बांग्लादेश की जमीन से भारत की आवाजाही पर सियासी घमासान, ट्रांजिट रूट और गंगा जल समझौते को लेकर बढ़ा विवाद

बांग्लादेश की जमीन से भारत की आवाजाही पर सियासी घमासान, ट्रांजिट रूट और गंगा जल समझौते को लेकर बढ़ा विवाद

बांग्लादेश में भारत के साथ रिश्तों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इस बार विवाद की वजह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंच बनाने के लिए बांग्लादेश के रास्ते संभावित ट्रांजिट कॉरिडोर और गंगा जल समझौता है। बांग्लादेश की विपक्षी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेता नाहिद इस्लाम ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार पर आरोप लगाया है कि वह भारत को अपने देश के रास्ते आवाजाही की सुविधा देने की तैयारी कर रही है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत के हितों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

इस मुद्दे ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। नाहिद इस्लाम ने केवल ट्रांजिट कॉरिडोर का ही विरोध नहीं किया, बल्कि भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले गंगा जल समझौते को भी लेकर सरकार को चेतावनी दी है। उनका कहना है कि किसी भी नए समझौते में बांग्लादेश के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जनता इसका विरोध करेगी।

दरअसल, बांग्लादेश में यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब प्रधानमंत्री तारिक रहमान जापान के दौरे से लौटे हैं। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार, समुद्री संपर्क और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने पर बातचीत हुई थी। इसी के बाद बांग्लादेश के रास्ते भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंच बनाने की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई।

नाहिद इस्लाम ने सरकार को दी चेतावनी, भारत को रास्ता देने का लगाया आरोप

शुक्रवार को राजधानी ढाका में आयोजित एक रैली के दौरान नेशनल सिटिजन पार्टी के नेता नाहिद इस्लाम ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार को निशाने पर लिया। उन्होंने दावा किया कि सरकार बांग्लादेश के रास्ते भारत को ट्रांजिट कॉरिडोर उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है। नाहिद ने इस प्रस्ताव पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि देश की जमीन किसी दूसरे देश को इस्तेमाल करने के लिए नहीं दी जा सकती।

उन्होंने सरकार से इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग भी की। उनके मुताबिक, बांग्लादेश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से जुड़े किसी भी फैसले में जनता की भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। नाहिद का विरोध केवल किसी सड़क या परिवहन व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इसे देश के संसाधनों और क्षेत्रीय हितों से जोड़कर देख रहे हैं।

यहां समझना जरूरी है कि ट्रांजिट कॉरिडोर किसी देश के उस रास्ते या परिवहन नेटवर्क को कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल दूसरा देश अपने एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचने के लिए करता है। इसके जरिए सामान को सड़क, रेल या अन्य संपर्क मार्गों से कम दूरी में पहुंचाया जा सकता है। भारत के लिए बांग्लादेश का रास्ता विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

ढाका की सड़कों पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, महंगाई और ईंधन संकट भी बना मुद्दा

नाहिद इस्लाम की अगुवाई में ढाका में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार के खिलाफ बड़े स्तर पर प्रदर्शन भी किया गया। इस रैली में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने देश में बढ़ती महंगाई, बिजली की समस्या और पेट्रोल-डीजल के साथ गैस की कमी को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की।

लोगों का आरोप था कि आम जनता को रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ईंधन की उपलब्धता प्रभावित होने से परिवहन और दूसरे जरूरी कामों पर भी असर पड़ रहा है। प्रदर्शन के दौरान गृह मंत्री और ऊर्जा मंत्री को उनके पद से हटाने की मांग उठाई गई।

रैली में भारत के खिलाफ भी नारेबाजी देखने को मिली। प्रदर्शनकारियों ने ‘दिल्ली नहीं, ढाका-ढाका’ के नारे लगाए। इससे साफ हुआ कि ट्रांजिट कॉरिडोर का मुद्दा केवल आर्थिक या परिवहन व्यवस्था से जुड़ी चर्चा नहीं रह गया है, बल्कि इसे बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भी उठाया जा रहा है।

नाहिद इस्लाम ने इसी प्रदर्शन के दौरान गंगा जल समझौते पर भी सरकार को आगाह किया। उन्होंने कहा कि अगर भारत के साथ पुराने समझौते को नए सिरे से तैयार करते समय बांग्लादेश को उसके हिस्से का उचित पानी सुनिश्चित नहीं किया गया तो लोग इसके खिलाफ आंदोलन करेंगे।

जापान के मातरबाड़ी बंदरगाह से जुड़ी है पूरे विवाद की अहम कड़ी

भारत के संभावित ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर उठे विवाद के पीछे जापान और बांग्लादेश के बीच बढ़ता सहयोग भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 26 से 29 अक्टूबर तक जापान की यात्रा पर गए थे। इस दौरे में दोनों देशों ने बंगाल की खाड़ी के आसपास व्यापारिक गतिविधियों और परिवहन संपर्क को बेहतर बनाने पर सहमति जताई थी।

जापान बांग्लादेश में मातरबाड़ी नाम से एक बड़ा बंदरगाह विकसित कर रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य समुद्री व्यापार को बढ़ावा देना और सामान के आयात-निर्यात के लिए बेहतर सुविधाएं तैयार करना है। बंदरगाह के तैयार होने के बाद बांग्लादेश की समुद्री परिवहन क्षमता में बढ़ोतरी हो सकती है।

जापान की योजना से जुड़ी एक संभावना यह भी है कि मातरबाड़ी बंदरगाह को भारत के पूर्वोत्तर हिस्सों के साथ संपर्क मार्गों के जरिए जोड़ा जा सकता है। इसके लिए बांग्लादेश के भीतर मौजूद सड़कों और दूसरे परिवहन नेटवर्क का उपयोग किया जा सकता है।

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह व्यवस्था काफी उपयोगी साबित हो सकती है। फिलहाल इन राज्यों तक सामान पहुंचाने के लिए कई बार लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। बांग्लादेश के रास्ते संपर्क मिलने पर माल ढुलाई का समय और परिवहन खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा, इस तरह की कनेक्टिविटी से भारत को दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के नए अवसर भी मिल सकते हैं। यही वजह है कि क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था को आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, नाहिद इस्लाम ने इसी संभावित व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं।

बांग्लादेश सरकार का स्पष्टीकरण, जापान यात्रा में भारत से जुड़े मुद्दे पर चर्चा से इनकार

ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर विवाद बढ़ने के बीच बांग्लादेश सरकार की ओर से भी सफाई सामने आई है। देश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने शुक्रवार को कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की जापान यात्रा के दौरान भारत को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई थी।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, कबीर ने पत्रकारों से बातचीत में स्पष्ट किया कि जापान के साथ हुई चर्चा का दायरा बांग्लादेश और जापान के आपसी आर्थिक संबंधों तक ही सीमित था। उन्होंने कहा कि बातचीत में किसी तीसरे देश से जुड़े मुद्दे को शामिल नहीं किया गया।

विदेश मामलों के राज्य मंत्री ने यह भी कहा कि यदि किसी अन्य देश से संबंधित विषय पर चर्चा करने की जरूरत होती तो उस देश के प्रतिनिधियों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया जाता। उनके इस बयान को ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।

इस तरह बांग्लादेश सरकार ने जापान दौरे और भारत के संभावित ट्रांजिट रूट के बीच सीधे संबंध होने की बात से इनकार किया है। हालांकि, विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांग रहा है और आने वाले दिनों में यह विवाद और राजनीतिक रूप ले सकता है।

भारत ने भी जापान के साथ पूर्वोत्तर राज्यों के विकास पर सहयोग बढ़ाने की बात कही

इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत की ओर से भी जापान के साथ क्षेत्रीय सहयोग को लेकर अहम बयान दिया गया था। 28 अक्टूबर को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि भारत और जापान के बीच मजबूत साझेदारी है और दोनों देश इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उन्होंने बताया था कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से संबंधित कई परियोजनाओं में जापान के साथ सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। भारत इन योजनाओं को आगे बढ़ाना और दोनों देशों के बीच साझेदारी को अधिक मजबूत करना चाहता है।

यह बयान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची की मुलाकात के कुछ घंटे बाद आया था। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में बांग्लादेश के रास्ते किसी विशेष ट्रांजिट कॉरिडोर की घोषणा नहीं की थी।

भारत के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र का विकास काफी महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में बेहतर सड़क, परिवहन और व्यापारिक संपर्क विकसित होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा मिल सकता है। जापान के साथ सहयोग के जरिए बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को भी गति मिल सकती है।

गंगा जल समझौते की अवधि समाप्त होने से पहले दोनों देशों के सामने बड़ी चुनौती

ट्रांजिट कॉरिडोर के विवाद के साथ ही भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे का मामला भी चर्चा में है। दोनों देशों के बीच 12 दिसंबर 1996 को 30 वर्षों के लिए गंगा जल समझौता हुआ था। इस समझौते की अवधि 12 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रही है। ऐसे में अब इसके नवीनीकरण और भविष्य की शर्तों को लेकर बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है।

इस समझौते के तहत जनवरी से मई के बीच गंगा नदी के पानी का बंटवारा किया जाता है। यह साल का ऐसा समय होता है, जब नदी में पानी का स्तर अपेक्षाकृत कम रहता है। पश्चिम बंगाल स्थित फरक्का बैराज इस जल बंटवारे की व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है।

बांग्लादेश चाहता है कि नए समझौते की अवधि पहले की तुलना में अधिक लंबी हो। इसके साथ ही वह ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहा है, जिससे सूखे के मौसम में भी उसे पानी का निश्चित हिस्सा मिल सके। बांग्लादेश के लिए गंगा का पानी कृषि, सिंचाई और दूसरी जरूरतों के लिहाज से काफी अहम है।

वहीं, भारत का कहना है कि गंगा सहित दोनों देशों के बीच बहने वाली 54 साझा नदियों से संबंधित मामलों पर बातचीत के लिए संयुक्त नदी आयोग (JRC) मौजूद है। इस आयोग की स्थापना वर्ष 1972 में की गई थी। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच नदी जल से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और समन्वय स्थापित करना है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सितंबर में बताया था कि गंगा जल समझौते को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच तकनीकी स्तर पर बातचीत चल रही है। यानी समझौते की अवधि समाप्त होने से पहले इसके भविष्य को लेकर बातचीत जारी है।

दोनों देशों के रिश्तों के लिए क्यों अहम हैं ये दोनों मुद्दे?

भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, परिवहन और नदी जल का मुद्दा लंबे समय से द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। एक तरफ भारत के लिए बांग्लादेश के रास्ते पूर्वोत्तर राज्यों तक संपर्क बेहतर करना आर्थिक और रणनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है। दूसरी तरफ बांग्लादेश के लिए भारत के साथ व्यापारिक संबंध और जल बंटवारे की व्यवस्था सीधे तौर पर उसके राष्ट्रीय हितों से जुड़ी है।

मातरबाड़ी बंदरगाह और संभावित ट्रांजिट नेटवर्क से पूरे क्षेत्र में व्यापार को बढ़ावा देने की संभावनाएं हैं। लेकिन किसी भी ऐसी व्यवस्था के लिए दोनों देशों के बीच सहमति और स्पष्ट शर्तें जरूरी होंगी। वहीं, गंगा जल समझौते का नवीनीकरण भी आपसी विश्वास और बातचीत के आधार पर ही आगे बढ़ सकता है।

फिलहाल बांग्लादेश में विपक्ष ने इन दोनों विषयों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। सरकार जापान यात्रा में भारत से संबंधित चर्चा होने से इनकार कर चुकी है, जबकि भारत ने जापान के साथ पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े सहयोग को मजबूत करने की इच्छा जाहिर की है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रांजिट कॉरिडोर को लेकर उठे सवालों और गंगा जल समझौते के नवीनीकरण पर दोनों देश किस तरह आगे बढ़ते हैं।