‘समृद्धि’ योजना से गर्भावस्था से प्रसव तक निगरानी, निजी अस्पताल भी बन सकेंगे उपचार का विकल्प

‘समृद्धि’ योजना से गर्भावस्था से प्रसव तक निगरानी, निजी अस्पताल भी बन सकेंगे उपचार का विकल्प

हरियाणा में गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नई पहल शुरू की है। अब गर्भावस्था के दौरान गंभीर या आपात स्थिति सामने आने पर महिला को केवल सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के बीच रेफर करने के बजाय जरूरत के अनुसार निजी अस्पताल में भी भर्ती कराया जा सकेगा। इसके लिए प्रत्येक गर्भवती महिला को उसकी स्वास्थ्य स्थिति और जोखिम की श्रेणी के आधार पर उपयुक्त स्वास्थ्य सुविधा केंद्र से जोड़ा जाएगा। यदि लाभार्थी की इच्छा हो तो निर्धारित मानकों के तहत निजी स्वास्थ्य केंद्र को भी उसके उपचार के लिए चुना जा सकेगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य आपात स्थिति में इलाज मिलने में लगने वाले समय को कम करना और गर्भवती महिलाओं को एक स्वास्थ्य केंद्र से दूसरे स्वास्थ्य केंद्र के बीच अनावश्यक रेफरल से बचाना है। खासतौर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से शुरू होने वाली बहुस्तरीय रेफरल प्रक्रिया को कम करने पर जोर दिया जाएगा, ताकि गंभीर स्थिति वाली महिला को बिना देरी किए उस स्तर की चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाया जा सके, जहां आवश्यक विशेषज्ञ और उपचार की व्यवस्था उपलब्ध हो।

स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव ने सोमवार को मातृ मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर में कमी लाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से प्रस्तावित ‘समृद्धि’ योजना का शुभारंभ करते हुए यह जानकारी दी। इस पहल का पूरा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं की पहचान, जोखिम के आकलन, उपचार, प्रसव और प्रसव के बाद मां तथा नवजात की देखभाल को एक समन्वित व्यवस्था के तहत लाना है।

गर्भावस्था से प्रसव के बाद तक रहेगी निगरानी

‘समृद्धि’ को तकनीक आधारित स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली के रूप में तैयार किया गया है। इसके माध्यम से राज्य में गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों की लगातार निगरानी की जाएगी। योजना का सबसे बड़ा फोकस उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान और समय रहते उनका उपचार सुनिश्चित करने पर रहेगा।

इस प्रणाली के तहत गर्भवती महिला के प्रसवपूर्व पंजीकरण से लेकर उसके प्रसव और बच्चे के जन्म के बाद 42 दिनों तक की स्वास्थ्य देखभाल को एक ही निगरानी व्यवस्था से जोड़ा जाएगा। इसका मतलब यह होगा कि महिला के स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी अलग-अलग स्तरों पर बिखरी रहने के बजाय एकीकृत व्यवस्था में उपलब्ध रहेगी।

इससे स्वास्थ्य विभाग को यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि किस गर्भवती महिला को नियमित जांच की जरूरत है, किस महिला को विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह चाहिए और किन मामलों में तत्काल उपचार या उच्च स्तर के स्वास्थ्य केंद्र में रेफरल की आवश्यकता है।

हर गर्भवती महिला का पोर्टल पर पंजीकरण जरूरी

‘समृद्धि’ व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मुख्यालय में समृद्धि पोर्टल और राज्य कमान केंद्र स्थापित किया जा रहा है। इसके साथ ही समर्पित 102 कॉल सेंटर की व्यवस्था की जाएगी। प्रत्येक जिला अस्पताल में भी जिला कॉल सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं।

योजना के तहत हर गर्भवती महिला का समृद्धि पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य होगा। पंजीकरण के बाद महिला को एक विशिष्ट समृद्धि पहचान संख्या दी जाएगी। इस पहचान के माध्यम से गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी की जा सकेगी।

यह व्यवस्था सरकारी और निजी दोनों स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं पर नजर रखने में मदद करेगी। इससे यह भी पता लगाया जा सकेगा कि पंजीकृत महिला ने समय पर प्रसवपूर्व जांच कराई या नहीं, उसे आवश्यक परामर्श मिला या नहीं और प्रसव की तैयारी निर्धारित समय के अनुसार हो रही है या नहीं।

स्वचालित संदेश से स्वास्थ्यकर्मियों को मिलेगी जानकारी

समृद्धि पोर्टल में स्वचालित चेतावनी और निर्धारित कार्यों की सूची की व्यवस्था भी की जा रही है। इसके माध्यम से सहायक नर्स दाई और चिकित्सा अधिकारियों को समय पर जरूरी कार्रवाई के लिए सूचना मिल सकेगी।

यदि किसी गर्भवती महिला की जांच, फॉलो-अप या प्रसव से जुड़ी कोई महत्वपूर्ण गतिविधि लंबित रहती है तो स्वास्थ्यकर्मियों को उसकी जानकारी उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे स्वास्थ्य विभाग का प्रयास रहेगा कि किसी महिला की जरूरी जांच या उपचार केवल इसलिए न छूटे क्योंकि उसकी निगरानी समय पर नहीं हो पाई।

इस तकनीकी व्यवस्था से स्वास्थ्यकर्मियों के लिए उच्च जोखिम वाले मामलों को प्राथमिकता के आधार पर देखना आसान होगा। साथ ही गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को लगातार अपडेट रखने में भी मदद मिलेगी।

उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की शुरुआती पहचान पर जोर

योजना के तहत उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान को विशेष महत्व दिया जाएगा। ऐसी महिलाओं को गर्भावस्था के शुरुआती चरण में ही उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन और उपचार के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत आयोजित होने वाले शिविरों में भेजा जाएगा।

प्रत्येक उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दसवें से बारहवें सप्ताह के बीच उपयुक्त नैदानिक जांच और प्रबंधन के लिए शिविर में भेजने की व्यवस्था की जाएगी। इसका उद्देश्य गर्भावस्था की शुरुआत में ही संभावित जटिलताओं की पहचान करना है, ताकि बाद के महीनों में आपात स्थिति पैदा होने की संभावना को कम किया जा सके।

स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए केवल प्रसव के समय बेहतर उपचार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। गर्भावस्था के शुरुआती चरण से महिला की नियमित निगरानी, जोखिम की पहचान और समय पर उपचार भी उतना ही जरूरी है।

रेफरल व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश

‘समृद्धि’ योजना में रेफरल व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। वर्तमान में कई मामलों में गर्भवती महिला को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फिर उपमंडल अस्पताल और उसके बाद जिला अस्पताल या अन्य उच्च स्वास्थ्य केंद्र में भेजना पड़ता है।

यदि महिला की स्थिति गंभीर हो तो इस तरह के कई स्तरों वाले रेफरल में समय लग सकता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिला की स्थिति के अनुसार पहले से ही उपयुक्त स्वास्थ्य सुविधा की पहचान कर ली जाए।

जो महिला जिस जोखिम श्रेणी में होगी, उसे उसी के अनुरूप स्वास्थ्य सुविधा केंद्र से जोड़ा जाएगा। इससे गंभीर स्थिति में इलाज के लिए अस्पताल तलाशने या बार-बार रेफर किए जाने में लगने वाला समय कम किया जा सकेगा।

जरूरत और लाभार्थी के अनुरोध के अनुसार निजी स्वास्थ्य केंद्र को भी उपचार के लिए टैग किए जाने की संभावना इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहलू है। इससे आपातकालीन स्थिति में उपचार के विकल्प बढ़ेंगे और मरीज को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

हरियाणा में 101 प्रथम रेफरल इकाइयां

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन हरियाणा के मिशन निदेशक डा. आरएस ढिल्लों ने बताया कि राज्य में कुल 101 प्रथम रेफरल इकाइयां हैं। इन स्वास्थ्य संस्थानों का उद्देश्य प्राथमिक स्तर से आगे ऐसी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है, जहां गंभीर मरीजों को आवश्यक विशेषज्ञ सेवाएं मिल सकें।

हालांकि विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण 11 प्रथम रेफरल इकाइयों में अपेक्षित स्तर की सेवाएं उपलब्ध कराने में दिक्कत आ रही थी। विभाग ने अब इस कमी को दूर करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती की प्रक्रिया तेज कर दी है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए हर बुधवार को वॉक-इन और वर्चुअल साक्षात्कार आयोजित किए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के तहत 84 विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति को अंतिम रूप दिया जा चुका है। इससे आने वाले समय में प्रथम रेफरल इकाइयों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है।

11 स्वास्थ्य केंद्रों में सप्ताह में दो दिन विशेषज्ञ सेवाएं

स्वास्थ्य विभाग ने 11 स्वास्थ्य केंद्रों में बुधवार और शनिवार को विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है। इन केंद्रों पर स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और एनेस्थेटिस्ट मौजूद रहेंगे।

इस व्यवस्था का सीधा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों को स्थानीय स्तर पर बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है। विशेषज्ञों की उपलब्धता से सामान्य मामलों के उपचार के साथ-साथ जटिल गर्भावस्थाओं की पहचान और प्रबंधन में भी मदद मिलेगी।

जिन स्वास्थ्य केंद्रों को इस व्यवस्था में शामिल किया गया है, उनमें अंबाला जिले का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चौरमस्तपुर, भिवानी का उपमंडल अस्पताल लोहारू, फतेहाबाद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भट्टू कलां और भूना, गुरुग्राम का उपमंडल अस्पताल पटौदी, झज्जर का उपमंडल अस्पताल मातनहेल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छारू शामिल हैं।

इसके अलावा जींद का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अलेवा, नूंह का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पिनगवां तथा रेवाड़ी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बावल और नाहर को भी इस व्यवस्था में शामिल किया गया है।

विशेषज्ञ सेवाओं से जिला अस्पतालों का बोझ घटाने की कोशिश

स्वास्थ्य विभाग की इस पहल से जिला स्तर के बड़े अस्पतालों पर अनावश्यक मरीजों का दबाव कम करने की भी उम्मीद है। यदि सामुदायिक और उपमंडल स्तर पर ही स्त्री रोग, बाल रोग और एनेस्थीसिया से जुड़ी विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध होंगी तो कई मामलों में मरीज को आगे रेफर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

वहीं जिन महिलाओं को वास्तव में उच्च स्तर की चिकित्सा सुविधा की जरूरत होगी, उन्हें शुरुआत में ही उचित स्वास्थ्य केंद्र से जोड़ा जा सकेगा। इससे गंभीर मामलों में समय की बचत होगी और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जा सकेगा।

मातृ और नवजात मृत्यु दर कम करना प्रमुख लक्ष्य

‘समृद्धि’ योजना का मूल उद्देश्य राज्य में मातृ मृत्यु और नवजात मृत्यु की घटनाओं को कम करना है। इसके लिए गर्भावस्था की शुरुआत से लेकर प्रसव के बाद की अवधि तक लगातार निगरानी और समय पर स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।

प्रसव के बाद 42 दिनों तक मां और नवजात की निगरानी भी इसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। इस अवधि में मां और बच्चे दोनों को कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में प्रसव के बाद भी स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी जारी रहने से किसी समस्या की समय रहते पहचान और उपचार संभव हो सकेगा।

नई व्यवस्था में तकनीक, स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी, विशेषज्ञ सेवाओं और सरकारी तथा निजी स्वास्थ्य केंद्रों के बीच समन्वय को एक साथ जोड़ा जा रहा है। सरकार को उम्मीद है कि इससे गर्भवती महिलाओं को समय पर उपचार उपलब्ध कराने और उच्च जोखिम वाले मामलों को बेहतर ढंग से संभालने में मदद मिलेगी।

कुल मिलाकर ‘समृद्धि’ योजना के जरिए हरियाणा में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संगठित और जवाबदेह बनाने की कोशिश की जा रही है। गर्भवती महिला के पंजीकरण से लेकर प्रसव और उसके बाद 42 दिनों तक निगरानी, जोखिम के आधार पर स्वास्थ्य केंद्र से जोड़ने की व्यवस्था, आपात स्थिति में निजी अस्पताल का विकल्प और 11 स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता को इस पहल के प्रमुख हिस्सों के रूप में देखा जा रहा है। यदि व्यवस्था निर्धारित तरीके से लागू होती है तो दूरदराज के क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं को भी समय पर विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।