हरियाणा में नई अभियोजन व्यवस्था अधर में, उप निदेशकों के अधिकारों पर असमंजस

हरियाणा में नई अभियोजन व्यवस्था अधर में, उप निदेशकों के अधिकारों पर असमंजस

अधिसूचना जारी होने के डेढ़ साल बाद भी जिला स्तर पर नहीं सुलझी प्रशासनिक उलझन, जिला अटार्नी के नाम जारी हो रहे पत्र; रिपोर्टिंग व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

हरियाणा में आपराधिक मामलों की पैरवी और अभियोजन कार्य को अधिक व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई नई जिला स्तरीय अभियोजन व्यवस्था अब तक पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाई है। फरवरी 2025 में राज्य सरकार की ओर से अधिसूचना जारी किए जाने के डेढ़ साल से अधिक समय बीतने के बावजूद अधिकारियों की जिम्मेदारियों, अधिकारों और रिपोर्टिंग प्रणाली को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। नई व्यवस्था के तहत जिला अटार्नी (डीए) के कैडर से पदोन्नत किए गए अभियोजन उप निदेशकों को जिला स्तर पर अभियोजन संबंधी कार्यों के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर पुरानी व्यवस्था के अनुरूप कामकाज जारी रहने से बदलाव का उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पा रहा है।

मामले में सबसे बड़ी उलझन आधिकारिक पत्राचार को लेकर सामने आ रही है। अभियोजन निदेशक की ओर से विभिन्न विषयों पर जारी किए जाने वाले पत्र अब भी जिला अटार्नी के नाम भेजे जा रहे हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि जिला स्तर पर अभियोजन कार्यों के संचालन, निगरानी और संबंधित सूचनाएं उपलब्ध कराने के लिए प्राथमिक रूप से किस अधिकारी को जिम्मेदार माना जा रहा है। नई व्यवस्था में उप निदेशकों को सौंपी गई भूमिका और जिला अटार्नी के पारंपरिक दायित्वों के बीच समन्वय स्थापित नहीं होने से प्रशासनिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

उप निदेशकों की नियुक्ति के बाद भी पुरानी व्यवस्था का असर

राज्य सरकार की ओर से नई अभियोजन व्यवस्था लागू करने के पीछे उद्देश्य जिला स्तर पर अभियोजन संबंधी कार्यों की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाना और अधिकारियों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना था। इसके तहत जिला अटार्नी कैडर से पदोन्नत उप निदेशकों को जिला स्तर पर अभियोजन कार्यों के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई। उम्मीद थी कि इससे विभिन्न आपराधिक मामलों की समीक्षा, पुलिस से प्राप्त रिपोर्टों की जांच और अभियोजन संबंधी निर्णयों की प्रक्रिया में बेहतर तालमेल स्थापित होगा।

हालांकि, जमीनी स्तर पर व्यवस्था लागू करने के दौरान प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अपेक्षित बदलाव नहीं हो पाया है। कई मामलों में जिला स्तर से संबंधित सूचनाएं और रिपोर्ट नामित उप निदेशकों के माध्यम से प्राप्त करने के बजाय सीधे जिला अटार्नी से मांगी जा रही हैं। इससे नई व्यवस्था के तहत निर्धारित कार्य-विभाजन के वास्तविक अनुपालन पर सवाल उठ रहे हैं।

यदि जिला स्तर पर अभियोजन कार्यों के प्रबंधन की जिम्मेदारी उप निदेशकों को सौंपी गई है, तो संबंधित पत्राचार, रिपोर्टिंग और निगरानी की प्रक्रियाओं में भी उसी के अनुरूप बदलाव होना अपेक्षित है। लेकिन पत्राचार में पुराने पदनामों और प्रक्रियाओं का इस्तेमाल जारी रहने से अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है।

इस स्थिति का असर केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं है। स्पष्ट अधिकार क्षेत्र और जवाबदेही की व्यवस्था किसी भी अभियोजन निदेशालय के प्रभावी संचालन के लिए महत्वपूर्ण होती है। जब किसी रिपोर्ट की मांग, उसकी समीक्षा और उसे आगे भेजने की जिम्मेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट न हो, तो कामकाज में अनावश्यक देरी और समन्वय संबंधी कठिनाइयां पैदा होने की आशंका रहती है।

बीएनएसएस की धारा 20 में जिला अभियोजन निदेशालय का प्रविधान

नई व्यवस्था की कानूनी पृष्ठभूमि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 से जुड़ी है। इसकी धारा 20 के तहत राज्य सरकार को राज्य स्तर पर अभियोजन निदेशालय और प्रत्येक जिले में जिला अभियोजन निदेशालय स्थापित करने का अधिकार दिया गया है। यह प्रविधान पहले लागू दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 25ए से आगे की व्यवस्था को विस्तार देता है, क्योंकि पुरानी संहिता में जिला स्तर पर अभियोजन निदेशालय स्थापित करने का ऐसा स्पष्ट प्रविधान नहीं था।

बीएनएसएस के लागू होने के बाद अभियोजन व्यवस्था को नए आपराधिक कानूनों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता महसूस की गई। जिला स्तर पर अलग निदेशालय की अवधारणा का उद्देश्य अभियोजन कार्यों को अधिक संगठित करना, मामलों की गंभीरता के अनुसार निगरानी सुनिश्चित करना और अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा करना है।

नई कानूनी व्यवस्था में अभियोजन अधिकारियों की भूमिका अपराध की गंभीरता और संभावित सजा के आधार पर निर्धारित की गई है। इसके तहत गंभीर मामलों की निगरानी वरिष्ठ स्तर पर और अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराधों की निगरानी संबंधित स्तर के अधिकारियों द्वारा किए जाने की व्यवस्था है। इससे अभियोजन से जुड़े मामलों की प्राथमिकता तय करने और आवश्यकतानुसार निगरानी बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, कानूनी प्रविधानों के अनुरूप प्रशासनिक ढांचा तैयार करना और उसे व्यवहार में लागू करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। हरियाणा में सामने आ रही स्थिति इसी अंतर को रेखांकित करती है। अधिसूचना जारी होने और अधिकारियों को जिम्मेदारियां सौंपे जाने के बाद भी यदि पत्राचार, रिपोर्टिंग और कामकाज की प्रक्रियाओं में बदलाव नहीं होता, तो नई व्यवस्था का पूरा लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।

गंभीर आपराधिक मामलों की निगरानी में अभियोजन निदेशक की भूमिका

बीएनएसएस के तहत अभियोजन अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का निर्धारण मामलों में संभावित सजा के आधार पर किया गया है। जिन अपराधों में 10 वर्ष या उससे अधिक की कैद, आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रविधान है, उनकी निगरानी अभियोजन निदेशक के स्तर पर की जाती है।

ऐसे मामलों में अभियोजन की तैयारी, पुलिस की ओर से उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों और रिपोर्टों की समीक्षा तथा संबंधित प्रक्रियाओं पर निगरानी विशेष महत्व रखती है। गंभीर आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष की तैयारी का प्रभाव न्यायिक प्रक्रिया की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। इसलिए इन मामलों की निगरानी के लिए स्पष्ट जिम्मेदारियां और समयबद्ध रिपोर्टिंग आवश्यक मानी जाती है।

वहीं, अभियोजन उप निदेशकों की भूमिका पुलिस रिपोर्टों की जांच और सात वर्ष से लेकर 10 वर्ष से कम की सजा वाले अपराधों की निगरानी से जुड़ी है। सहायक निदेशक सात वर्ष से कम की सजा वाले अपराधों के मामलों की निगरानी करते हैं। इस तरह व्यवस्था में अलग-अलग स्तरों के अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी और मामलों की गंभीरता के अनुसार काम सौंपने की अवधारणा अपनाई गई है।

इस कार्य-विभाजन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर मामलों पर वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान बना रहे और अन्य मामलों की निगरानी भी निर्धारित स्तर पर होती रहे। लेकिन इसके लिए जिला स्तर पर तैनात अधिकारियों की भूमिका को स्पष्ट करना और संबंधित विभागों को नई व्यवस्था के अनुरूप काम करने के निर्देश देना जरूरी है।

नियुक्तियों और नए कानूनों के क्रियान्वयन पर केंद्र का जोर

नए आपराधिक कानूनों को लागू करने और अभियोजन व्यवस्था को मजबूत बनाने का विषय केंद्र सरकार के स्तर पर भी प्राथमिकता में रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इन कानूनों के क्रियान्वयन से जुड़े विषयों पर विभिन्न अवसरों पर समीक्षा की है। मई 2025 में दिल्ली में हुई समीक्षा बैठक के दौरान उन्होंने अभियोजन निदेशालय में आवश्यक नियुक्तियां जल्द पूरी करने पर जोर दिया था। इसके बाद हरियाणा में नई व्यवस्था को लागू करने की दिशा में कदम उठाए गए।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन अक्टूबर 2025 को कुरुक्षेत्र भी आए थे। इस दौरान उन्होंने नए आपराधिक कानूनों से संबंधित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पुलिस, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न पक्षों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया जाता रहा है।

नए कानूनों का उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाना है। ऐसे में अभियोजन निदेशालय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि पुलिस की जांच के बाद न्यायालय में मामले की पैरवी, साक्ष्यों की प्रस्तुति और कानूनी प्रक्रियाओं का समुचित संचालन इसी व्यवस्था से जुड़ा है।

हालांकि, नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए केवल नियुक्तियां करना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही प्रशासनिक निर्देशों, पदाधिकारियों के अधिकार क्षेत्र, पत्राचार के प्रारूप और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को भी स्पष्ट करना आवश्यक है। हरियाणा में जिला स्तर पर सामने आ रही उलझन बताती है कि इन पहलुओं पर अभी और काम किए जाने की जरूरत है।

स्पष्ट कार्य-विभाजन और जवाबदेही तय करना जरूरी

हरियाणा में नई अभियोजन व्यवस्था को पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए सबसे पहले जिला अटार्नी और अभियोजन उप निदेशकों की भूमिकाओं के बीच स्पष्टता स्थापित करनी होगी। संबंधित अधिकारियों को यह बताना आवश्यक है कि किन मामलों में रिपोर्ट सीधे उप निदेशक को भेजी जानी है, किन विषयों पर जिला अटार्नी की भूमिका बनी रहेगी और अभियोजन निदेशालय के साथ आधिकारिक पत्राचार किस माध्यम से किया जाएगा।

इसके अलावा, सभी जिला कार्यालयों को नई प्रशासनिक संरचना के अनुरूप एक समान निर्देश जारी करने की आवश्यकता है। इससे अलग-अलग जिलों में अलग कार्यप्रणाली अपनाए जाने की आशंका कम होगी और रिपोर्टिंग संबंधी भ्रम दूर किया जा सकेगा। यदि नई व्यवस्था के तहत उप निदेशकों को जिला स्तर पर अभियोजन कार्यों के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है, तो उनके अधिकारों और दायित्वों को विभागीय आदेशों तथा दैनिक कार्यप्रणाली में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होना चाहिए।

जवाबदेही तय करने के लिए रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समय-सीमा, मामलों की समीक्षा की प्रक्रिया और वरिष्ठ अधिकारियों तक सूचनाएं पहुंचाने के तरीके को भी स्पष्ट करना जरूरी है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि जिला स्तर पर अभियोजन कार्य निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार चल रहे हैं या नहीं।

नई व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन से गंभीर आपराधिक मामलों की निगरानी मजबूत होने, पुलिस और अभियोजन के बीच समन्वय बेहतर बनाने तथा मामलों की समीक्षा को अधिक व्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसके लिए प्रशासनिक बदलावों को कागजी अधिसूचना से आगे बढ़ाकर वास्तविक कामकाज का हिस्सा बनाना होगा।

फिलहाल, फरवरी 2025 में जारी अधिसूचना के बाद भी जिला स्तर पर पत्राचार और रिपोर्टिंग की पुरानी प्रक्रियाओं का जारी रहना नई व्यवस्था के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर रहा है। अब विभागीय स्तर पर यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि अभियोजन उप निदेशकों को सौंपी गई जिम्मेदारियां किस सीमा तक लागू की गई हैं और जिला अटार्नी के साथ उनके कार्य-विभाजन को लेकर क्या दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। जब तक इन सवालों का स्पष्ट समाधान नहीं होता, तब तक हरियाणा में जिला स्तरीय अभियोजन व्यवस्था में बदलाव अधूरा ही माना जाएगा।