फेफड़ों की सेहत के लिए सिर्फ सिगरेट से दूरी काफी नहीं, रोज की ये आदतें भी बन सकती हैं नुकसान की वजह

फेफड़ों की सेहत के लिए सिर्फ सिगरेट से दूरी काफी नहीं, रोज की ये आदतें भी बन सकती हैं नुकसान की वजह

फेफड़े हमारे शरीर के उन महत्वपूर्ण अंगों में शामिल हैं, जो हर पल हमें सांस लेने और शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करते हैं। आमतौर पर जब फेफड़ों की खराब सेहत की बात आती है, तो सबसे पहले स्मोकिंग का नाम लिया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि तंबाकू का धुआं फेफड़ों के लिए बेहद नुकसानदायक है और लंबे समय तक धूम्रपान करने से कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन केवल सिगरेट या बीड़ी से दूरी बना लेना ही फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।

हमारी रोजमर्रा की कई ऐसी आदतें हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहना, घर के भीतर धुएं और तेज केमिकल वाली चीजों का इस्तेमाल, शारीरिक गतिविधि से दूरी और सांस से जुड़ी परेशानियों को नजरअंदाज करना भी फेफड़ों पर असर डाल सकता है।

ऐसे में जरूरी है कि अपनी दिनचर्या में कुछ बदलाव किए जाएं और उन चीजों से बचने की कोशिश की जाए, जो लगातार सांस के जरिए शरीर के अंदर पहुंचकर फेफड़ों को प्रभावित कर सकती हैं। आइए जानते हैं ऐसी कौन-सी आदतें हैं, जिन्हें समय रहते बदलना जरूरी है।

घर के अंदर की हवा को लेकर लापरवाही न करें

अक्सर लोगों को लगता है कि प्रदूषण की समस्या केवल बाहर की हवा तक सीमित है, लेकिन ऐसा नहीं है। घर के अंदर की हवा की गुणवत्ता भी फेफड़ों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण होती है। अगर कमरों में पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं है, तो धूल, धुआं और अलग-अलग उत्पादों से निकलने वाले कण हवा में जमा हो सकते हैं।

रूम फ्रेशनर, परफ्यूम, खुशबूदार मोमबत्तियां, अगरबत्ती और मच्छर भगाने वाली कॉइल जैसी चीजों के इस्तेमाल से भी हवा में विभिन्न तरह के पदार्थ मिल सकते हैं। इनके संपर्क में लंबे समय तक रहने से कुछ लोगों को आंखों या गले में जलन, खांसी अथवा सांस से जुड़ी परेशानी महसूस हो सकती है।

इसके अलावा घर में जमा धूल और गंदगी भी एलर्जी की समस्या को बढ़ा सकती है। इसलिए कमरे की नियमित सफाई करना, धूल जमा न होने देना और जहां संभव हो वहां पर्याप्त हवा और रोशनी आने देना उपयोगी आदतें हैं। बंद कमरे में लंबे समय तक रहने के बजाय उचित वेंटिलेशन बनाए रखना भी जरूरी है।

दिनभर बैठे रहने की आदत भी बदलें

आजकल की जीवनशैली में शारीरिक गतिविधि काफी कम हो गई है। ऑफिस का काम हो या घर से काम करने की व्यवस्था, कई लोग लगातार कई घंटे कुर्सी पर बैठे रहते हैं। इसके बाद आने-जाने के लिए भी वाहन का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह दिन का बड़ा हिस्सा बिना पर्याप्त शारीरिक गतिविधि के गुजर जाता है।

नियमित एक्सरसाइज केवल वजन और मांसपेशियों के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि शरीर की समग्र फिटनेस और सांस लेने की क्षमता को बेहतर बनाए रखने में भी मदद करती है। पैदल चलना, तेज कदमों से वॉक करना, साइकिल चलाना या अपनी क्षमता के अनुसार कोई अन्य शारीरिक गतिविधि दिनचर्या में शामिल की जा सकती है।

अगर किसी व्यक्ति को थोड़ी सी गतिविधि करने पर ही असामान्य रूप से सांस फूलने लगे, तो इसे हमेशा केवल कमजोरी या फिटनेस की कमी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार ऐसा होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उचित रहता है।

दूसरे के धुएं से भी बचना जरूरी

अगर कोई व्यक्ति खुद सिगरेट, बीड़ी या अन्य तंबाकू उत्पादों का सेवन नहीं करता, तब भी वह धुएं के संपर्क में आ सकता है। इसे पैसिव स्मोकिंग या सेकेंडहैंड स्मोक के संपर्क के रूप में समझा जाता है।

जब कोई व्यक्ति आसपास धूम्रपान करता है, तो उसके द्वारा छोड़ा गया धुआं वातावरण में फैलता है और पास मौजूद लोग भी उसे सांस के जरिए अंदर ले सकते हैं। यानी धूम्रपान न करने वाला व्यक्ति भी तंबाकू के धुएं के संपर्क में आ सकता है।

लगातार सेकेंडहैंड स्मोक के संपर्क में रहना खास तौर पर बच्चों, बुजुर्गों और सांस से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। इसलिए घर, ऑफिस, कार या किसी बंद जगह पर धूम्रपान करने से बचना चाहिए और धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के आसपास लंबे समय तक रहने से भी दूरी बनानी चाहिए।

प्रदूषण से बचाव को हल्के में न लें

हवा में मौजूद धूल, धुआं और महीन प्रदूषक कण सांस लेते समय शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। सड़क पर वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्य के दौरान उड़ने वाली धूल और औद्योगिक क्षेत्रों में मौजूद प्रदूषक फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

शहरों में रहने वाले लोगों को कई बार लंबे समय तक ट्रैफिक और प्रदूषित हवा के संपर्क में रहना पड़ता है। ऐसे वातावरण में लगातार रहने से सांस संबंधी परेशानी वाले लोगों की समस्या बढ़ सकती है।

प्रदूषण अधिक होने पर बाहर निकलने का समय कम करना, भीड़भाड़ वाले और अत्यधिक प्रदूषित स्थानों से जहां संभव हो दूरी बनाना तथा स्थानीय वायु गुणवत्ता की स्थिति के अनुसार सावधानी बरतना मददगार हो सकता है। धूल या प्रदूषण वाले वातावरण में काम करने वालों के लिए उचित सुरक्षा उपाय अपनाना भी महत्वपूर्ण है।

खांसी-कफ को हमेशा सामान्य समझना सही नहीं

मौसम बदलने पर सर्दी-जुकाम या खांसी होना आम बात है, लेकिन अगर खांसी लंबे समय तक बनी रहती है, बार-बार लौटती है या उसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई देते हैं, तो इसे केवल सामान्य एलर्जी मानकर छोड़ देना ठीक नहीं है।

लगातार खांसी, कफ, सांस लेने में परेशानी, सीने में जकड़न या बार-बार सांस से जुड़ी समस्या किसी अंतर्निहित बीमारी या एलर्जी की ओर इशारा कर सकती है। हर खांसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो कारण का पता लगाना जरूरी है।

कई लोग शुरुआती लक्षणों को घरेलू उपायों से ठीक होने की उम्मीद में लंबे समय तक नजरअंदाज करते रहते हैं। इससे यदि वास्तव में किसी चिकित्सकीय जांच या उपचार की जरूरत हो, तो उसमें देरी हो सकती है। इसलिए लंबे समय तक बने रहने वाले या बार-बार होने वाले सांस संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

घर में धूल और एलर्जी पैदा करने वाली चीजों पर दें ध्यान

फेफड़ों की सेहत केवल सांस के जरिए बाहर से आने वाले धुएं पर निर्भर नहीं करती। घर का वातावरण भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर बिस्तर, पर्दे, कालीन, सोफा या कमरे के कोनों में लंबे समय तक धूल जमा होती रहे, तो संवेदनशील लोगों में एलर्जी के लक्षण पैदा हो सकते हैं।

घर की नियमित सफाई करते समय धूल को केवल एक जगह से दूसरी जगह उड़ाने के बजाय उसे सही तरीके से साफ करना चाहिए। बिस्तर और तकिए के कवर नियमित रूप से धोना, कमरे में अनावश्यक सामान कम रखना और धूल जमा होने वाली सतहों की सफाई करना उपयोगी हो सकता है।

जिन लोगों को पहले से धूल या किसी विशेष पदार्थ से एलर्जी होती है, उन्हें अपने ट्रिगर पहचानकर उनसे बचने की कोशिश करनी चाहिए।

शरीर को एक्टिव रखने के साथ सांस लेने की क्षमता पर भी ध्यान दें

फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए केवल कभी-कभार एक्सरसाइज करना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। पूरे दिन की जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, लगातार बैठे रहने के बीच थोड़ी देर उठकर चलना, छोटी दूरी के लिए पैदल जाना और रोज कुछ समय सक्रिय रहना अच्छी आदतें हो सकती हैं।

हालांकि, किसी व्यक्ति को पहले से सांस की बीमारी, सीने में दर्द या व्यायाम के दौरान गंभीर परेशानी होती है, तो बिना सलाह के कठिन एक्सरसाइज शुरू नहीं करनी चाहिए। अपनी उम्र, स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता के अनुसार गतिविधि चुनना बेहतर होता है।

फेफड़ों की सेहत के लिए दिनचर्या में छोटे बदलाव करें

फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए किसी एक चीज पर निर्भर रहने के बजाय पूरी जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी है। धूम्रपान से बचना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ पैसिव स्मोकिंग, प्रदूषण, घर के अंदर का धुआं और खराब वेंटिलेशन जैसी चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए।

रोजाना पर्याप्त शारीरिक गतिविधि करना, घर में साफ और हवादार वातावरण रखना तथा लंबे समय तक रहने वाली खांसी या सांस संबंधी समस्या को नजरअंदाज न करना भी जरूरी है। यदि कोई लक्षण लगातार बना रहता है या समय के साथ बढ़ रहा है, तो खुद से दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

कुल मिलाकर, फेफड़ों की देखभाल केवल तब शुरू नहीं करनी चाहिए जब कोई बीमारी सामने आ जाए। रोज की छोटी-छोटी आदतों में सुधार करके ऐसे कई जोखिमों को कम करने की कोशिश की जा सकती है, जो समय के साथ सांस और फेफड़ों की सेहत पर असर डाल सकते हैं।