मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव अब केवल सैन्य या कूटनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। सबसे ज्यादा चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जताई जा रही है, जो वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई का सबसे अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। ईरान की ओर से इस रणनीतिक रास्ते को बंद किए जाने की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचैनी बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अगर तेल की सप्लाई प्रभावित होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आता है, तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। बढ़ती तेल कीमतों से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी ऊपर जा सकती हैं। महंगाई बढ़ने का असर आम लोगों की जेब पर तो पड़ेगा ही, साथ ही कंपनियों के खर्च में भी इजाफा होगा।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि ब्रेंट क्रूड की कीमत लगातार 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है या उससे अधिक पहुंचती है, तो भारतीय शेयर बाजार में दबाव और बढ़ सकता है। निवेशकों का रुख सतर्क हो सकता है और बिकवाली बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हाल के कारोबारी सत्रों में भी बाजार में कमजोरी देखने को मिली है, जिसे निवेशक वैश्विक अनिश्चितताओं से जोड़कर देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए नए हवाई हमलों के बाद हुई। इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का फैसला लिया, जिसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है। दूसरी ओर अमेरिका लगातार इस समुद्री रास्ते को दोबारा खोलने की मांग कर रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है।
भारतीय बाजार पर इसका प्रभाव कई स्तरों पर देखने को मिल सकता है। सबसे पहले रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका है। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तब भारत को आयात पर अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो सकता है। कमजोर रुपये के कारण आयातित वस्तुएं और अधिक महंगी हो जाती हैं, जिससे महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
विदेशी निवेशकों की रणनीति भी आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। जुलाई महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में अच्छी-खासी खरीदारी की है, जिससे बाजार को मजबूती मिली थी। हालांकि बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं या युद्ध जैसे हालात पैदा होते हैं, तो विदेशी निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय बाजार से पूंजी निकासी तेज हो सकती है, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
तेल की बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ सकता है जिनकी लागत सीधे ईंधन पर निर्भर करती है। विमानन कंपनियों के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल पहले से ही सबसे बड़ा खर्च होता है। यदि तेल महंगा होता है, तो इन कंपनियों की लागत बढ़ेगी और मुनाफे पर असर पड़ सकता है। इसी तरह पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियां, पेंट उद्योग, केमिकल निर्माता और टायर बनाने वाली कंपनियां भी महंगे कच्चे माल और बढ़ी हुई परिवहन लागत की वजह से दबाव में आ सकती हैं। ऐसे सेक्टरों के शेयरों में कमजोरी देखने की संभावना जताई जा रही है।
इसके उलट कुछ सेक्टर अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। बैंकिंग क्षेत्र को फिलहाल मजबूत माना जा रहा है क्योंकि इसकी बुनियादी स्थिति अभी संतुलित दिखाई दे रही है। सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों को भी रुपये में कमजोरी से कुछ हद तक फायदा मिल सकता है क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा में आता है। इसके अलावा फार्मा और रक्षा क्षेत्र की कंपनियों में भी निवेशकों की रुचि बनी रह सकती है, क्योंकि वैश्विक अनिश्चितताओं के दौरान इन सेक्टरों को अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।
तकनीकी विश्लेषकों ने बाजार के कुछ अहम स्तरों पर भी नजर रखने की सलाह दी है। उनके अनुसार निफ्टी के लिए 23,800 से 24,000 अंक का दायरा बेहद महत्वपूर्ण है। यदि सूचकांक इस स्तर से नीचे फिसलता है, तो बिकवाली और तेज हो सकती है। वहीं बाजार में दोबारा मजबूती लौटने के लिए निफ्टी को पहले 24,400 से 24,600 के दायरे के ऊपर टिकना होगा। इन स्तरों को पार करने के बाद ही तेजी का नया दौर शुरू होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।
बैंक निफ्टी की बात करें तो यह सूचकांक अभी भी अपेक्षाकृत मजबूत नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बैंक निफ्टी 58,800 के स्तर के ऊपर मजबूती से टिकता है, तो इसमें नई खरीदारी देखने को मिल सकती है और यह आगे की तेजी का संकेत माना जाएगा। हालांकि वैश्विक घटनाक्रम इस पर भी असर डाल सकते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रहने से सरकार के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। यदि ईंधन महंगा होता है, तो परिवहन से लेकर उत्पादन तक लगभग हर क्षेत्र में लागत बढ़ेगी। इससे महंगाई दर ऊपर जा सकती है और भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है। यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक बढ़ती है, तो ब्याज दरों को लेकर भी नई चर्चाएं शुरू हो सकती हैं।
बाजार विशेषज्ञ फिलहाल निवेशकों को जल्दबाजी में बड़े फैसले लेने से बचने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा समय में वैश्विक घटनाओं पर लगातार नजर रखना जरूरी है क्योंकि बाजार की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय हालात पर निर्भर करेगी। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य हो जाती है, तो बाजार में राहत देखने को मिल सकती है। लेकिन यदि विवाद लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो भारतीय शेयर बाजार, रुपया और अर्थव्यवस्था तीनों पर दबाव बढ़ सकता है।
आने वाले कारोबारी सत्र निवेशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। वैश्विक तेल कीमतों की चाल, महंगाई के ताजा आंकड़े, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और मध्य पूर्व से आने वाली हर नई खबर बाजार की दिशा तय करेगी। इसलिए फिलहाल निवेशकों की नजर केवल घरेलू संकेतकों पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भी टिकी हुई है, क्योंकि वही आगे भारतीय वित्तीय बाजारों की चाल तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।




