चंडीगढ़। हरियाणा सरकार ने रिहायशी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की दिशा में बड़ा फैसला लिया है। अब डॉक्टरों के लिए नर्सिंग होम खोलने के नियमों में राहत दी गई है। नई व्यवस्था के तहत डॉक्टर केवल अपनी स्वामित्व वाली जमीन पर ही नहीं, बल्कि लीज पर लिए गए रिहायशी प्लॉट पर भी नर्सिंग होम स्थापित कर सकेंगे। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में मौजूदा नीति में संशोधन को मंजूरी प्रदान की गई।
सरकार के इस फैसले से उन चिकित्सकों को विशेष राहत मिलने की उम्मीद है, जो अपनी जमीन नहीं होने के कारण रिहायशी क्षेत्रों में नर्सिंग होम शुरू करने की योजना को आगे नहीं बढ़ा पा रहे थे। अब उन्हें जमीन खरीदने की अनिवार्यता से राहत मिलेगी और निर्धारित नियमों का पालन करते हुए लीज पर संपत्ति लेकर स्वास्थ्य सुविधा शुरू करने का विकल्प मिल सकेगा।
सरकार का मानना है कि इस बदलाव से केवल डॉक्टरों को ही सुविधा नहीं मिलेगी, बल्कि आम लोगों के लिए भी स्थानीय स्तर पर चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी। रिहायशी कॉलोनियों में छोटे स्तर के नर्सिंग होम और अस्पताल जैसी सुविधाएं विकसित होने से मरीजों को सामान्य उपचार, भर्ती और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दूर स्थित बड़े अस्पतालों तक जाने की जरूरत कम हो सकती है।
नई नीति के तहत एलोपैथिक और आयुष, दोनों चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े पात्र डॉक्टर रिहायशी प्लॉट पर नर्सिंग होम स्थापित कर सकेंगे। इसके लिए जमीन का डॉक्टर के नाम पर होना अनिवार्य नहीं रहेगा। डॉक्टर किसी रिहायशी प्लॉट को निर्धारित शर्तों के अनुसार लीज पर लेकर वहां नर्सिंग होम संचालित कर सकेगा।
हालांकि, सरकार ने इस सुविधा के साथ कुछ जरूरी शर्तें भी बरकरार रखी हैं। लीज पर लिए गए प्लॉट पर नर्सिंग होम खोलने की अनुमति स्थायी नहीं होगी। इसकी वैधता संबंधित लीज की अवधि तक ही रहेगी। जैसे ही प्लॉट की लीज समाप्त होगी, उस जमीन पर नर्सिंग होम चलाने की अनुमति भी समाप्त मानी जाएगी। यदि डॉक्टर को आगे भी नर्सिंग होम संचालित करना है तो उसे लागू नियमों के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
रिहायशी प्लॉट को नर्सिंग होम के इस्तेमाल में लाने के लिए निर्धारित कन्वर्जन शुल्क भी देना होगा। यानी केवल लीज पर जमीन हासिल कर लेने से नर्सिंग होम संचालित करने की अनुमति स्वत: नहीं मिलेगी। संबंधित डॉक्टर को भूमि के उपयोग में बदलाव से जुड़ी निर्धारित औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी और सरकार की ओर से तय शुल्क जमा करना होगा।
नई व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि डॉक्टर की पेशेवर योग्यता और पंजीकरण से जुड़े नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि नर्सिंग होम खोलने के लिए डॉक्टर का संबंधित चिकित्सा परिषद में वैध पंजीकरण होना जरूरी रहेगा।
एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से जुड़े डॉक्टर के पास संबंधित मेडिकल काउंसिल का वैध पंजीकरण नंबर होना चाहिए। इसी तरह आयुष पद्धति के डॉक्टर के लिए संबंधित आयुष काउंसिल में पंजीकरण आवश्यक होगा। यानी जमीन की उपलब्धता से जुड़ी शर्त में भले ही राहत दी गई है, लेकिन मरीजों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने वाले डॉक्टर की पेशेवर पात्रता के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया है।
नर्सिंग होम के लिए आवेदन करने वाले डॉक्टर का वर्तमान में चिकित्सा अभ्यास में होना भी जरूरी होगा। इसके अलावा स्थानीय शाखा के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आईएमए में पंजीकरण की शर्त भी लागू रहेगी। आवेदन के साथ डॉक्टर को इस संबंध में आवश्यक शपथपत्र भी प्रस्तुत करना होगा।
सरकार के इस फैसले से यह स्पष्ट है कि नीति में बदलाव का उद्देश्य नर्सिंग होम खोलने की प्रक्रिया को आसान बनाना है, न कि चिकित्सा मानकों में किसी तरह की ढील देना। सरकार एक तरफ डॉक्टरों को संपत्ति संबंधी बाध्यता से राहत दे रही है, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि स्वास्थ्य सेवाएं योग्य और पंजीकृत चिकित्सकों के माध्यम से ही उपलब्ध कराई जाएं।
रिहायशी कॉलोनियों में स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग पिछले कुछ समय से बढ़ती जा रही है। बड़े शहरों और तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में लोगों को कई बार सामान्य उपचार या मरीज को भर्ती कराने के लिए अपेक्षाकृत दूर स्थित अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर नर्सिंग होम की उपलब्धता मरीजों और उनके परिवारों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
सरकार की ओर से किए गए नीति संशोधन को इसी जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि डॉक्टरों को लीज पर रिहायशी प्लॉट लेकर नर्सिंग होम शुरू करने का विकल्प मिलता है तो स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए उपलब्ध जमीन का दायरा बढ़ सकता है। इससे उन इलाकों में भी छोटे चिकित्सा केंद्र विकसित होने की संभावना बनेगी, जहां डॉक्टरों के पास अपनी जमीन नहीं है।
इस फैसले का लाभ खासतौर पर ऐसे चिकित्सकों को मिल सकता है, जो अपने क्षेत्र में लंबे समय से प्रैक्टिस कर रहे हैं, लेकिन खुद की जमीन नहीं होने के कारण नर्सिंग होम शुरू नहीं कर पा रहे थे। जमीन खरीदने में बड़ी पूंजी की जरूरत होती है, जबकि लीज मॉडल के जरिए शुरुआती निवेश का बोझ कम किया जा सकता है।
हालांकि, लीज आधारित नर्सिंग होम के लिए जमीन के उपयोग, भवन की उपयुक्तता, मरीजों की सुरक्षा और अन्य लागू नियमों का पालन करना जरूरी रहेगा। सरकार की ओर से निर्धारित प्रक्रिया और शर्तों को पूरा किए बिना किसी रिहायशी प्लॉट को नर्सिंग होम में परिवर्तित नहीं किया जा सकेगा।
नर्सिंग होम के संचालन के दौरान मरीजों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण पहलू रहेगी। चूंकि ऐसे संस्थानों में मरीजों को भर्ती कर उपचार दिया जाता है, इसलिए संबंधित विभागों द्वारा निर्धारित स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों का पालन करना आवश्यक होगा। नीति में बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि नर्सिंग होम संचालकों को अन्य वैधानिक नियमों से छूट मिल जाएगी।
सरकार के इस कदम से छोटे और मध्यम स्तर के चिकित्सा संस्थानों के लिए अवसर बढ़ने की संभावना है। बड़े अस्पतालों की तुलना में नर्सिंग होम स्थानीय आबादी के लिए अधिक सुलभ हो सकते हैं। खासकर बुजुर्गों, लंबे उपचार की जरूरत वाले मरीजों और ऐसे परिवारों के लिए स्थानीय स्वास्थ्य सुविधा महत्वपूर्ण हो सकती है, जिन्हें हर बार बड़े शहरों के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।
हरियाणा में तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के साथ स्वास्थ्य ढांचे पर भी दबाव बढ़ रहा है। नई कॉलोनियों और विकसित हो रहे रिहायशी क्षेत्रों में अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध कराना सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे में निजी क्षेत्र के चिकित्सकों को स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य संस्थान स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का एक माध्यम हो सकता है।
नई व्यवस्था के तहत डॉक्टरों को जमीन की खरीद के बजाय लीज का विकल्प मिलने से इस क्षेत्र में निवेश की संभावना भी बढ़ सकती है। डॉक्टर अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार उपयुक्त रिहायशी प्लॉट लीज पर लेकर नर्सिंग होम की स्थापना कर सकते हैं। इससे स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में नए संस्थान आने की संभावना बन सकती है।
हालांकि, सरकार ने लीज पर नर्सिंग होम स्थापित करने की सुविधा को स्पष्ट रूप से लीज की अवधि से जोड़ दिया है। इसका मतलब यह है कि डॉक्टर को संपत्ति के मालिक के साथ किए गए लीज समझौते की अवधि का ध्यान रखना होगा। लीज समाप्त होने के बाद नर्सिंग होम की अनुमति भी स्वत: समाप्त हो जाएगी। इसलिए लंबे समय के लिए नर्सिंग होम संचालित करने की योजना बनाने वाले डॉक्टरों के लिए लीज की शर्तें महत्वपूर्ण होंगी।
आवेदन प्रक्रिया में डॉक्टर को अपने पंजीकरण, प्रैक्टिस की स्थिति और आईएमए से जुड़े होने की जानकारी उपलब्ध करवानी होगी। संबंधित दस्तावेजों और शपथपत्र के आधार पर पात्रता की जांच की जाएगी। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि सुविधा का लाभ केवल योग्य और निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले चिकित्सकों को ही मिले।
सरकार ने एलोपैथिक और आयुष डॉक्टरों दोनों को इस व्यवस्था में शामिल करके स्वास्थ्य सेवा के दायरे को व्यापक रखा है। इससे अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों के योग्य चिकित्सकों को अपने-अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा स्थापित करने का अवसर मिल सकता है।
नई नीति को लागू करने के बाद स्वास्थ्य विभाग और संबंधित स्थानीय प्रशासन के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी होगी कि नर्सिंग होम के लिए मंजूर किए गए प्लॉट का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप ही हो। रिहायशी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा खोलने के बावजूद स्थानीय नियमों और नागरिक सुविधाओं से जुड़े प्रावधानों का पालन करना होगा।
सरकार का तर्क है कि स्वास्थ्य सुविधा लोगों के घरों के नजदीक उपलब्ध होना आम नागरिक के हित में है। यदि किसी मरीज को भर्ती की जरूरत है और उसके आसपास ही योग्य डॉक्टर की निगरानी में नर्सिंग होम उपलब्ध है तो उसे तत्काल चिकित्सा सहायता मिल सकती है। इससे बड़े अस्पतालों पर भी कुछ हद तक मरीजों का दबाव कम होने की संभावना है।
फैसले के बाद उन डॉक्टरों के लिए नई संभावनाएं खुल गई हैं, जो अपनी खुद की जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण नर्सिंग होम स्थापित करने से पीछे हट रहे थे। अब वे लीज पर उपयुक्त रिहायशी प्लॉट लेकर निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी स्वास्थ्य सेवा शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
सरकार ने हालांकि यह भी सुनिश्चित किया है कि इस राहत का लाभ लेते समय डॉक्टरों की पेशेवर जिम्मेदारियों और योग्यता संबंधी मानकों में कोई कमी न आए। मेडिकल या आयुष काउंसिल में वैध पंजीकरण, सक्रिय प्रैक्टिस और आईएमए से संबंधित शर्तों को बनाए रखने का उद्देश्य चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को बरकरार रखना है।
इस नीति बदलाव को हरियाणा में स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि निजी क्षेत्र के योग्य चिकित्सकों को अधिक लचीला अवसर देकर रिहायशी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क बढ़ाया जाए।
कुल मिलाकर, कैबिनेट के इस फैसले से नर्सिंग होम स्थापित करने के लिए डॉक्टरों के सामने मौजूद संपत्ति संबंधी बड़ी बाधा कम हुई है। अब खुद की जमीन नहीं होने पर भी डॉक्टर लीज पर रिहायशी प्लॉट लेकर नर्सिंग होम शुरू कर सकेंगे। हालांकि, इसके लिए कन्वर्जन शुल्क, वैध चिकित्सा पंजीकरण, सक्रिय प्रैक्टिस, आईएमए पंजीकरण और अन्य निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य रहेगा। लीज की अवधि समाप्त होने के साथ नर्सिंग होम की अनुमति भी समाप्त हो जाएगी।
सरकार को उम्मीद है कि इस बदलाव से जहां चिकित्सकों को निवेश और संस्थान स्थापित करने में सुविधा मिलेगी, वहीं आम लोगों को भी अपने घर के आसपास बेहतर और भर्ती आधारित चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी। आने वाले समय में इस नीति के प्रभाव से रिहायशी क्षेत्रों में छोटे अस्पतालों और नर्सिंग होम की संख्या बढ़ने की संभावना है, जिससे राज्य के स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे को मजबूती मिल सकती है।




