एक समय था जब बच्चे का गोल-मटोल शरीर परिवार के लिए खुशी और अच्छी सेहत का संकेत माना जाता था। बच्चे का वजन ज्यादा देखकर अक्सर यही समझा जाता था कि उसे घर में भरपूर खाना मिल रहा है और वह स्वस्थ है। लेकिन बदलते समय में यह धारणा खतरनाक साबित हो सकती है। बच्चों में जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ना अब सिर्फ उनके व्यक्तित्व या दिखने से जुड़ा विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।
भारत में बच्चों और किशोरों के बीच बढ़ता मोटापा सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का बड़ा कारण बन रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, खानपान में बदलाव, शारीरिक गतिविधियों की कमी, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना और बदलती जीवनशैली इसके पीछे प्रमुख कारण हैं। अगर समय रहते बच्चों की आदतों में सुधार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मोटापे से जुड़ी बीमारियों का बोझ और बढ़ सकता है।
आंकड़े बता रहे हैं समस्या की गंभीरता
लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. भुवनचंद्र तिवारी के अनुसार भारत में बच्चों और किशोरों के बीच अधिक वजन और मोटापे के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें तो पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में अधिक वजन की समस्या 2005-06 में 1.5 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा 2019-21 के दौरान बढ़कर 3.4 प्रतिशत तक पहुंच गया।
यानी कम उम्र में ही जरूरत से ज्यादा वजन वाले बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बचपन में बढ़ा हुआ वजन कई बार किशोरावस्था और वयस्क जीवन तक बना रहता है।
यूनिसेफ ने भी भारत में बच्चों के मोटापे को लेकर चिंता जताई है। मौजूदा रुझान इसी तरह जारी रहे तो वर्ष 2030 तक देश में 5 से 19 वर्ष की आयु के 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे की समस्या से प्रभावित हो सकते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि समस्या केवल कुछ परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा काफी व्यापक हो सकता है।
खाने की थाली में आया बड़ा बदलाव
बच्चों के बढ़ते वजन के पीछे सबसे अहम कारणों में खानपान का बदलना शामिल है। पहले बच्चों के भोजन में घर का बना खाना, दाल, सब्जियां, रोटी, चावल, फल और अन्य पौष्टिक चीजें नियमित रूप से शामिल होती थीं। अब कई परिवारों में बच्चों की पसंद के चलते पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स, इंस्टेंट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स और मिठाइयों की मात्रा बढ़ गई है।
इन खाद्य पदार्थों में स्वाद भले ही बच्चों को पसंद आता हो, लेकिन इनमें कई बार जरूरत से ज्यादा कैलोरी, नमक, चीनी और वसा मौजूद होती है। इसके विपरीत शरीर के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। लगातार ऐसे भोजन का सेवन करने से शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा जमा होने लगती है और धीरे-धीरे वजन बढ़ सकता है।
मीठे पेय भी इस समस्या को बढ़ा सकते हैं। कई बच्चे पानी या दूध की जगह शुगर वाले ड्रिंक, पैकेज्ड जूस और अन्य मीठे पेय पसंद करते हैं। इनमें मौजूद अतिरिक्त चीनी बिना पेट भरे कैलोरी बढ़ा सकती है।
मोबाइल ने कम कर दी बच्चों की सक्रियता
बच्चों के बढ़ते वजन का एक दूसरा बड़ा कारण उनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों की कमी है। पहले बच्चे बाहर मैदान में खेलते थे, साइकिल चलाते थे और दोस्तों के साथ काफी समय शारीरिक गतिविधियों में बिताते थे। अब मोबाइल फोन, टीवी, कंप्यूटर, गेमिंग और ऑनलाइन मनोरंजन ने उनके खाली समय का बड़ा हिस्सा ले लिया है।
कई बच्चे स्कूल से लौटने के बाद घंटों स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। पढ़ाई के लिए भी डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल बढ़ा है। ऐसे में दिन का बड़ा हिस्सा बैठकर बीतने लगा है। शरीर को जितनी ऊर्जा खर्च करनी चाहिए, वह नहीं हो पाती और दूसरी तरफ भोजन से मिलने वाली कैलोरी बढ़ती रहती है।
शहरी क्षेत्रों में समस्या और जटिल हो सकती है। बढ़ते शहरों में बच्चों के लिए सुरक्षित खेल मैदानों की कमी, ट्रैफिक, खुले स्थानों का कम होना और पढ़ाई से जुड़ा दबाव उनकी सक्रियता को प्रभावित करता है। माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या भी कई बार बच्चों के खेल और शारीरिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय निकालने में बाधा बनती है।
मोटापा सिर्फ वजन बढ़ने का नाम नहीं
बचपन का मोटापा आगे चलकर शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों और प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। जरूरत से ज्यादा वजन वाले बच्चों में उच्च रक्तचाप, खराब कोलेस्ट्राल और इंसुलिन रेजिस्टेंस का जोखिम बढ़ सकता है। लंबे समय में यही स्थितियां टाइप-2 डायबिटीज और हृदय संबंधी बीमारियों की संभावना को बढ़ा सकती हैं।
मोटापे का असर लिवर पर भी पड़ सकता है। शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने से फैटी लिवर की समस्या का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा बचपन में मोटापा आगे चलकर वयस्क होने पर भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का कारण बन सकता है।
समस्या केवल शारीरिक नहीं है। ज्यादा वजन वाले बच्चों को कई बार अपने साथियों की टिप्पणियों, मजाक या सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित हो सकता है। कुछ बच्चों में तनाव, झिझक और सामाजिक गतिविधियों से दूरी जैसी समस्याएं भी देखने को मिल सकती हैं।
बच्चे का वजन देखकर ही फैसला न करें
माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि बच्चे के स्वस्थ होने का आकलन केवल उसके वजन या शरीर के आकार को देखकर नहीं किया जा सकता। बच्चों की उम्र और विकास के साथ उनके वजन और लंबाई में बदलाव होता रहता है। इसलिए मोटापे की पहचान के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन ज्यादा उपयोगी होता है।
बीएमआइ यानी बॉडी मास इंडेक्स शुरुआती आकलन में मदद कर सकता है। इसके अलावा बच्चे की लंबाई, उम्र, वजन और शरीर में चर्बी के वितरण को भी ध्यान में रखा जाता है। कमर के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि पेट की अतिरिक्त चर्बी आगे चलकर मधुमेह और हृदय रोग जैसे जोखिमों से जुड़ी हो सकती है।
इसलिए यदि बच्चे का वजन तेजी से बढ़ रहा है या उसकी शारीरिक सक्रियता लगातार कम हो रही है तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय बाल रोग विशेषज्ञ या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
समाधान डाइटिंग नहीं, बेहतर आदतें हैं
बच्चों में मोटापा रोकने के लिए उन्हें भूखा रखना या अचानक कठोर डाइट पर डालना सही तरीका नहीं है। बच्चों का शरीर अभी विकास की अवस्था में होता है और उन्हें पर्याप्त पोषण की जरूरत होती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि उनकी थाली में पौष्टिक भोजन की मात्रा बढ़े और अस्वास्थ्यकर चीजों का सेवन सीमित हो।
घर के भोजन में फल, हरी सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पैकेज्ड स्नैक्स, अत्यधिक तला हुआ भोजन और ज्यादा चीनी वाले खाद्य पदार्थों की आदत को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
बच्चों को रोजाना करीब 45 से 60 मिनट शारीरिक गतिविधि के लिए प्रोत्साहित करना उपयोगी हो सकता है। यह जरूरी नहीं कि बच्चा केवल किसी खेल की ट्रेनिंग ही करे। दौड़ना, साइकिल चलाना, तैरना, आउटडोर गेम खेलना या परिवार के साथ सक्रिय गतिविधियों में शामिल होना भी उसकी दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है।
माता-पिता की भूमिका सबसे अहम
बच्चों की आदतें अक्सर घर के माहौल से बनती हैं। इसलिए माता-पिता को केवल बच्चे को जंक फूड से दूर रहने की सलाह देने के बजाय खुद भी स्वस्थ खानपान और सक्रिय जीवनशैली अपनानी चाहिए। भोजन करते समय मोबाइल और टीवी से दूरी बनाना, घर में नियमित समय पर खाना और पर्याप्त नींद की आदत विकसित करना भी मददगार हो सकता है।
स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना भी जरूरी है। हर खाली समय में मोबाइल थमा देना आसान समाधान लग सकता है, लेकिन लंबे समय में इससे बच्चे की शारीरिक गतिविधि और नींद प्रभावित हो सकती है। माता-पिता बच्चों के साथ खेलकर या बाहर घूमने जैसी गतिविधियों में शामिल होकर उन्हें सक्रिय रहने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
स्कूल और सरकार को भी बढ़ानी होगी जिम्मेदारी
बच्चों में बढ़ते मोटापे से निपटने की जिम्मेदारी केवल परिवारों की नहीं है। स्कूलों में खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है। बच्चों को पोषण के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे कम उम्र से ही भोजन और स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझ सकें।
सरकार के स्तर पर भी बच्चों को लक्षित करने वाले अत्यधिक मीठे, नमकीन और अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों पर निगरानी मजबूत करने की जरूरत है। पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट पोषण संबंधी जानकारी उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकती है। साथ ही बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन को आसानी से उपलब्ध और किफायती बनाना भी जरूरी है।
बच्चों के मोटापे को लेकर सबसे बड़ी जरूरत सोच बदलने की है। गोल-मटोल शरीर को अपने आप में स्वस्थ मानने के बजाय बच्चे की पूरी जीवनशैली पर ध्यान देना होगा। उसकी थाली में क्या है, वह दिन में कितना चलता-खेलता है, कितनी देर स्क्रीन देखता है और कितनी नींद लेता है—इन सभी बातों का स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
आज अगर परिवार बच्चों के खानपान और दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव शुरू कर दें तो भविष्य में बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव संभव है। बच्चों को कम खाना नहीं, संतुलित और पौष्टिक खाना, नियमित रूप से सक्रिय रहना और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना सिखाना ही असली समाधान है। स्वस्थ बचपन ही आगे चलकर स्वस्थ समाज की नींव तैयार करता है।
(Photo: AI Generated)




