भारत में 7-Eleven का सफर पड़ा भारी, रिलायंस रिटेल बंद कर सकता है ज्यादातर स्टोर

भारत में 7-Eleven का सफर पड़ा भारी, रिलायंस रिटेल बंद कर सकता है ज्यादातर स्टोर

भारत में कन्वीनियंस स्टोर के कारोबार को लेकर रिलायंस रिटेल और दुनिया की सबसे बड़ी कन्वीनियंस-स्टोर चेन 7-Eleven के बीच पांच साल से चली आ रही साझेदारी अब खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है। दोनों कंपनियों के बीच हुई फ्रेंचाइजी व्यवस्था के तहत देश में खोले गए करीब 60 स्टोर में से ज्यादातर को बंद करने की तैयारी चल रही है। बताया जा रहा है कि इन स्टोर्स का कारोबार लंबे समय से उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पा रहा था और लगातार हो रहे नुकसान ने इस फॉर्मेट की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में मामले से परिचित सूत्रों के हवाले से यह जानकारी सामने आई है। हालांकि, रिलायंस रिटेल और 7-Eleven की ओर से इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

सूत्रों के मुताबिक, कुछ स्टोर्स को बंद किए जाने से पहले वहां उपलब्ध माल को बेचकर स्टॉक खत्म किया जा रहा है। इसका मतलब है कि कंपनी कई जगहों पर चरणबद्ध तरीके से अपना संचालन समेट सकती है। इस घटनाक्रम के बाद 7-Eleven के सामने भारत में अपनी मौजूदगी को लेकर अगला रास्ता चुनने की चुनौती होगी। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी भारतीय बाजार में पूरी तरह से बाहर निकलने के बजाय किसी अन्य स्थानीय कारोबारी या भारतीय पार्टनर के साथ नई साझेदारी की संभावना तलाश सकती है। हालांकि, इस दिशा में अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

रिलायंस रिटेल और 7-Eleven ने वर्ष 2021 में हाथ मिलाया था। उस समय इस साझेदारी को भारत के तेजी से बदलते रिटेल बाजार में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। योजना यह थी कि रिलायंस के मजबूत रिटेल नेटवर्क, स्थानीय बाजार की समझ और सप्लाई चेन का फायदा उठाते हुए 7-Eleven अपने वैश्विक कन्वीनियंस स्टोर मॉडल को भारत में तेजी से विस्तार देगी। 7-Eleven पहले से ही दुनिया के कई देशों में अपने छोटे आकार के स्टोर्स के लिए जानी जाती है, जहां ग्राहकों को रोजमर्रा की जरूरत का सामान एक ही जगह पर आसानी से उपलब्ध कराया जाता है।

भारत में प्रवेश के समय इस मॉडल के लिए बाजार में काफी संभावनाएं दिखाई दे रही थीं। तेजी से शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और कामकाजी लोगों के बीच घर के पास तुरंत सामान खरीदने की जरूरत को देखते हुए कन्वीनियंस स्टोर को भविष्य के रिटेल कारोबार का अहम हिस्सा माना जा रहा था। लेकिन भारत का बाजार कई मायनों में दूसरे देशों से अलग साबित हुआ। यहां पहले से ही बड़ी संख्या में छोटे किराना दुकानदार मौजूद हैं, जो ग्राहकों को उनके घर के आसपास सामान उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में क्विक-कॉमर्स कंपनियों के तेजी से विस्तार ने इस प्रतिस्पर्धा को और कठिन बना दिया।

7-Eleven जैसे स्टोर की सबसे बड़ी चुनौती उसकी ऑपरेटिंग कॉस्ट रही। एक ब्रांडेड और संगठित कन्वीनियंस स्टोर को चलाने के लिए किराए, कर्मचारियों, बिजली, इन्वेंट्री, लॉजिस्टिक्स और अन्य संचालन संबंधी खर्चों पर काफी रकम खर्च होती है। दूसरी ओर, पारंपरिक किराना दुकानों का खर्च ढांचा अपेक्षाकृत कम होता है। स्थानीय दुकानदार सीमित जगह में कारोबार करते हैं और अपने ग्राहकों की स्थानीय जरूरतों के हिसाब से स्टॉक रखते हैं। इस वजह से वे कई मामलों में कम लागत पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम रहते हैं।

इस पूरे समीकरण में क्विक कॉमर्स का उभरना सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart जैसे प्लेटफॉर्म ग्राहकों को कुछ ही मिनटों में रोजमर्रा का सामान उनके घर तक पहुंचाने का विकल्प दे रहे हैं। ऐसे में किसी ग्राहक के लिए घर से निकलकर कन्वीनियंस स्टोर तक जाना और सामान खरीदकर वापस आना हमेशा आकर्षक विकल्प नहीं रह जाता। जिस सुविधा और तुरंत उपलब्धता को कन्वीनियंस स्टोर की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, वही सुविधा अब मोबाइल ऐप के जरिए घर तक पहुंच रही है।

वित्तीय आंकड़े भी इस कारोबार की चुनौती को स्पष्ट करते हैं। उपलब्ध फाइनेंशियल स्टेटमेंट के अनुसार, 7-India कन्वीनियंस रिटेल वेंचर ने मार्च 2026 में समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान लगभग 92 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया। इसके बावजूद कंपनी का नेट लॉस करीब 90 करोड़ रुपये रहा। यानी कारोबार से आने वाली आय और कंपनी के कुल खर्च के बीच बहुत बड़ा अंतर बना रहा। इतनी कमाई के मुकाबले इतना बड़ा घाटा इस बात का संकेत देता है कि स्टोर नेटवर्क को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना कंपनी के लिए आसान नहीं रहा।

7-Eleven की वैश्विक स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। इसकी जापानी पैरेंट कंपनी Seven & i Holdings दुनिया के कई बाजारों में बड़े पैमाने पर कन्वीनियंस स्टोर का संचालन करती है। कंपनी के नेटवर्क में दुनिया भर में 85,000 से अधिक स्टोर शामिल हैं। इस वजह से भारत में 7-Eleven की एंट्री को अंतरराष्ट्रीय रिटेल ब्रांड के लिए एक महत्वपूर्ण विस्तार के रूप में देखा गया था। लेकिन भारत में इस मॉडल को वैसी सफलता नहीं मिल सकी, जैसी दुनिया के कई अन्य बाजारों में मिली है।

कंज्यूमर सेक्टर कंसल्टेंसी Third Eyesight के फाउंडर और CEO देवांग्शु दत्ता के अनुसार, किसी भी रिटेल फॉर्मेट की सफलता के लिए सिर्फ ग्राहकों तक पहुंच बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लंबे समय तक कारोबार को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखना भी जरूरी है। उनका कहना है कि रिलायंस अलग-अलग चैनलों के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचने की कोशिश करती है, लेकिन आखिरकार किसी भी फॉर्मेट की व्यावसायिक स्थिरता सबसे महत्वपूर्ण होती है।

दत्ता ने यह भी बताया कि महामारी के बाद भारत में कन्वीनियंस स्टोर के सामने क्विक कॉमर्स से प्रतिस्पर्धा और ज्यादा बढ़ गई है। दोनों मॉडल काफी हद तक एक जैसे उत्पादों पर निर्भर करते हैं। दूध, ब्रेड, स्नैक्स, पेय पदार्थ, पैकेज्ड फूड, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और रोजमर्रा की दूसरी जरूरतों का सामान दोनों ही माध्यमों से ग्राहकों तक पहुंचता है। अंतर इतना है कि क्विक-कॉमर्स मॉडल में ग्राहक को घर से बाहर निकलने की जरूरत नहीं पड़ती।

भारत के रिटेल सेक्टर की एक और खासियत यहां मौजूद विशाल किराना नेटवर्क है। देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों छोटे दुकानदार स्थानीय ग्राहकों को लंबे समय से सामान उपलब्ध करा रहे हैं। इन दुकानों के साथ ग्राहकों के व्यक्तिगत संबंध भी होते हैं और कई जगहों पर उधार या स्थानीय डिलीवरी जैसी सुविधाएं भी मिल जाती हैं। इसलिए एक नए ब्रांडेड कन्वीनियंस स्टोर के लिए केवल आकर्षक स्टोर डिजाइन या अंतरराष्ट्रीय ब्रांड नाम के आधार पर ग्राहकों को लंबे समय तक अपने साथ जोड़ना आसान नहीं है।

रिलायंस रिटेल के लिए भी यह फैसला व्यापक रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कंपनी भारत के रिटेल बाजार में कई अलग-अलग फॉर्मेट के जरिए कारोबार करती है। सुपरमार्केट, हाइपरमार्केट, फैशन, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल कॉमर्स सहित कई क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी है। ऐसे में यदि किसी खास फॉर्मेट में लगातार नुकसान हो रहा है तो कंपनी के लिए अपने संसाधनों को अधिक लाभदायक कारोबारों की ओर स्थानांतरित करना स्वाभाविक रणनीति हो सकती है।

भारत में संगठित कन्वीनियंस रिटेल का कमजोर प्रदर्शन केवल 7-Eleven तक सीमित कहानी नहीं है। दुनिया के कई विकसित बाजारों में जहां ऐसे स्टोर रोजमर्रा की खरीदारी का महत्वपूर्ण