हरपाल चीमा ने किया 429 करोड़ की जीएसटी धोखाधड़ी का खुलासा, पुलिस को सौंपी जांच

हरपाल चीमा ने किया 429 करोड़ की जीएसटी धोखाधड़ी का खुलासा, पुलिस को सौंपी जांच

लुधियाना में ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक समेत कई लोगों पर एफआईआर, ई-वे बिल और फर्जी दस्तावेजों से खुला कथित कर चोरी का मामला

चंडीगढ़। पंजाब के कर विभाग ने कथित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) धोखाधड़ी के एक बड़े मामले का पर्दाफाश किया है। शुरुआती जांच में 429.30 करोड़ रुपये की कथित कर धोखाधड़ी से जुड़े 62 आपस में जुड़ी फर्मों के नेटवर्क की पहचान की गई है। यह नेटवर्क कई राज्यों में सक्रिय बताया जा रहा है, जबकि इनमें से 25 फर्में पंजाब में कारोबार कर रही थीं। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने पूरे नेटवर्क की आपराधिक जांच पुलिस को सौंप दी है। साथ ही कर विभाग को संदिग्ध कारोबारियों के लेनदेन, इनपुट टैक्स क्रेडिट और संभावित कर देनदारी की गहन जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।

पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने बुधवार को इस मामले की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य सरकार कर चोरी और फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर लुधियाना में मामला दर्ज कराया गया है। पुलिस और कर विभाग अब कथित नेटवर्क से जुड़े लोगों, फर्मों और कारोबारी लेनदेन की कड़ियों की जांच करेंगे।

विभाग के अनुसार, इस मामले में 2,410.22 करोड़ रुपये की कर योग्य राशि से संबंधित कारोबार पर 429.30 करोड़ रुपये की जीएसटी धोखाधड़ी का आरोप है। जांच में सामने आया नेटवर्क मुख्य रूप से वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के दौरान सक्रिय रहा। हालांकि, मामले में शामिल प्रत्येक फर्म की भूमिका और वास्तविक कर देनदारी का निर्धारण विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगा।

लुधियाना में दर्ज हुई एफआईआर

वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि इस मामले में 13 अक्टूबर को लुधियाना के थाना डिवीजन नंबर-4 में एफआईआर दर्ज की गई। इसमें श्री बालाजी ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक हर्ष थापर और उनके सहयोगियों सम्मी धीमान, जस सहित अन्य लोगों को आरोपित किया गया है। मामला भारतीय न्याय संहिता और केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दर्ज किया गया है।

कर विभाग की जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर अब पुलिस कथित धोखाधड़ी के पूरे घटनाक्रम की पड़ताल करेगी। जांच का दायरा केवल एक ट्रांसपोर्ट कंपनी या कुछ फर्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी कारोबारी इकाइयों तक पहुंचने का प्रयास किया जाएगा, जिनका संबंध कथित तौर पर इस नेटवर्क से रहा है।

अधिकारियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती होगी कि संदिग्ध दस्तावेज किस स्तर पर तैयार किए गए, माल की आवाजाही का रिकॉर्ड किस तरह बनाया गया और संबंधित फर्मों के नाम पर दिखाए गए कारोबार में उनकी वास्तविक भूमिका क्या थी। इसके अलावा यह भी जांच की जाएगी कि कथित नेटवर्क के माध्यम से किसी कारोबारी इकाई ने अनुचित तरीके से कर लाभ तो हासिल नहीं किया।

ई-वे बिल की जांच से सामने आया मामला

इस पूरे मामले का खुलासा कर विभाग की खुफिया एवं रोकथाम इकाई की कार्रवाई के बाद हुआ। वित्त मंत्री के अनुसार, जांच की शुरुआत 30 सितंबर को हुई, जब विभागीय अधिकारियों ने दिल्ली से पंजाब की ओर आ रहे माल से लदे एक वाहन को रोका।

वाहन के साथ मौजूद ई-वे बिल और अन्य बिलों में माल की आपूर्ति पंजाब की तीन फर्मों को किए जाने का उल्लेख था। पहली नजर में दस्तावेजों के अनुसार माल की आवाजाही इन कारोबारी इकाइयों के लिए दिखाई गई थी। हालांकि, जब संबंधित फर्मों से संपर्क कर माल की खरीद और ऑर्डर के संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने माल का ऑर्डर देने और खरीदने से इनकार कर दिया।

यहीं से कर विभाग को दस्तावेजों में दर्ज जानकारी और संबंधित फर्मों के बयानों के बीच अंतर का संदेह हुआ। इसके बाद अधिकारियों ने ई-वे बिल के रिकॉर्ड, बिलों और उपलब्ध आंकड़ों की विस्तृत जांच शुरू की। जांच के दौरान कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से माल की ढुलाई और विभिन्न फर्मों के बीच संबंधों से जुड़े संकेत मिले।

विभाग ने इन दस्तावेजों और आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए नेटवर्क से जुड़ी अन्य कारोबारी इकाइयों की पहचान की। शुरुआती जांच में 62 आपस में जुड़ी फर्मों का पता चला, जो अलग-अलग राज्यों में सक्रिय बताई गई हैं। इनमें 25 फर्मों का संबंध पंजाब से सामने आया है।

कई राज्यों तक फैला बताया जा रहा नेटवर्क

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जांच केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। कर विभाग के अनुसार, संदिग्ध फर्मों का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे जांच में विभिन्न स्थानों पर दर्ज कारोबारी गतिविधियों, माल की आवाजाही और कर संबंधी दस्तावेजों का मिलान करना महत्वपूर्ण हो गया है।

जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास करेंगी कि इन फर्मों के बीच किस प्रकार के कारोबारी संबंध थे और क्या इनके दस्तावेजों का इस्तेमाल वास्तविक आपूर्ति के बिना लेनदेन दिखाने के लिए किया गया। इसके साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि माल की वास्तविक आवाजाही और कागजों में दिखाई गई आपूर्ति के बीच कितना अंतर था।

ई-वे बिल माल की आवाजाही से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। इसलिए इसके रिकॉर्ड का अन्य बिलों, खरीद-बिक्री के विवरण और संबंधित फर्मों के बयानों से मिलान करना जांच का अहम हिस्सा होगा। इस मामले में भी दस्तावेजों की जांच से ही संदिग्ध गतिविधियों के बारे में जानकारी सामने आने की बात कही गई है।

हालांकि, 62 फर्मों की पहचान होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी फर्मों के खिलाफ आरोप साबित हो चुके हैं। प्रत्येक इकाई की भूमिका, संबंधित दस्तावेजों की प्रामाणिकता और संभावित कर देनदारी का निर्धारण जांच के निष्कर्षों के आधार पर किया जाएगा।

2,410 करोड़ रुपये की कर योग्य राशि की जांच

वित्त मंत्री ने बताया कि मामले में 2,410.22 करोड़ रुपये की कर योग्य राशि से संबंधित कारोबार पर 429.30 करोड़ रुपये की जीएसटी धोखाधड़ी का आरोप है। यह राशि कथित तौर पर किए गए कारोबार और उससे जुड़ी कर देनदारी की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

कर विभाग अब यह आकलन करेगा कि कथित नेटवर्क में शामिल फर्मों ने किस प्रकार के लेनदेन दिखाए, उन पर कितना कर देय था और क्या किसी कारोबारी इकाई ने नियमों के विपरीत कर लाभ प्राप्त किया। जांच के दौरान इनपुट टैक्स क्रेडिट से संबंधित दावों की भी पड़ताल की जाएगी।

इनपुट टैक्स क्रेडिट वह व्यवस्था है जिसके तहत पात्र कारोबारी निर्धारित शर्तों के अनुसार अपनी खरीद पर चुकाए गए कर का लाभ बिक्री पर देय कर के मुकाबले ले सकते हैं। यदि इस व्यवस्था के तहत गलत दस्तावेजों या अपात्र लेनदेन के आधार पर लाभ लिया गया हो, तो विभाग संबंधित दावों की जांच कर सकता है। इस मामले में भी संभावित अनुचित इनपुट टैक्स क्रेडिट की पहचान और उसके आकलन को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं।

विभाग को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जांच के दौरान वास्तविक कारोबार, कर भुगतान और दस्तावेजों के बीच संबंध स्पष्ट हो सके। यदि किसी फर्म पर कर बकाया पाया जाता है, तो नियमानुसार कर, ब्याज और जुर्माने की वसूली की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

आपराधिक जांच पुलिस को सौंपी

हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि कथित नेटवर्क से जुड़े पूरे मामले की आपराधिक जांच पुलिस को सौंप दी गई है। इसका उद्देश्य दस्तावेजों में सामने आई विसंगतियों, आरोपित व्यक्तियों की भूमिका और फर्मों के बीच संबंधों की जांच करना है।

पुलिस अब एफआईआर में दर्ज आरोपों और कर विभाग की ओर से जुटाई गई जानकारी के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी। जांच में संबंधित लोगों से पूछताछ, दस्तावेजों का सत्यापन और कथित लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने जैसे पहलुओं पर काम किया जा सकता है। हालांकि, आगे की कार्रवाई और आरोपों की पुष्टि जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों पर निर्भर करेगी।

दूसरी ओर, कर विभाग को नेटवर्क से जुड़े लाभार्थी कारोबारियों की पहचान करने और उनके कर संबंधी रिकॉर्ड की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग को यह पता लगाना होगा कि कथित गतिविधियों से किन कारोबारियों को लाभ हुआ और क्या किसी ने अनुचित तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा किया।

कर चोरी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश

वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि राज्य सरकार कर चोरी के मामलों को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने और कर व्यवस्था का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।

इस मामले में पुलिस की आपराधिक जांच और कर विभाग की वित्तीय जांच समानांतर रूप से महत्वपूर्ण होंगी। पुलिस कथित अपराध और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की पड़ताल करेगी, जबकि कर विभाग का ध्यान कारोबार के आंकड़ों, कर देनदारी, इनपुट टैक्स क्रेडिट और संभावित वसूली पर रहेगा।

अब जांच का अगला चरण यह स्पष्ट करेगा कि 62 फर्मों के कथित नेटवर्क में कौन-कौन सी इकाइयां किस भूमिका में थीं, दस्तावेजों में दिखाई गई आपूर्ति की वास्तविक स्थिति क्या थी और सरकारी राजस्व को हुए संभावित नुकसान का अंतिम आकलन कितना बनता है।

फिलहाल, 429.30 करोड़ रुपये की कथित जीएसटी धोखाधड़ी का मामला पंजाब में कर निगरानी और फर्जी दस्तावेजों के जरिए कारोबार दिखाने की आशंका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पुलिस और कर विभाग की जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति और संबंधित फर्मों की जिम्मेदारी स्पष्ट हो सकेगी।