पुरुषों की फर्टिलिटी पर मंडरा रहा बड़ा खतरा! पांच दशकों में आधे से ज्यादा कम हुए स्पर्म, भारत के आंकड़े भी बढ़ा रहे चिंता

पुरुषों की फर्टिलिटी पर मंडरा रहा बड़ा खतरा! पांच दशकों में आधे से ज्यादा कम हुए स्पर्म, भारत के आंकड़े भी बढ़ा रहे चिंता

आज की बदलती जीवनशैली का असर केवल हमारी सेहत और शारीरिक क्षमता पर ही नहीं, बल्कि प्रजनन स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। खासतौर पर पुरुषों की फर्टिलिटी को लेकर दुनियाभर में चिंता बढ़ रही है। इसकी एक बड़ी वजह स्पर्म काउंट यानी शुक्राणुओं की संख्या में लगातार दर्ज की जा रही गिरावट है। पिछले पांच दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी चिंताजनक दिखाई देती है। साल 1973 से लेकर 2018 के बीच पुरुषों के स्पर्म काउंट में आधे से भी ज्यादा कमी दर्ज की गई है। हैरानी की बात यह है कि भारत में भी इस समस्या के संकेत सामने आए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इनमें खराब खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी, बढ़ता वजन, प्रदूषण और रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले कुछ केमिकल प्रमुख हैं। हालांकि, स्पर्म काउंट कम होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि कोई पुरुष पिता नहीं बन सकता, लेकिन इससे प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना प्रभावित हो सकती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर पिछले कुछ दशकों में पुरुषों के स्पर्म की संख्या में इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई है और इससे बचने के लिए कौन से कदम उठाए जा सकते हैं।

पांच दशकों में आधे से ज्यादा कम हुए शुक्राणु

पुरुषों की प्रजनन क्षमता को लेकर साल 2023 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक समीक्षा ने दुनिया का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा। इस अध्ययन में शामिल आंकड़ों के मुताबिक, साल 1973 से 2018 के बीच दुनियाभर में पुरुषों के स्पर्म काउंट में लगभग 51.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि समस्या केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है।

अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि साल 2000 के बाद शुक्राणुओं की संख्या में गिरावट की रफ्तार पहले की तुलना में अधिक तेज होती दिखाई दी। इसका मतलब है कि बीते कुछ वर्षों में यह समस्या और गंभीर हुई है। वैज्ञानिकों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है कि आखिर आधुनिक दौर में ऐसी कौन सी परिस्थितियां पैदा हो रही हैं, जो पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य को लगातार प्रभावित कर रही हैं।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि स्पर्म काउंट में गिरावट और पुरुषों में बांझपन एक ही चीज नहीं हैं। किसी व्यक्ति के स्पर्म की संख्या कम होने के बावजूद उसके पिता बनने की संभावना हो सकती है। वहीं, सामान्य स्पर्म काउंट होने पर भी कुछ लोगों को गर्भधारण में परेशानी हो सकती है। प्रजनन क्षमता का आकलन केवल शुक्राणुओं की संख्या के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि उनकी गति, बनावट और अन्य स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को भी देखा जाता है।

भारत के पुरुषों में भी दिखाई दे रहे ऐसे संकेत

इस वैश्विक समस्या से भारत भी अछूता नहीं है। भारतीय पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर सामने आए अध्ययनों में भी शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता में गिरावट के संकेत मिले हैं। साल 2018 में 13,486 भारतीय पुरुषों के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में इस विषय का विश्लेषण किया गया था।

इस अध्ययन में खासतौर पर उन पुरुषों के आंकड़े भी शामिल थे, जो पहले से ही प्रजनन संबंधी परेशानियों का सामना कर रहे थे। रिपोर्ट में भारतीय पुरुषों के स्पर्म की संख्या और गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई गई। हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी खास समूह में सामने आए नतीजों को देश के प्रत्येक पुरुष की स्थिति नहीं माना जा सकता।

भारत जैसे बड़े देश में खानपान, रहन-सहन, प्रदूषण, कामकाज और स्वास्थ्य सुविधाओं में काफी अंतर है। इसलिए सभी पुरुषों पर एक जैसे निष्कर्ष लागू नहीं किए जा सकते। इसके बावजूद भारतीय पुरुषों में फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा। समय रहते इस दिशा में जागरूकता बढ़ाना और जरूरत पड़ने पर जांच कराना महत्वपूर्ण है।

आखिर किन वजहों से प्रभावित हो रही है पुरुषों की प्रजनन क्षमता?

स्पर्म काउंट में गिरावट के पीछे कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्यावरण, शारीरिक स्वास्थ्य, खानपान और जीवनशैली से जुड़ी कई परिस्थितियां मिलकर पुरुषों के प्रजनन तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।

1. गलत खानपान और बिगड़ती दिनचर्या

आजकल लोगों की खाने-पीने की आदतों में काफी बदलाव आया है। घर के पौष्टिक भोजन की जगह फास्ट फूड, तली-भुनी चीजें, ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड ने ले ली है। लंबे समय तक इस तरह का खानपान शरीर में मोटापा और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी परेशानियां बढ़ा सकता है। इसका असर हार्मोनल संतुलन और प्रजनन स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

इसके अलावा, घंटों एक जगह बैठकर काम करना और रोजाना पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं करना भी परेशानी बढ़ा सकता है। शारीरिक रूप से सक्रिय न रहने पर वजन बढ़ने और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा रहता है। इसलिए खानपान और रोजमर्रा की दिनचर्या को बेहतर बनाना जरूरी है।

2. धूम्रपान, शराब और मानसिक तनाव

सिगरेट, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन शरीर को कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। धूम्रपान से निकलने वाले हानिकारक तत्व शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं, जिसका असर शुक्राणुओं की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। इसी तरह अत्यधिक शराब का सेवन भी हार्मोनल संतुलन और पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

मानसिक तनाव को भी इस समस्या से जोड़कर देखा जाता है। लंबे समय तक तनाव में रहने से नींद और हार्मोन संबंधी प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। अगर किसी व्यक्ति की दिनचर्या में तनाव, अनियमित नींद और नशे की आदत लगातार बनी रहती है, तो इसका असर उसकी संपूर्ण सेहत पर पड़ सकता है।

3. प्रदूषण और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले केमिकल

पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण भी पुरुषों की फर्टिलिटी के लिए चिंता का विषय है। हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व, कीटनाशक, औद्योगिक रसायन और कुछ भारी धातुएं शरीर की सामान्य प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके अलावा, प्लास्टिक और कुछ घरेलू उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले बिस्फेनॉल और थैलेट्स जैसे रसायनों को लेकर भी वैज्ञानिक अध्ययन किए जा रहे हैं। इन पदार्थों में से कुछ हार्मोन की सामान्य गतिविधियों में हस्तक्षेप कर सकते हैं। लगातार इनके संपर्क में रहने से प्रजनन स्वास्थ्य पर संभावित नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जाती है।

4. शरीर के आसपास बढ़ता तापमान

शुक्राणुओं के निर्माण के लिए टेस्टिकल्स का तापमान शरीर के सामान्य तापमान से थोड़ा कम रहना जरूरी होता है। यही वजह है कि अंडकोष शरीर के बाहर स्थित होते हैं। जब लंबे समय तक इस हिस्से का तापमान अधिक रहता है, तो शुक्राणुओं के उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।

कुछ कामकाजी परिस्थितियों में लगातार अधिक गर्मी का सामना करना, गर्म औद्योगिक वातावरण में काम करना और अन्य ताप संबंधी जोखिम इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता।

5. बीमारियां और हार्मोन से जुड़ी गड़बड़ियां

पुरुषों में कुछ स्वास्थ्य समस्याएं भी स्पर्म काउंट कम होने की वजह बन सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, वैरिकोसील यानी अंडकोष की नसों का असामान्य रूप से फैलना, प्रजनन अंगों में संक्रमण, हार्मोनल असंतुलन और डायबिटीज जैसी स्थितियां शुक्राणुओं के निर्माण या उनकी गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके अलावा, कुछ आनुवंशिक समस्याएं और पहले हुई गंभीर बीमारियां भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकती हैं। इसलिए लगातार परेशानी होने पर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

6. बढ़ती उम्र का प्रभाव

आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों की प्रजनन क्षमता में भी कुछ बदलाव आने लगते हैं। अधिक उम्र में शुक्राणुओं की गतिशीलता और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, स्पर्म के डीएनए में नुकसान की आशंका भी बढ़ सकती है। हालांकि, पुरुषों में उम्र का असर महिलाओं की तरह किसी एक निश्चित उम्र पर अचानक नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है।

स्पर्म काउंट बेहतर रखने के लिए क्या करें?

पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए सबसे पहले अपनी जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए कुछ सामान्य आदतों में बदलाव किया जा सकता है।

  • संतुलित डाइट अपनाएं: रोजाना के भोजन में हरी सब्जियां, मौसमी फल, दालें, साबुत अनाज, मेवे और प्रोटीन से भरपूर चीजों को शामिल करें। पौष्टिक भोजन शरीर को जरूरी विटामिन और मिनरल प्रदान करता है।
  • वजन को नियंत्रित रखें: मोटापा हार्मोनल संतुलन और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए नियमित व्यायाम और संतुलित खानपान के जरिए स्वस्थ वजन बनाए रखने की कोशिश करें।
  • नशे से दूरी बनाएं: धूम्रपान और तंबाकू का सेवन छोड़ना फायदेमंद है। शराब का सेवन भी सीमित रखें या इससे दूरी बनाएं।
  • पर्याप्त नींद लें: रोजाना पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद लेना शरीर के सामान्य हार्मोनल संतुलन के लिए जरूरी है।
  • तनाव कम करें: योग, ध्यान, टहलना और अपनी पसंद की गतिविधियों के लिए समय निकालें। इससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
  • हानिकारक रसायनों से बचें: कामकाज के दौरान कीटनाशकों और औद्योगिक केमिकल के संपर्क में आने पर जरूरी सुरक्षा उपाय अपनाएं।
  • अत्यधिक गर्मी से बचाव करें: लंबे समय तक अंडकोष के आसपास बहुत अधिक गर्मी रहने वाली परिस्थितियों से बचने की कोशिश करें।

कब करानी चाहिए स्पर्म काउंट की जांच?

अगर किसी दंपती को नियमित रूप से प्रयास करने के बावजूद गर्भधारण में परेशानी हो रही है, तो पुरुषों को भी जांच कराने में संकोच नहीं करना चाहिए। फर्टिलिटी की समस्या केवल महिलाओं से जुड़ी नहीं होती। इसमें पुरुषों की प्रजनन क्षमता की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इसके लिए डॉक्टर सीमेन एनालिसिस यानी वीर्य की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इस टेस्ट में शुक्राणुओं की संख्या, उनकी गति और बनावट जैसी चीजों का आकलन किया जाता है। जरूरत पड़ने पर हार्मोन टेस्ट और अन्य जांच भी कराई जा सकती हैं।

ध्यान रखें कि स्पर्म काउंट में कमी हमेशा स्थायी समस्या नहीं होती। कुछ मामलों में इसके पीछे ऐसे कारण होते हैं, जिनका इलाज या प्रबंधन संभव है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के फर्टिलिटी बढ़ाने वाले सप्लीमेंट या दवाओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

पुरुषों के स्पर्म काउंट में पिछले पांच दशकों के दौरान दर्ज की गई गिरावट एक गंभीर स्वास्थ्य संकेत है। भारत में भी सामने आए आंकड़े इस विषय पर अधिक जागरूकता और शोध की जरूरत बताते हैं। स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और नशे से दूरी जैसे कदम संपूर्ण स्वास्थ्य के साथ-साथ प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

(Photo : AI Generated)