दुनिया में तेजी से बढ़ रही मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं अब केवल किसी एक देश या आयु वर्ग तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि यह पूरी दुनिया के सामने खड़ी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी हैं। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता काम का दबाव, सामाजिक बदलाव, आर्थिक अस्थिरता, डिजिटल दुनिया का प्रभाव और अकेलेपन जैसी परिस्थितियों ने मानसिक स्वास्थ्य को पहले से कहीं अधिक प्रभावित किया है। इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) लगातार मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक प्राथमिकता के रूप में सामने ला रहा है।
WHO की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान समय में दुनिया का लगभग हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार से प्रभावित है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं अब बहुत आम हो चुकी हैं और इनके प्रति जागरूकता बढ़ाना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। इसी बढ़ती चिंता को देखते हुए स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित 79वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रमुख एजेंडा बनाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में इसका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है।
WHO की रिपोर्ट क्या बताती है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में एक अरब से अधिक लोग किसी न किसी मानसिक समस्या का सामना कर रहे हैं। इनमें डिप्रेशन, एंग्जायटी, बाइपोलर डिसऑर्डर, स्किजोफ्रेनिया, पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), सोशल एंग्जायटी और अन्य मानसिक विकार शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अभी भी कई देशों में सीमित है, जिसके कारण बड़ी संख्या में मरीज समय पर उपचार नहीं ले पाते।
विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 महामारी के बाद मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। महामारी के दौरान लंबे समय तक घरों में रहना, नौकरी का नुकसान, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक दूरी और प्रियजनों को खोने जैसी घटनाओं ने लोगों के मानसिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला।
युवाओं में तेजी से बढ़ रही मानसिक परेशानियां
हाल के वर्षों में युवाओं के बीच मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। पढ़ाई का दबाव, करियर को लेकर अनिश्चितता, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया की तुलना, रिश्तों में तनाव और भविष्य की चिंता जैसी कई वजहें युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कई युवा अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते, जिसके कारण तनाव धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकता है। यदि समय पर उचित सलाह और सहयोग न मिले तो इसका असर पढ़ाई, नौकरी, सामाजिक जीवन और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगता है।
महिलाओं और पुरुषों में अलग-अलग तरह की चुनौतियां
रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में एंग्जायटी और डिप्रेशन के मामले अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं। परिवार की जिम्मेदारियां, कार्यस्थल का दबाव, हार्मोनल परिवर्तन, सामाजिक अपेक्षाएं और कई अन्य कारण मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं पुरुषों में नशे की लत, गुस्सा, हिंसक व्यवहार और मानसिक तनाव को छिपाने की प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य किसी एक लिंग तक सीमित समस्या नहीं है। पुरुष और महिलाएं अलग-अलग परिस्थितियों में अलग प्रकार की मानसिक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं, इसलिए सभी के लिए समान रूप से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता आवश्यक है।
मेंटल डिसऑर्डर क्या होता है और इसके प्रमुख प्रकार
मेंटल डिसऑर्डर या मानसिक विकार ऐसी चिकित्सकीय स्थिति है जो व्यक्ति की सोचने, महसूस करने, व्यवहार करने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। यह समस्या अस्थायी भी हो सकती है और कुछ मामलों में लंबे समय तक बनी रह सकती है। मानसिक विकार किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, पारिवारिक संबंधों, शिक्षा, नौकरी और सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।
डिप्रेशन
डिप्रेशन केवल उदासी महसूस करने का नाम नहीं है। इसमें लंबे समय तक निराशा, किसी भी काम में रुचि कम होना, थकान, आत्मविश्वास में कमी, नींद और भूख में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। यदि ये लक्षण लगातार बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी माना जाता है।
एंग्जायटी डिसऑर्डर
एंग्जायटी डिसऑर्डर में व्यक्ति को अत्यधिक चिंता, बेचैनी, घबराहट और डर महसूस हो सकता है। कई बार बिना किसी स्पष्ट कारण के भी व्यक्ति को तनाव महसूस होता है। यह समस्या काम, पढ़ाई और सामान्य जीवन को प्रभावित कर सकती है।
बाइपोलर डिसऑर्डर
इस स्थिति में व्यक्ति के मूड में अत्यधिक बदलाव देखने को मिलते हैं। कभी अत्यधिक उत्साह और ऊर्जा महसूस होती है तो कभी गहरी उदासी और निराशा का अनुभव होता है। सही उपचार और विशेषज्ञ की देखरेख से इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
PTSD और अन्य मानसिक विकार
किसी गंभीर दुर्घटना, हिंसा, प्राकृतिक आपदा या अन्य दर्दनाक घटना के बाद कुछ लोगों में पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर विकसित हो सकता है। इसके अलावा स्किजोफ्रेनिया, सोशल फोबिया और ईटिंग डिसऑर्डर जैसे मानसिक विकार भी अलग-अलग प्रकार के लक्षणों के साथ सामने आते हैं।
किन क्षेत्रों में मानसिक विकारों के मामले अधिक हैं?
WHO के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमेरिका क्षेत्र में मानसिक विकारों की दर लगभग 15.6 प्रतिशत दर्ज की गई है। इसके बाद यूरोप में लगभग 14.2 प्रतिशत और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में करीब 13.2 प्रतिशत मामले सामने आए हैं। विभिन्न देशों में सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य सेवाओं और जीवनशैली से जुड़े कारणों के चलते मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ देशों में एंग्जायटी और डिप्रेशन के मामले अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किए गए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर रिपोर्टिंग और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी इन आंकड़ों को प्रभावित कर सकती है।
आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े चिंता का विषय
मानसिक स्वास्थ्य संकट का सबसे गंभीर पहलू आत्महत्या के बढ़ते मामले हैं। मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार हर वर्ष लगभग 7.4 लाख लोग आत्महत्या के कारण अपनी जान गंवाते हैं। इसका अर्थ है कि औसतन दुनिया में हर 43 सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु आत्महत्या से होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार 15 से 29 वर्ष की आयु के युवाओं में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। हालांकि यह समझना जरूरी है कि आत्महत्या एक जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है और इसके पीछे कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा आर्थिक कारण हो सकते हैं। समय पर सहायता, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और परिवार का सहयोग जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण
मानसिक स्वास्थ्य केवल एक कारण से प्रभावित नहीं होता। इसके पीछे कई जैविक, सामाजिक और पर्यावरणीय कारक एक साथ काम करते हैं। लगातार तनाव, आर्थिक समस्याएं, बेरोजगारी, पारिवारिक विवाद, अकेलापन, शारीरिक बीमारी, नशे का सेवन, नींद की कमी और अत्यधिक डिजिटल स्क्रीन का उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
इसके अलावा सामाजिक भेदभाव, हिंसा, कार्यस्थल का अत्यधिक दबाव और भविष्य को लेकर असुरक्षा भी कई लोगों में मानसिक तनाव बढ़ा सकती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत समस्या मानने के बजाय सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी समझना जरूरी है।
मानसिक तनाव कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ दिनचर्या मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नियमित और पर्याप्त नींद लेना, संतुलित भोजन करना, रोजाना शारीरिक गतिविधि या व्यायाम करना तथा योग और मेडिटेशन जैसी गतिविधियों को अपनाना तनाव कम करने में मददगार हो सकता है।
यदि कोई व्यक्ति लगातार उदासी, चिंता या मानसिक दबाव महसूस कर रहा है तो अपने परिवार, मित्रों या भरोसेमंद लोगों से खुलकर बात करना उपयोगी हो सकता है। लंबे समय तक परेशानी बनी रहने या दैनिक जीवन प्रभावित होने की स्थिति में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या प्रशिक्षित काउंसलर से सलाह लेना महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसके साथ ही सोशल मीडिया और स्क्रीन टाइम को सीमित रखना, पर्याप्त आराम करना, शौक से जुड़े कार्यों के लिए समय निकालना और नियमित दिनचर्या बनाए रखना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। मानसिक समस्याओं को छिपाने या नजरअंदाज करने के बजाय समय पर सहायता लेना बेहतर विकल्प हो सकता है।
Photo : AI Generated




