बड़ा योगदान

केवल बाहरी उपाय ही पर्याप्त नहीं हैं। शरीर में पानी की कमी होने पर आंखों की नमी भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है। साथ ही पूरी नींद लेना भी आंखों को आराम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यदि किसी व्यक्ति को लगातार सूखापन महसूस हो रहा हो, तो डॉक्टर की सलाह के बाद लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है। बिना विशेषज्ञ की सलाह के कोई भी दवा या ड्रॉप्स लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए।

कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

यदि ब्रेक लेने, स्क्रीन टाइम कम करने और अन्य सावधानियां अपनाने के बावजूद धुंधला दिखना, आंखों में तेज दर्द, लगातार सिरदर्द, अत्यधिक जलन या रोशनी से असामान्य परेशानी बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में जल्द से जल्द नेत्र विशेषज्ञ से जांच करवाना बेहतर होता है ताकि किसी दूसरी समस्या की पहचान समय रहते हो सके।

बदलती जीवनशैली में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव

आज डिजिटल उपकरणों से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन उनके उपयोग का सही तरीका अपनाकर आंखों को सुरक्षित रखा जा सकता है। नियमित अंतराल पर ब्रेक लेना, पलकें झपकाना, उचित रोशनी में काम करना, पर्याप्त पानी पीना और अच्छी नींद लेना जैसे साधारण कदम डिजिटल आई स्ट्रेन के खतरे को काफी कम कर सकते हैं।

छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर न सिर्फ आंखों की नमी और आराम बनाए रखा जा सकता है, बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ दृष्टि और बेहतर कार्यक्षमता भी सुनिश्चित की जा सकती है।