हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ अधिकमास की अमावस्या इस बार विशेष महत्व लेकर आई है। तिथियों के संयोग के कारण यह अमावस्या 14 और 15 जून, दोनों दिनों तक प्रभावी रहेगी। अधिकमास स्वयं में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है और लगभग तीन वर्ष में एक बार आता है। ऐसे में इस महीने की अमावस्या को धार्मिक दृष्टि से बहुत फलदायी माना जा रहा है। धर्मग्रंथों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए जप, तप, दान, तर्पण और पूजा-पाठ का पुण्य लंबे समय तक शुभ फल प्रदान करता है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अमावस्या तिथि 14 जून को दोपहर लगभग 12:20 बजे आरंभ होगी और 15 जून की सुबह करीब 8:25 बजे समाप्त हो जाएगी। चूंकि अमावस्या दो दिनों तक रहेगी, इसलिए श्रद्धालु अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार इन दोनों दिनों में से किसी भी समय धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। विशेष रूप से पितरों के निमित्त किए जाने वाले कार्यों का इस दिन बड़ा महत्व माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं में अमावस्या को पितरों की तिथि कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पूर्वजों का स्मरण कर उनके लिए तर्पण, श्राद्ध और धूप-ध्यान करने से उन्हें संतुष्टि प्राप्त होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। पितरों की कृपा से घर में सुख-समृद्धि, शांति और उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकमास की अमावस्या पर भगवान विष्णु की आराधना का भी विशेष महत्व है। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है और यह भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इसलिए इस दिन विष्णु भगवान का अभिषेक, मंत्र जाप और पूजा करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। श्रद्धालु पीले वस्त्र, तुलसी दल और पंचामृत से भगवान का पूजन कर सकते हैं।
अमावस्या के दिन दोपहर का समय पितृ कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों में इसे ‘कुतुप काल’ कहा गया है। मान्यता है कि इस समय किए गए तर्पण और धूप-ध्यान का विशेष फल मिलता है। इस दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।
पितरों के लिए धूप-ध्यान की एक सरल विधि भी बताई गई है। इसके लिए दोपहर के समय गाय के गोबर से बने कंडे को जलाया जाता है। जब उससे धुआं निकलना बंद हो जाए और केवल अंगारे शेष रह जाएं, तब उन अंगारों पर घी, गुड़ तथा खीर-पूड़ी जैसी सात्विक सामग्री अर्पित की जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान पितृ स्मरण करते हुए मंत्रों का जाप किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे पूर्वजों तक श्रद्धा और सम्मान का भाव पहुंचता है।
तर्पण की प्रक्रिया भी अमावस्या के दिन विशेष रूप से की जाती है। श्रद्धालु अपनी हथेली में जल लेकर उसमें काले तिल मिलाते हैं और अंगूठे की दिशा से तीन बार जल अर्पित करते हैं। यह क्रिया पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक मानी जाती है। तर्पण के समय पूर्वजों के नाम का स्मरण करने और उनके कल्याण की कामना करने का विधान बताया गया है।
धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सहायता करना भी पितरों की प्रसन्नता का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए अमावस्या पर गरीबों को भोजन कराना, वस्त्र दान करना, अनाज वितरित करना या आर्थिक सहायता देना शुभ माना गया है। कई लोग इस दिन जूते-चप्पल, छाता और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का दान भी करते हैं।
पितरों की शांति के लिए प्रार्थना का भी विशेष महत्व है। श्रद्धालु अपने मन में यह भावना रखते हुए प्रार्थना कर सकते हैं कि उनके पूर्वज जहां भी हों, सुखी और संतुष्ट रहें। साथ ही परिवार के सदस्यों की रक्षा और उन्नति के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त होता रहे। धार्मिक दृष्टि से श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया स्मरण सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
अमावस्या के अवसर पर कुछ अन्य धार्मिक कार्य भी अत्यंत शुभ माने गए हैं। इनमें पीपल वृक्ष की पूजा प्रमुख है। मान्यता है कि पीपल में देवताओं का वास होता है। इसलिए इस दिन पीपल के नीचे सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाकर उसकी परिक्रमा करने से शुभ फल प्राप्त होता है और नकारात्मकता दूर होती है।
भगवान शिव की आराधना भी अमावस्या पर विशेष फलदायी मानी गई है। श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर सकते हैं। इसके साथ ही ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। कई लोग इस दिन रुद्राभिषेक या शिव चालीसा का पाठ भी करते हैं।
घर के मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना करना भी शुभ माना गया है। धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर भगवान की आरती की जा सकती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करें तो धार्मिक वातावरण बनता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी, सरोवर या तीर्थस्थल पर स्नान करना भी इस दिन शुभ माना गया है। स्नान के बाद देवताओं और पितरों का स्मरण करने की परंपरा है। हालांकि यदि तीर्थ स्नान संभव न हो तो घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करने का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।
धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी अमावस्या के दिन पुण्यदायी माना जाता है। श्रद्धालु श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, विष्णु सहस्रनाम या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ कर सकते हैं। इसके अलावा संतों के प्रवचन सुनना, भजन-कीर्तन में भाग लेना और आध्यात्मिक चिंतन करना भी लाभकारी माना गया है।
संध्या समय तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने की परंपरा भी इस दिन विशेष रूप से निभाई जाती है। माना जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। दीपक जलाते समय परिवार के कल्याण और पितरों की शांति की कामना की जाती है।
इसके अलावा श्रद्धालु मंदिर जाकर भगवान विष्णु, भगवान शिव और अपने कुलदेवता की पूजा भी कर सकते हैं। दान-पुण्य और सेवा कार्यों के साथ दिन बिताने से अमावस्या का महत्व और बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया प्रत्येक शुभ कर्म कई गुना फल प्रदान करता है।
ज्येष्ठ अधिकमास की यह अमावस्या इसलिए भी विशेष मानी जा रही है क्योंकि अधिकमास और अमावस्या का संयोग विरले ही देखने को मिलता है। ऐसे में श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर आध्यात्मिक उन्नति, पितृ स्मरण और पुण्य संचय का महत्वपूर्ण समय माना जा रहा है। श्रद्धा, सेवा और भक्ति के साथ किए गए धार्मिक कार्य व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
(Photo : AI Generated)




