अमरजीत चावला प्रकरण पर आप का अकाली नेतृत्व पर हमला, बलतेज पन्नू ने एसजीपीसी से मांगे जवाब

अमरजीत चावला प्रकरण पर आप का अकाली नेतृत्व पर हमला, बलतेज पन्नू ने एसजीपीसी से मांगे जवाब

आम आदमी पार्टी पंजाब के मीडिया इंचार्ज बलतेज पन्नू ने अमरजीत सिंह चावला से जुड़े विवाद को लेकर शिरोमणि अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के नेतृत्व पर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐतिहासिक अकाली आंदोलन से बनी राजनीतिक और धार्मिक संस्थाओं पर लंबे समय से एक परिवार का प्रभाव रहा है और उनका इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए किया गया।

पन्नू ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अकाली मोर्चों की परंपरा त्याग और संघर्ष की रही है, लेकिन समय के साथ अकाली दल की राजनीति और सिख संस्थाओं के संचालन को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा विवाद को केवल एक व्यक्ति से जुड़ा मामला मानने के बजाय सिख संस्थाओं के कामकाज और जवाबदेही के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

अमरजीत सिंह चावला के खिलाफ एक महिला की शिकायत पर दर्ज मामले के बाद 20 सितंबर को अकाल तख्त ने चावला और अतिरिक्त मुख्य ग्रंथी ज्ञानी मलकीत सिंह को खालसा पंथ से निष्कासित करने का फैसला सुनाया था। दोनों को सिख संस्थाओं में धार्मिक गतिविधियों से दूर रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।

आनंदपुर साहिब के सराय मामले पर उठाए सवाल

बलतेज पन्नू ने अमरजीत सिंह चावला से जुड़े मामले में आनंदपुर साहिब स्थित सराय को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि शिकायतकर्ता महिला को वहां लंबे समय तक रहने की अनुमति किस स्तर पर मिली, उसे आवास और अन्य सुविधाएं किसने उपलब्ध कराईं तथा इस पूरी व्यवस्था का खर्च किसने वहन किया।

उन्होंने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान हरजिंदर सिंह धामी की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि महिला ने उनसे शिकायत की थी तो उस समय संस्था की ओर से क्या कार्रवाई की गई।

पन्नू ने कहा कि मामले में पुलिस जांच अपनी जगह है, लेकिन सिख संस्थाओं के प्रशासनिक ढांचे और वहां उपलब्ध कराई गई सुविधाओं को लेकर भी स्पष्टता जरूरी है। उन्होंने मांग की कि संबंधित पदाधिकारी इस संबंध में सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करें।

वल्टोहा और झिंजर की भूमिका पर भी सवाल

आप नेता ने विरसा सिंह वल्टोहा और यूथ अकाली दल के अध्यक्ष सरबजीत सिंह झिंजर का नाम लेते हुए भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि महिला को आनंदपुर साहिब लाने और उसके लिए व्यवस्था करने में किन लोगों की भूमिका थी।

पन्नू ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर कौन-कौन लोग जुड़े थे, इसकी जानकारी सामने आनी चाहिए। उन्होंने सुखबीर सिंह बादल और हरजिंदर सिंह धामी से भी इस संबंध में जवाब देने की मांग की।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि गंभीर आरोप सामने आने के बावजूद संबंधित लोगों को सिख संस्थाओं और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां किस आधार पर मिलती रहीं।

अकाली आंदोलन की पुरानी परंपरा का हवाला

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बलतेज पन्नू ने अकाली आंदोलन के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि पुराने समय में अकाली कार्यकर्ता आंदोलनों में हिस्सा लेते थे और जेल जाते थे। उनके अनुसार, ‘जत्थेदार’ जैसे संबोधन संघर्ष और योगदान के बाद अर्जित किए जाते थे।

पन्नू ने कहा कि अकाली राजनीति की पुरानी परंपरा और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के बीच अंतर दिखाई देता है। उन्होंने बादल परिवार पर आरोप लगाया कि उसके प्रभाव में अकाली दल की मूल राजनीतिक और पंथक भूमिका कमजोर हुई है।

उन्होंने कहा कि अकाली दल की पहचान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं और पार्टी नेतृत्व को स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान समय में उसका पंथक एजेंडा क्या है तथा सिख संस्थाओं के प्रति उसकी जवाबदेही किस तरह तय होती है।

2015 की बेअदबी घटनाओं का भी जिक्र

बलतेज पन्नू ने 2015 में हुई बेअदबी की घटनाओं और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बरगाड़ी और उससे जुड़े घटनाक्रम ने पंजाब की राजनीति और सिख समुदाय के बीच गहरा प्रभाव छोड़ा।

उन्होंने कोटकपूरा और बहबल कलां में पुलिस कार्रवाई का जिक्र करते हुए तत्कालीन सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए। पन्नू ने कहा कि इन घटनाओं को लेकर पंजाब के लोगों के मन में अब भी कई सवाल हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय की सरकार स्थिति को संभालने में विफल रही और विरोध कर रहे लोगों के खिलाफ बल प्रयोग हुआ। उन्होंने कहा कि 2015 से 2017 के बीच की घटनाओं को पंजाब की राजनीति में अभी भी महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जाता है।

धार्मिक संस्थाओं के संचालन पर जवाबदेही की मांग

आप नेता ने कहा कि सिख धार्मिक संस्थाओं के पास बड़ी संख्या में संसाधन और व्यापक प्रशासनिक जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में इन संस्थाओं के पदाधिकारियों और प्रबंधकों की जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि विवादों में घिरे लोगों को संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां क्यों दी जाती हैं और उनके लिए संस्थागत संसाधनों का इस्तेमाल किस प्रक्रिया के तहत होता है।

पन्नू ने कहा कि सराय, वाहन, कर्मचारियों और अन्य सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर यदि कोई सवाल उठता है तो संबंधित संस्थाओं को उसका जवाब देना चाहिए। उन्होंने इस तरह के मामलों में पारदर्शिता और रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की आवश्यकता बताई।

गुरुद्वारा कंध साहिब के कार्यक्रम का भी जिक्र

बलतेज पन्नू ने बटाला स्थित गुरुद्वारा कंध साहिब में आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए सुच्चा सिंह लंगाह को मंच दिए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सिख समुदाय के एक वर्ग की आपत्ति के बावजूद किसी विवादित व्यक्ति को धार्मिक कार्यक्रम में मंच देने से संस्थाओं की निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

उन्होंने अलग-अलग मामलों में अपनाए गए रवैये की तुलना करते हुए पूछा कि धार्मिक संस्थाओं के स्तर पर निर्णय लेने के लिए एक समान मापदंड क्यों नहीं होना चाहिए।

पन्नू ने कहा कि सिख संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उनके पदाधिकारियों को फैसलों के पीछे के आधार को स्पष्ट करना चाहिए।

अकाल तख्त की कार्रवाई का भी किया उल्लेख

पन्नू ने 20 सितंबर को अकाल तख्त की ओर से अमरजीत सिंह चावला और ज्ञानी मलकीत सिंह के खिलाफ की गई कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि इस फैसले के बाद पूरे घटनाक्रम को लेकर कई सवाल और गंभीर हो गए हैं।

अकाल तख्त की ओर से दोनों को खालसा पंथ से निष्कासित करने और सिख संस्थाओं में धार्मिक गतिविधियों से दूर रखने का निर्देश दिया गया था। कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज ने निष्पक्ष जांच की जरूरत पर भी जोर दिया था।

अमरजीत सिंह चावला ने बाद में इस फैसले को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने आरोपों से इनकार करते हुए कार्रवाई को भेदभावपूर्ण बताया है।

बादल परिवार के नेताओं की चुप्पी पर सवाल

बलतेज पन्नू ने अमरजीत सिंह चावला प्रकरण को लेकर बादल परिवार के नेताओं की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि हरसिमरत कौर बादल, सुखबीर सिंह बादल और अन्य वरिष्ठ अकाली नेता इस मामले पर सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति क्यों स्पष्ट नहीं कर रहे हैं।

उन्होंने सुखबीर बादल से सीधे सवाल करते हुए कहा कि अमरजीत चावला को संगठन और सिख संस्थाओं में इतनी जिम्मेदारियां किस आधार पर मिलीं और संबंधित संस्थाओं में उनके प्रभाव को लेकर नेतृत्व की क्या भूमिका रही।

पन्नू ने कहा कि गंभीर विवादों के बाद अकाली नेतृत्व को केवल राजनीतिक बयान देने के बजाय संस्थागत जवाबदेही से जुड़े सवालों का भी उत्तर देना चाहिए।

धार्मिक संस्थाओं में नियुक्तियों पर उठाया मुद्दा

आप नेता ने कहा कि सिख धार्मिक संस्थाओं में नियुक्तियां और जिम्मेदारियां केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, जिन लोगों को धार्मिक संस्थाओं में जिम्मेदारी दी जाती है, उनके आचरण और सार्वजनिक भूमिका को लेकर भी स्पष्ट मानदंड होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने के बाद उससे जुड़े विवाद सामने आते हैं तो संस्था के प्रबंधन को यह बताना चाहिए कि शिकायत मिलने के बाद क्या कदम उठाए गए और निर्णय लेने में किन नियमों का पालन किया गया।

पन्नू ने कहा कि इस तरह की जानकारी सामने आने से ही संगत के बीच संस्थाओं के प्रति भरोसा मजबूत हो सकता है।

एसजीपीसी से मांगी स्पष्ट जानकारी

बलतेज पन्नू ने एसजीपीसी से मांग की कि आनंदपुर साहिब की सराय से संबंधित रिकॉर्ड और व्यवस्थाओं को लेकर स्थिति स्पष्ट की जाए। उन्होंने पूछा कि संबंधित महिला को वहां रहने की अनुमति कैसे मिली, उसे कौन-कौन सी सुविधाएं दी गईं और इसके लिए भुगतान किस मद से हुआ।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि संस्था के किसी कर्मचारी या पदाधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।

पन्नू ने कहा कि जांच एजेंसियां मामले की कानूनी जांच करेंगी, लेकिन संस्था के स्तर पर प्रशासनिक और वित्तीय जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

सिख बुद्धिजीवियों से हस्तक्षेप की अपील

आप मीडिया इंचार्ज ने सिख बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और दुनिया भर में रहने वाले सिख समुदाय से इन मुद्दों पर आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि धार्मिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली, नियुक्तियों और संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर समाज में खुली चर्चा होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सिख संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उनके संचालन में पारदर्शिता जरूरी है और किसी भी व्यक्ति या परिवार के राजनीतिक प्रभाव से ऊपर संस्थागत व्यवस्था को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

पन्नू ने दावा किया कि पंजाब सरकार राज्य को विकास और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में आगे ले जाने का काम कर रही है, लेकिन धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवादों का समाधान संस्थाओं की अपनी जवाबदेही और पारदर्शी व्यवस्था से ही संभव है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा विवाद के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग यह भी जरूरी है कि संबंधित संस्थाएं उठाए गए सवालों का तथ्यात्मक जवाब दें और जांच प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ने दिया जाए।