हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए मिड-डे मील तैयार करने वाले रसोइयों के लिए सरकार ने बड़ी राहत की दिशा में कदम उठाया है। राज्य शिक्षा विभाग ने कुक्स के मासिक मानदेय को बढ़ाकर 6,000 रुपये करने के लिए सभी जिलों को बजट उपलब्ध करा दिया है। विभाग की ओर से जिला स्तर के अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिसके बाद अब पात्र रसोइयों को बढ़ा हुआ मानदेय मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
शिक्षा विभाग ने प्रदेश के सभी जिला मौलिक शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने जिलों में सरकारी स्कूलों में कार्यरत मिड-डे मील कुक्स की वास्तविक संख्या के आधार पर 6,000 रुपये प्रति माह की मानदेय सीमा निर्धारित करें। इसके लिए विभागीय स्तर पर आवश्यक प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरियां पहले ही जारी की जा चुकी हैं।
सरकार के इस फैसले का सीधा लाभ उन हजारों रसोइयों को मिलने की उम्मीद है जो सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए रोजाना भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी निभाते हैं। मिड-डे मील योजना के तहत इन कर्मचारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बच्चों को निर्धारित समय पर भोजन उपलब्ध कराने की पूरी प्रक्रिया में कुक्स की अहम भागीदारी रहती है।
शिक्षा विभाग की ओर से जारी निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मानदेय का भुगतान संबंधित रसोइयों की उपस्थिति और उनके द्वारा किए गए कार्य दिवसों के आधार पर किया जाएगा। स्कूलों के आहरण एवं संवितरण अधिकारियों यानी DDOs को कहा गया है कि भुगतान में अनावश्यक देरी न हो और निर्धारित राशि सीधे कर्मचारियों के बैंक खातों में ट्रांसफर की जाए।
इस व्यवस्था का उद्देश्य भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना और रसोइयों को समय पर उनकी मेहनत का पैसा उपलब्ध कराना है। विभाग ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि स्कूलों में तैनात कुक्स की संख्या, उनकी उपस्थिति और कार्य दिवसों से संबंधित रिकॉर्ड सही तरीके से तैयार किया जाए, ताकि मानदेय जारी करने में किसी तरह की परेशानी न आए।
सरकार की ओर से किए गए इस बदलाव के बाद अब रसोइयों को उनके काम की अवधि के अनुसार 6,000 रुपये तक का मासिक मानदेय मिलेगा। यानी जिस अवधि में वे स्कूल में उपस्थित रहकर मिड-डे मील तैयार करेंगे, उसी के आधार पर भुगतान की गणना की जाएगी। विभागीय निर्देशों के मुताबिक मानदेय का भुगतान उनकी वास्तविक उपस्थिति और कार्य दिवसों से जुड़ा रहेगा।
मिड-डे मील व्यवस्था में काम करने वाले रसोइये सुबह से ही स्कूलों में पहुंचकर भोजन तैयार करने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। बच्चों की संख्या के हिसाब से खाद्य सामग्री तैयार करना, भोजन पकाना, निर्धारित समय पर उसे उपलब्ध करवाना और खाना तैयार करने से जुड़े अन्य कार्यों में उनकी जिम्मेदारी रहती है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के संचालन में इन कर्मचारियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
रसोइयों के मानदेय में बढ़ोतरी लंबे समय से आर्थिक राहत की जरूरत महसूस कर रहे इस वर्ग के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बढ़ती महंगाई के बीच कम मानदेय पर काम करने वाले मिड-डे मील कुक्स के लिए मासिक आय में वृद्धि उनके घरेलू खर्चों को संभालने में मददगार हो सकती है।
शिक्षा विभाग ने बजट आवंटन के साथ ही जिला अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय कर दी है। प्रत्येक जिले में स्कूलों की संख्या और वहां काम कर रहे कुक्स के आधार पर आवश्यक बजट सीमा तय की जाएगी। इसके बाद संबंधित स्कूलों के DDOs भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे।
विभागीय स्तर पर प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति जारी होने के बाद अब जिला स्तर पर प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे बजट आवंटन के अनुसार अपने अधीन आने वाले स्कूलों में कार्यरत सभी पात्र रसोइयों की जानकारी का मिलान करें और उसी आधार पर मानदेय जारी करने की व्यवस्था करें।
सरकार के इस कदम को स्कूल शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों के कल्याण की दिशा में भी देखा जा रहा है। मिड-डे मील योजना केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया जाता है। भोजन की गुणवत्ता और समय पर वितरण सुनिश्चित करने में कुक्स की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
कुक्स की संख्या अलग-अलग जिलों में स्कूलों और विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर अलग होती है। इसलिए शिक्षा विभाग ने सभी जिलों को अलग-अलग बजट सीमा तय करने के निर्देश दिए हैं। इससे भुगतान वास्तविक तैनाती के आधार पर करने में सुविधा होगी और अनावश्यक वित्तीय विसंगतियों की संभावना कम होगी।
विभाग ने भुगतान प्रक्रिया को सीधे बैंक खातों से जोड़ने पर भी जोर दिया है। इससे रसोइयों को मानदेय प्राप्त करने के लिए किसी मध्यस्थ पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। साथ ही भुगतान की प्रक्रिया का रिकॉर्ड भी आसानी से उपलब्ध रहेगा।
अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि मानदेय जारी करने से पहले संबंधित स्कूलों में कुक्स की उपस्थिति और कार्य दिवसों का रिकॉर्ड ठीक से सत्यापित किया जाए। इससे वास्तविक रूप से काम करने वाले कर्मचारियों को निर्धारित राशि समय पर मिल सकेगी।
सरकार के फैसले से प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कार्यरत मिड-डे मील कुक्स के बीच भी राहत की उम्मीद जगी है। लंबे समय से स्कूलों में भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी संभाल रहे इन कर्मचारियों के लिए मानदेय में बढ़ोतरी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम हो सकती है।
इस फैसले का असर केवल कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रहेगा। यदि रसोइयों को समय पर और उचित मानदेय मिलता है तो स्कूलों में मिड-डे मील व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है। नियमित भुगतान से कर्मचारियों में स्थायित्व और काम के प्रति उत्साह बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है।
शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि मानदेय का भुगतान उपस्थिति और कार्य दिवसों के आधार पर किया जाएगा। इसलिए सभी संबंधित स्कूल अधिकारियों को रिकॉर्ड संधारण और भुगतान प्रक्रिया में सावधानी बरतने को कहा गया है। जिला स्तर के अधिकारियों को भी इस प्रक्रिया की निगरानी करनी होगी ताकि बजट का सही इस्तेमाल हो और किसी पात्र कर्मचारी का भुगतान लंबित न रहे।
हरियाणा सरकार की ओर से उठाए गए इस कदम को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए पोषण और शिक्षा दोनों को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। मिड-डे मील योजना में रसोइयों की भागीदारी प्रत्यक्ष रूप से विद्यार्थियों तक पहुंचने वाली सेवा से जुड़ी है। ऐसे में उनके मानदेय में बढ़ोतरी से योजना से जुड़े मानव संसाधन को भी आर्थिक समर्थन मिलेगा।
अब जिला मौलिक शिक्षा अधिकारियों और स्कूल स्तर के DDOs के सामने यह जिम्मेदारी है कि वे विभाग के निर्देशों के अनुसार बजट सीमा निर्धारित कर भुगतान की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करें। यदि सभी स्तरों पर निर्देशों का सही तरीके से पालन किया जाता है तो प्रदेशभर के हजारों मिड-डे मील कुक्स को बढ़े हुए मानदेय का लाभ मिलने लगेगा।
कुल मिलाकर हरियाणा शिक्षा विभाग का यह फैसला सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील तैयार करने वाले रसोइयों के लिए आर्थिक राहत का महत्वपूर्ण कदम है। 6,000 रुपये के मानदेय के लिए सभी जिलों को बजट जारी होने के बाद अब भुगतान प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। सरकार ने सीधे बैंक खातों में भुगतान, उपस्थिति के आधार पर मानदेय और जिला स्तर पर बजट प्रबंधन की व्यवस्था के जरिए पूरी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की कोशिश की है।




