पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण आज नहीं, जानिए 28 मई का शुभ समय और नियम

पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण आज नहीं, जानिए 28 मई का शुभ समय और नियम

पद्मिनी एकादशी हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखने वाली एकादशी तिथियों में से एक मानी जाती है। यह सामान्य एकादशी व्रतों से अलग है, क्योंकि इसका संबंध अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास से होता है। अधिकमास हर वर्ष नहीं आता और इसी कारण इस अवधि में पड़ने वाली पद्मिनी एकादशी भी नियमित रूप से प्रत्येक वर्ष नहीं आती। वैष्णव परंपरा में इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना, उपवास, मंत्र जाप, ध्यान, दान और सेवा को विशेष पुण्यदायी माना गया है।

पद्मिनी एकादशी को कई क्षेत्रों में कमला एकादशी या पुरुषोत्तम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करके सुख-शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है, इसलिए इस मास में की गई विष्णु पूजा, जप, व्रत और धार्मिक सेवा का विशेष महत्व बताया गया है।

पद्मिनी एकादशी के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण विषय व्रत के पारण का समय है। इस बार कई श्रद्धालुओं के बीच यह सवाल चर्चा में रहा कि जब एकादशी तिथि सुबह ही समाप्त हो गई और उसके बाद द्वादशी शुरू हो गई, तो व्रत का पारण कब किया जाना चाहिए। तिथि की गणना, सूर्योदय और द्वादशी के नियमों को ध्यान में रखते हुए पारण का समय निर्धारित किया जाता है। इसलिए केवल एकादशी तिथि समाप्त होने को ही पारण का आधार नहीं माना जाता।

पद्मिनी एकादशी क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है

हिंदू पंचांग में प्रत्येक महीने दो एकादशी आती हैं, लेकिन अधिकमास के दौरान आने वाली एकादशी को विशेष माना जाता है। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और धार्मिक परंपरा में इसे भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। इसी वजह से इस मास में पड़ने वाली पद्मिनी एकादशी को भक्तिभाव और धार्मिक साधना के लिए महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।

इस दिन श्रद्धालु अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। कुछ लोग निर्जल उपवास करते हैं, जबकि कई भक्त फलाहार या सात्विक आहार के साथ व्रत का पालन करते हैं। व्रत का स्वरूप व्यक्ति की परंपरा, स्वास्थ्य और धार्मिक आस्था के अनुसार अलग हो सकता है।

पद्मिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ तुलसी दल अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है। विष्णु पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करते हैं, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं और दिन का समय भजन, कीर्तन, ध्यान या धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में बिताते हैं।

पद्मिनी एकादशी 2026 के पारण को लेकर क्यों है भ्रम

पद्मिनी एकादशी के व्रत को लेकर इस बार सबसे अधिक चर्चा पारण की तिथि और समय को लेकर रही। पंचांग की गणना के अनुसार एकादशी तिथि बुधवार सुबह 6 बजकर 21 मिनट तक बताई गई और इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू हुई। ऐसी स्थिति में कई श्रद्धालुओं को लगा कि एकादशी तिथि समाप्त होते ही व्रत खोल देना चाहिए।

हालांकि, एकादशी व्रत के पारण के संबंध में केवल तिथि समाप्त होने का नियम नहीं देखा जाता। पारण के लिए द्वादशी तिथि और सूर्योदय का भी ध्यान रखा जाता है। धार्मिक पंचांग में निर्धारित पारण काल को इसी गणना के आधार पर देखा जाता है।

इसी वजह से इस वर्ष पद्मिनी एकादशी व्रत के पारण के लिए गुरुवार, 28 मई का दिन बताया गया है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करनी चाहिए, क्योंकि अलग-अलग स्थानों के सूर्योदय और पंचांग गणना में अंतर होने के कारण पारण का समय कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।

पद्मिनी एकादशी पारण का शुभ समय

उपलब्ध पंचांग जानकारी के अनुसार पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण गुरुवार, 28 मई को सुबह 5 बजकर 25 मिनट से 7 बजकर 56 मिनट के बीच किया जाना शुभ माना गया है। इस अवधि में व्रती भगवान विष्णु का स्मरण करके व्रत का समापन कर सकते हैं।

पारण के लिए निर्धारित समय को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए जो श्रद्धालु एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें पहले से ही पूजा और पारण की तैयारी कर लेनी चाहिए। सुबह स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करके निर्धारित समय के भीतर व्रत खोलने की परंपरा है।

हालांकि, पंचांग की गणना स्थान के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी विशेष शहर या क्षेत्र में रहने वाले श्रद्धालु को अपने स्थानीय सूर्योदय और विश्वसनीय स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतिम समय अवश्य जांच लेना चाहिए।

पारण से पहले सुबह की पूजा कैसे करें

पारण वाले दिन सुबह जल्दी उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के बाद स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद साफ और स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल की सफाई की जाती है। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर पूजा शुरू की जा सकती है।

पूजा में पीले फूल, तुलसी दल, फल, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। श्रद्धालु भगवान विष्णु को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके अपनी मनोकामना व्यक्त कर सकते हैं। इसके बाद विष्णु मंत्र, विष्णु सहस्रनाम या अन्य उपलब्ध धार्मिक पाठ का पाठ किया जा सकता है।

भगवान विष्णु के भक्त इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप भी करते हैं। माना जाता है कि मंत्र जाप से मन को एकाग्र करने और पूजा के दौरान आध्यात्मिक भाव बनाए रखने में सहायता मिलती है।

तुलसी पूजा और भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करने की परंपरा

वैष्णव परंपरा में तुलसी का विशेष धार्मिक महत्व है। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पद्मिनी एकादशी के अवसर पर भी कई श्रद्धालु तुलसी पूजा करते हैं और भगवान विष्णु को तुलसी दल चढ़ाते हैं।

पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी अर्पित की जा सकती है। कई परिवारों में सुबह तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने की परंपरा भी है।

धार्मिक मान्यताओं में तुलसी को पवित्रता और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, पूजा की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग हो सकती है। इसलिए श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा कर सकते हैं।

पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण कैसे करें

व्रत का पारण करते समय जल्दबाजी में भारी भोजन करने के बजाय धीरे-धीरे सामान्य आहार की ओर लौटना बेहतर माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार सबसे पहले भगवान विष्णु का स्मरण करके जल ग्रहण किया जा सकता है। कई लोग तुलसी मिश्रित जल या चरणामृत से पारण की शुरुआत करते हैं।

इसके बाद फल या हल्का सात्विक भोजन लिया जा सकता है। लंबे समय तक उपवास रखने के बाद शरीर को अचानक बहुत अधिक भोजन देने से असहजता हो सकती है। इसलिए भोजन धीरे-धीरे और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार करना उचित रहता है।

यदि किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, वह नियमित दवाएं लेता है, गर्भवती है या लंबे समय तक उपवास करने में कठिनाई होती है, तो उसे व्रत के नियमों को अपने स्वास्थ्य के अनुसार अपनाना चाहिए। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

पारण के दिन क्या भोजन किया जा सकता है

पारण के बाद भोजन को लेकर अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। सामान्य रूप से सात्विक और शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता दी जाती है। फल, हल्की सब्जियां, दाल, रोटी, खीर और अन्य शुद्ध शाकाहारी भोजन कई परिवारों में पारण के बाद ग्रहण किए जाते हैं।

कुछ धार्मिक परंपराओं में पारण के बाद चावल खाने को भी उचित माना जाता है। हालांकि, व्रत और पारण से जुड़े भोजन के नियम सभी स्थानों पर समान नहीं होते। इसलिए श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय मान्यता के अनुसार भोजन कर सकते हैं।

लंबे उपवास के बाद बहुत अधिक तला हुआ, अत्यधिक मसालेदार या भारी भोजन करने से बचना बेहतर हो सकता है। हल्का और संतुलित भोजन शरीर को सामान्य दिनचर्या में लौटने में सहायता कर सकता है।

पारण के दिन किन चीजों से बचने की मान्यता है

धार्मिक दृष्टि से पारण वाले दिन भी सात्विक जीवनशैली अपनाने की सलाह दी जाती है। कई श्रद्धालु इस दिन मांसाहार, शराब और अन्य नशीले पदार्थों से पूरी तरह दूर रहते हैं। कुछ परिवारों में प्याज और लहसुन का सेवन भी नहीं किया जाता।

अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन से बचना भी कई धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। हालांकि, इन नियमों का पालन अलग-अलग समुदायों और परिवारों में अलग तरीके से किया जाता है।

पारण का उद्देश्य केवल उपवास समाप्त करना नहीं बल्कि व्रत के दौरान अपनाई गई संयमित और सात्विक भावना को बनाए रखना भी माना जाता है। इसलिए इस दिन भोजन के साथ-साथ व्यवहार और विचारों में भी संयम रखने पर जोर दिया जाता है।

पद्मिनी एकादशी पर दान-पुण्य का महत्व

पद्मिनी एकादशी के अवसर पर पूजा और व्रत के साथ दान-पुण्य करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना, अन्न दान करना, वस्त्र देना या अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग करना पुण्यकारी माना जाता है।

दान हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार किया जाना चाहिए। किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन उपलब्ध कराना, गरीब व्यक्ति को आवश्यक वस्तुएं देना या किसी सेवा कार्य में सहयोग करना भी दान और सेवा की भावना से जुड़ा माना जा सकता है।

कई स्थानों पर इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने, गौ सेवा करने या पक्षियों के लिए दाना-पानी रखने की परंपरा भी देखने को मिलती है। इन सभी कार्यों का मुख्य उद्देश्य धार्मिक आस्था के साथ सेवा, करुणा और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देना है।

अधिकमास और पुरुषोत्तम मास का धार्मिक महत्व

अधिकमास को हिंदू कैलेंडर में एक विशेष अवधि माना जाता है। चंद्र और सौर वर्ष के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए समय-समय पर अधिकमास आता है। धार्मिक परंपरा में इस अतिरिक्त मास को भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है और इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

इस अवधि में भक्त पूजा-पाठ, जप, ध्यान, व्रत और दान जैसे धार्मिक कार्यों को विशेष महत्व देते हैं। पद्मिनी एकादशी इसी विशेष मास में आने के कारण धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

अधिकमास के दौरान कई श्रद्धालु अपनी दिनचर्या में आध्यात्मिक गतिविधियों को बढ़ाते हैं। मंदिर दर्शन, धार्मिक ग्रंथों का पाठ, भजन-कीर्तन और जरूरतमंद लोगों की सेवा जैसे कार्यों को भी इस अवधि में महत्व दिया जाता है।

पद्मिनी एकादशी व्रत से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

धार्मिक मान्यताओं में एकादशी व्रत को मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का माध्यम माना गया है। इस दिन भोजन का संयम केवल शारीरिक उपवास तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि विचारों और व्यवहार में भी सकारात्मकता रखने की प्रेरणा दी जाती है।

भक्त भगवान विष्णु की आराधना करते हुए मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। कई श्रद्धालु मानते हैं कि नियमित रूप से एकादशी व्रत करने से भक्ति भावना मजबूत होती है और व्यक्ति को आत्मसंयम का अभ्यास करने का अवसर मिलता है।

पद्मिनी एकादशी को लेकर प्रचलित धार्मिक कथाओं और मान्यताओं में भगवान विष्णु की भक्ति तथा व्रत के महत्व का उल्लेख मिलता है। हालांकि, धार्मिक ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं में कथा के विवरण अलग-अलग रूपों में मिल सकते हैं।

व्रत रखने वालों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

एकादशी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए। धार्मिक व्रत का पालन करते समय स्वास्थ्य की अनदेखी करना आवश्यक नहीं है। जो लोग निर्जल व्रत नहीं रख सकते, वे अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या अन्य सात्विक विकल्प चुन सकते हैं।

बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए लंबे समय तक उपवास करना उपयुक्त नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह और अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार धार्मिक आस्था का पालन करना चाहिए।

व्रत के दौरान पर्याप्त आराम करना, धार्मिक गतिविधियों में समय देना और अनावश्यक तनाव से बचना भी उपयोगी हो सकता है। व्रत को केवल एक कठिन नियम के रूप में देखने के बजाय इसे आत्मसंयम और आध्यात्मिक चिंतन के अवसर के रूप में देखा जाता है।

पारण के समय इन महत्वपूर्ण बातों को याद रखें

पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए पारण का समय विशेष महत्व रखता है। पंचांग में दिए गए समय के अनुसार व्रत खोलना धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। इस बार उपलब्ध जानकारी के अनुसार 28 मई को सुबह 5:25 बजे से 7:56 बजे तक पारण का समय बताया गया है।

पारण से पहले स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करना, तुलसी दल अर्पित करना और भगवान का स्मरण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद जल या चरणामृत ग्रहण करके व्रत खोला जा सकता है। भोजन हल्का और सात्विक रखना बेहतर माना जाता है।

पारण के समय स्थानीय पंचांग का ध्यान रखना भी जरूरी है, क्योंकि सूर्योदय और तिथि की गणना स्थान के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए श्रद्धालु अपने शहर के अनुसार निर्धारित पारण समय की पुष्टि कर सकते हैं।

पद्मिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा में क्या अर्पित करें

भगवान विष्णु की पूजा में पीले फूल, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करने की परंपरा है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार दीपक और धूप जलाकर पूजा कर सकते हैं। नैवेद्य में सात्विक और शुद्ध भोजन अर्पित किया जाता है।

पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप किया जा सकता है। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप वैष्णव परंपरा में विशेष रूप से प्रचलित है। इसके अलावा विष्णु सहस्रनाम या भगवान विष्णु से संबंधित अन्य स्तोत्रों का पाठ भी किया जा सकता है।

पूजा की सबसे महत्वपूर्ण भावना श्रद्धा और भक्ति मानी जाती है। इसलिए पूजा की सामग्री उपलब्ध न होने पर भी भक्त सरल तरीके से भगवान का स्मरण और प्रार्थना कर सकते हैं।

पद्मिनी एकादशी पर सेवा और सकारात्मक कार्यों का महत्व

धार्मिक अवसरों पर सेवा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पद्मिनी एकादशी के दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, गरीब परिवारों की सहायता करना, किसी बीमार व्यक्ति की मदद करना या सार्वजनिक स्थान पर पानी की व्यवस्था करना जैसे कार्य किए जा सकते हैं।

गर्मी के मौसम में पक्षियों के लिए पानी रखना और पशुओं के लिए भोजन उपलब्ध कराना भी सेवा की भावना से जुड़ा कार्य हो सकता है। ऐसे छोटे प्रयास धार्मिक आस्था के साथ मानवीय संवेदनाओं को भी मजबूत करते हैं।

इस दिन केवल पूजा और व्रत तक सीमित रहने के बजाय दया, संयम, सत्य और सेवा जैसे मूल्यों को अपने व्यवहार में शामिल करने की प्रेरणा भी धार्मिक परंपराओं में दी जाती है। इसी कारण पद्मिनी एकादशी को कई श्रद्धालु आध्यात्मिक साधना के साथ सामाजिक सेवा के अवसर के रूप में भी देखते हैं।