हिमाचल प्रदेश में वन विभाग के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी, IFS अधिकारियों के कैडर में कटौती का प्रस्ताव
हिमाचल प्रदेश सरकार वन विभाग की कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी, व्यावहारिक और फील्ड-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से प्रशासनिक ढांचे में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रही है। सरकार भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service-IFS) अधिकारियों के स्वीकृत कैडर की समीक्षा कर रही है और अधिकारियों की संख्या में कमी लाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज चुकी है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो प्रदेश के वन प्रशासन में कई स्तरों पर संरचनात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
राज्य सरकार का मानना है कि वन विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी जंगलों का संरक्षण, जैव विविधता की सुरक्षा, अवैध कटान पर नियंत्रण और वन्यजीवों की निगरानी है। इन कार्यों का अधिकांश हिस्सा फील्ड स्तर पर होता है। ऐसे में प्रशासनिक पदों की संख्या कम करके फील्ड स्टाफ को मजबूत बनाना विभाग की कार्यक्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में आईएफएस अधिकारियों की स्वीकृत कैडर स्ट्रेंथ 114 है। प्रस्तावित पुनर्गठन के तहत इसे घटाकर 83 करने की योजना बनाई गई है। यानी कुल 31 पदों में कमी की जा सकती है। राज्य सरकार ने इस संबंध में विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेज दिया है। अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद ही लागू होगा।
वन विभाग की कार्यप्रणाली को अधिक फील्ड-केंद्रित बनाने पर जोर
वन विभाग का मानना है कि जंगलों की वास्तविक सुरक्षा कार्यालयों की बजाय फील्ड स्तर पर तैनात कर्मचारियों के माध्यम से होती है। वन रक्षक, वन बीट अधिकारी, रेंज अधिकारी और अन्य फील्ड कर्मचारी प्रतिदिन जंगलों की निगरानी करते हैं, अवैध कटान रोकते हैं, वन्यजीव गतिविधियों पर नजर रखते हैं और स्थानीय समुदायों के साथ समन्वय स्थापित करते हैं।
सरकार का तर्क है कि यदि संसाधनों का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक ढांचे पर खर्च होने के बजाय फील्ड तंत्र को मजबूत करने में लगाया जाए तो वन संरक्षण से जुड़े परिणाम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। इसी सोच के आधार पर विभागीय पुनर्गठन की दिशा में काम किया जा रहा है।
31 आईएफएस पद कम करने का प्रस्ताव क्यों तैयार किया गया?
सरकारी स्तर पर तैयार किए गए प्रस्ताव के अनुसार आईएफएस अधिकारियों की संख्या वर्तमान आवश्यकता की तुलना में अधिक मानी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि पिछले कई वर्षों में विभाग की कार्यशैली, तकनीकी संसाधन और निगरानी व्यवस्था में बदलाव आया है। डिजिटल मॉनिटरिंग, जीआईएस मैपिंग, सैटेलाइट इमेजरी और ऑनलाइन रिपोर्टिंग जैसी व्यवस्थाओं के कारण प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी परिवर्तन आया है।
इसी आधार पर कैडर स्ट्रेंथ की समीक्षा की गई और सुझाव दिया गया कि कुछ प्रशासनिक पदों को कम करते हुए संसाधनों का उपयोग उन क्षेत्रों में किया जाए जहां सीधे वन संरक्षण का कार्य होता है। प्रस्ताव के अनुसार 114 की जगह 83 आईएफएस अधिकारियों का कैडर पर्याप्त माना जा सकता है।
मुख्यमंत्री की बैठक में प्रशासनिक सुधारों पर हुई चर्चा
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाल ही में वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर विभाग की वर्तमान संरचना, कार्य प्रणाली और भविष्य की आवश्यकताओं की समीक्षा की। बैठक में अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) कमलेश कुमार पंत, प्रधान मुख्य अरण्यपाल संजय सूद सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
बैठक के दौरान अधिकारियों से ऐसा प्रशासनिक मॉडल तैयार करने को कहा गया जिससे विभाग की कार्यक्षमता बढ़े, निर्णय प्रक्रिया अधिक तेज हो और प्रशासनिक खर्च में कमी लाई जा सके। सरकार चाहती है कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अधिक परिणाम देने वाली गतिविधियों पर किया जाए।
जिलों में डीएफओ की संख्या घटाने पर भी विचार
प्रस्तावित बदलाव केवल आईएफएस कैडर तक सीमित नहीं हैं। सरकार जिलों में डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) की संख्या की भी समीक्षा कर रही है। प्रस्ताव के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में प्रत्येक जिले में एक डीएफओ की तैनाती पर्याप्त मानी जा रही है।
हालांकि जिन जिलों का भौगोलिक क्षेत्र बड़ा है, जहां वन क्षेत्र अधिक है या जहां राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य स्थित हैं, वहां आवश्यकता के अनुसार दो डीएफओ स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति की जा सकती है। इसका उद्देश्य संसाधनों का संतुलित उपयोग करना बताया जा रहा है।
सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि जिस प्रकार एक उपायुक्त पूरे जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करता है, उसी प्रकार वन विभाग में भी सीमित प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है।
फील्ड स्टाफ की संख्या बढ़ाने पर रहेगा विशेष फोकस
सरकार की प्राथमिकता अब फील्ड स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों की संख्या और क्षमता बढ़ाने की है। वन विभाग का मानना है कि जंगलों की सुरक्षा, अवैध कटान रोकना, वनाग्नि नियंत्रण, पौधारोपण कार्यक्रमों की निगरानी और वन्यजीव संरक्षण जैसे अधिकांश कार्य जमीनी स्तर पर तैनात कर्मचारियों द्वारा किए जाते हैं।
इसी कारण भविष्य में वन रक्षक, रेंज ऑफिसर (RO), बीट स्टाफ और अन्य फील्ड कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। इससे वन क्षेत्रों की नियमित निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता मजबूत होने की संभावना है।
केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का भी लिया गया आधार
बैठक के दौरान यह तथ्य भी सामने रखा गया कि हर समय लगभग 15 से 20 आईएफएस अधिकारी विभिन्न केंद्रीय संस्थानों या अन्य विभागों में प्रतिनियुक्ति पर रहते हैं। इसके बावजूद प्रदेश में वन विभाग का नियमित प्रशासनिक कार्य प्रभावित नहीं होता।
सरकार का मानना है कि यदि प्रतिनियुक्ति के दौरान भी विभाग सामान्य रूप से कार्य करता है, तो वर्तमान कैडर की वास्तविक आवश्यकता का पुनर्मूल्यांकन किया जा सकता है। इसी तर्क के आधार पर कैडर स्ट्रेंथ में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
1980 के दशक के प्रशासनिक मॉडल का भी किया गया अध्ययन
वन विभाग के पुनर्गठन पर चर्चा के दौरान पुराने प्रशासनिक ढांचे का भी अध्ययन किया गया। अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 1984 से 1990 के बीच हिमाचल प्रदेश में आईएफएस अधिकारियों की संख्या लगभग 85 से 90 के बीच थी। उस समय सीमित अधिकारियों के बावजूद विभाग प्रभावी ढंग से कार्य कर रहा था।
उस अवधि में वन संरक्षण, प्रशासनिक नियंत्रण और फील्ड मॉनिटरिंग को संतुलित माना जाता था। सरकार अब उसी अनुभव को आधुनिक तकनीक और वर्तमान आवश्यकताओं के साथ जोड़कर नया प्रशासनिक मॉडल विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
वन विभाग में वर्तमान मानव संसाधन की स्थिति
उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश वन विभाग में कुल 8011 स्वीकृत पद हैं। इनमें विभिन्न स्तरों के अधिकारी और कर्मचारी शामिल हैं।
इनमें लगभग 322 राजपत्रित अधिकारी कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त द्वितीय श्रेणी के करीब 300 कर्मचारी, तृतीय श्रेणी के 4447 कर्मचारी तथा चतुर्थ श्रेणी के लगभग 2942 कर्मचारी विभाग की विभिन्न इकाइयों में सेवाएं दे रहे हैं।
आईएफएस अधिकारियों की मौजूदा कैडर स्ट्रेंथ 114 है, जबकि हिमाचल वन सेवा (HFS) अधिकारियों की स्वीकृत संख्या 160 है। यदि आईएफएस कैडर में कमी लागू होती है तो भविष्य में एचएफएस अधिकारियों की पदोन्नति, जिम्मेदारियों और प्रशासनिक संरचना पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
वन संरक्षण की बदलती चुनौतियों के बीच पुनर्गठन की आवश्यकता
वन विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में वन विभाग की जिम्मेदारियां पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो चुकी हैं। जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष, वनाग्नि प्रबंधन, इको-टूरिज्म, जल संरक्षण और कार्बन संरक्षण जैसी नई चुनौतियां भी सामने हैं।
इन परिस्थितियों में प्रशासनिक ढांचे का समय-समय पर मूल्यांकन आवश्यक माना जाता है ताकि विभाग नई चुनौतियों के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सके। आधुनिक तकनीक के उपयोग और फील्ड आधारित निगरानी व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रशासनिक खर्च कम करने की रणनीति
राज्य सरकार इस प्रस्ताव को अपने व्यापक “व्यवस्था परिवर्तन” अभियान से जोड़कर देख रही है। सरकार का उद्देश्य केवल पदों में कटौती करना नहीं बल्कि उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना है। यदि प्रशासनिक व्यय में कमी आती है तो उन संसाधनों को वन संरक्षण, पौधारोपण, निगरानी तंत्र, आधुनिक उपकरणों और फील्ड स्टाफ की क्षमता बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में लगाया जा सकता है।
हालांकि विभाग के भीतर इस प्रस्ताव को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि इससे निर्णय प्रक्रिया सरल और तेज होगी, जबकि कुछ का कहना है कि भविष्य में अधिकारियों की संख्या कम होने से कार्यभार बढ़ सकता है। इसलिए अंतिम निर्णय लेते समय प्रशासनिक आवश्यकताओं, भौगोलिक परिस्थितियों, वन क्षेत्र के आकार और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।
केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद आगे बढ़ेगी प्रक्रिया
चूंकि भारतीय वन सेवा अखिल भारतीय सेवा का हिस्सा है, इसलिए कैडर स्ट्रेंथ में किसी भी प्रकार का बदलाव केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद ही लागू किया जा सकता है। राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर संबंधित मंत्रालय स्तर पर समीक्षा की जाएगी। मंजूरी मिलने के बाद नई कैडर संरचना, पदों के पुनर्गठन, जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण और फील्ड तंत्र को मजबूत करने से संबंधित आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू की जाएगी।




